एनजीटी के आदेशों की खुली अवहेलना
देवानंद सिंह
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा जारी आदेशों का उद्देश्य केवल पर्यावरणीय संरक्षण नहीं, बल्कि संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग, नदी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और स्थायी विकास की दिशा में एक ठोस कदम होता है। परंतु झारखंड के पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले से जो घटनाएं सामने आ रही हैं, जो न केवल एनजीटी के आदेशों की खुली अवहेलना हैं, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि राज्य प्रशासन, पुलिस और स्थानीय राजनेता, सभी की भूमिका पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।

एनजीटी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मानसून के दौरान यानी 10 जून से 15 अक्टूबर के बीच किसी भी नदी, खासकर सुवर्णरेखा और खरकई जैसी संवेदनशील नदियों से बालू खनन नहीं किया जाएगा। इसका उद्देश्य मानसून के समय नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित होने से रोकना, जलस्रोतों की गहराई और दिशा में असंतुलन को टालना तथा तटीय पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखना है, लेकिन हालातों को देखकर यही लगता है कि यह आदेश सिर्फ कागज़ पर है। धरातल पर हकीकत यह है कि बालू माफिया, पुलिस की आंखों के सामने संगठित तरीके से खनन कर रहे हैं, और स्थानीय प्रशासन कभी-कभार दिखावे की कार्रवाई कर इस अवैध धंधे को अप्रत्यक्ष समर्थन दे रहा है।

एक मीडिया हाउस की जांच टीम ने जब सापड़ा, हुतलुंग, महुलडीह, चांडिल, तिरुलडीह और बहरागोड़ा तक बालू घाटों की पड़ताल की, तो पाया कि खनन माफिया पुलों के पास खुलेआम खनन कर रहे हैं। पुल के पास पुलिस वाहन खड़ा है, माफिया झुंड में खड़े हैं, नदी के भीतर गोताखोरों से बालू निकाली जा रही है और फिर ट्रैक्टरों के जरिए शहरों में सप्लाई की जा रही है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि अब खनन कार्य महज़ बेलचे या ट्रैक्टरों का नहीं रह गया है। गोताखोरों की मदद से नदी की गहराई से गुणवत्ता वाली बालू निकाली जाती है, जिसे नाबों (नाव जैसी अस्थायी ढांचों) के माध्यम से घाट पर लाकर संगठित सप्लाई चेन से ट्रकों में भर दिया जाता है।

सापड़ा जैसे क्षेत्रों में माफियाओं ने युवकों की टोली बना रखी है, जो हर आने-जाने वाले व्यक्ति पर नजर रखती है। पत्रकार, अधिकारी या कोई संदिग्ध नजर आते ही तुरंत सूचना माफिया तक पहुंचाई जाती है। यह एक अघोषित ‘खनन राज’ की तरह काम करता है, हालांकि प्रशासन दावा करता है कि डीसी स्तर से निर्देश जारी किए गए हैं, छापामारी की जा रही है, वाहनों को जब्त किया गया है, और अस्थायी मार्गों को बाधित किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि छापेमारी के दो घंटे बाद ही फिर से खनन शुरू हो जाता है।

हुरलुंग घाट पर तस्करों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने की बात स्वयं स्थानीय लोगों द्वारा कही जा रही है। ऐसे में, कार्रवाई करना मात्र खानापूर्ति रह जाती है। इन अवैध खननों से नदी की गहराई, प्रवाह और दिशा में परिवर्तन हो रहा है, इससे न केवल नदी किनारे की कृषि भूमि कटाव का शिकार होती है, बल्कि जलस्तर में भी असामान्य उतार-चढ़ाव आता है। प्रश्न यह नहीं कि एनजीटी ने क्या आदेश दिया। सवाल यह है कि क्या ऐसे आदेशों की कोई व्यावहारिक वैधता बचती है, जब स्थानीय पुलिस, राजनेता और खनन माफिया मिलकर उसे नकार दें? बालू खनन जैसे संसाधनों की लूट महज़ आर्थिक अपराध नहीं है। यह प्रकृति के साथ एक सुनियोजित धोखा है। जब इसे सत्ता और संरक्षण प्राप्त हो जाए, तो वह ‘संगठित पर्यावरणीय अपराध’ की श्रेणी में आता है, जिसकी सजा भारत के पर्यावरण कानूनों में अभी भी सख्ती से निर्धारित नहीं है।

फिर इसके समाधान को लेकर कुछ खास कदम उठाए जा सकते हैं। दूरस्थ और कठिन इलाकों में खनन की निगरानी के लिए ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और जीपीएस-आधारित ट्रैकिंग सिस्टम की आवश्यकता है। कई राज्यों ने यह प्रारंभिक प्रयोग किए हैं, परंतु झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्य में इसकी अनुपस्थिति निंदनीय है। उच्च अधिकारियों से लेकर अंचल स्तर तक जवाबदेही तय करनी होगी। केवल वाहन जब्ती और दो घंटे की छापामारी से काम नहीं चलेगा। संबंधित सीओ, थाना प्रभारी और बीडीओ के कार्यों की मासिक समीक्षा होनी चाहिए और एनजीटी के आदेशों के उल्लंघन की स्थिति में कठोर दंड सुनिश्चित हो। माफिया संरचना तभी टूटेगी, जब उनके आय स्रोतों पर चोट की जाए। अवैध बालू से कमाए गए धन को जब्त करने, बैंकों और संपत्ति का रजिस्ट्रेशन रद्द करने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए, जिन युवकों को माफिया निगरानी में लगाते हैं, उन्हें वैकल्पिक रोजगार या स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ा जाए, ताकि वे संगठित अपराध का हिस्सा न बनें।

बालू, निर्माण का आधार होता है, लेकिन जब बालू ही लूट का साधन बन जाए और कानून की धज्जियां खुलेआम उड़ाई जाएं, तो यह विकास की नहीं, विनाश की नींव बनती है। पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जैसे जिले, जहां प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, वहां यदि प्रशासनिक इच्छा शक्ति न हो, तो यह संपदा शाप बन जाती है। एनजीटी के आदेश केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारे भविष्य के पर्यावरणीय संतुलन के प्रहरी हैं। यदि, इन्हें इसी तरह दरकिनार किया जाता रहा, तो आने वाले वर्षों में नदियां बालू से नहीं, हमारे कानून की लाचारी से सूख जाएंगी।

