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    Home » चंद्रबाबू नायडू की जनसंख्या नीति और दक्षिण भारत की सियासी दुविधा
    Breaking News Headlines जमशेदपुर संपादकीय

    चंद्रबाबू नायडू की जनसंख्या नीति और दक्षिण भारत की सियासी दुविधा

    News DeskBy News DeskJune 11, 2025No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह

    आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा घोषित जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करने की योजना ने देशभर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। नायडू सरकार की इस पहल के अंतर्गत बड़े परिवारों को आर्थिक सहायता दी जाएगी और महिलाओं को कई बार मातृत्व अवकाश तथा कार्यस्थल पर शिशु देखभाल की सुविधाएं मिलेंगी। नायडू का यह कदम एक ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत में जन्म दर पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर गिर रही है। यह पहल जनसंख्या नीति की एक नई व्याख्या प्रस्तुत करती है, लेकिन इसके पीछे की राजनीति और दूरगामी प्रभावों को समझना आवश्यक है।

    उल्लेखनीय है कि भारत में दशकों से एक अदृश्य जनसंख्यात्मक रेखा खिंची हुई है। एक तरफ उत्तर भारतीय राज्य हैं, जहां अब भी तुलनात्मक रूप से ऊंची जन्म दर है, और दूसरी ओर दक्षिण भारतीय राज्य, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता के चलते जनसंख्या में स्थायित्व या गिरावट देखी जा रही है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि देश का कुल प्रजनन दर 2.0 तक गिर चुका है। यह उस स्तर से भी नीचे है, जिसे जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए न्यूनतम माना जाता है।

    आंध्र प्रदेश का प्रजनन दर 1.5 है, जो पहले से ही चीन जैसे देशों के समकक्ष है, जहां जन्म दर गिरने के बाद सरकार तमाम प्रोत्साहनों के बावजूद उसे स्थिर नहीं कर पाई है। ऐसे में, नायडू का यह कदम जनसंख्या नीति से अधिक सियासी गणित से प्रेरित लगता है। इस नीति का सबसे अहम निहितार्थ देश की संघीय राजनीतिक संरचना में झांकने पर मिलता है। 2026 के बाद भारत में एक बार फिर लोकसभा सीटों का परिसीमन प्रस्तावित है, जो जनसंख्या के आधार पर राज्यों को सीटें आवंटित करेगा। दक्षिण भारत के अधिकतर राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के सफल प्रयासों के कारण अब उन्हें यह डर सताने लगा है कि उत्तर भारतीय राज्यों की अपेक्षाकृत ऊंची जनसंख्या उन्हें ज्यादा लोकसभा सीटें और इसलिए अधिक राजनीतिक ताकत दे सकती है। यह सत्ता का वह समीकरण है, जिससे दक्षिण भारत के नेता असहज हैं।

    नायडू की योजना को इसी डर की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। जनसंख्या बढ़ाओ ताकि राजनीतिक हैसियत घटे नहीं। चंद्रबाबू नायडू की मंशा चाहे जो भी हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या जनसंख्या को नीतियों के जरिए बढ़ाना संभव है? इस प्रश्न का उत्तर चीन जैसे देशों से मिलता है। चीन ने 1979 में ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ लागू की थी, लेकिन जैसे ही यह नीति वहां की श्रम शक्ति और सामाजिक संरचना पर असर डालने लगी, 2015 में उसे दो बच्चों और फिर तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। इसके बावजूद चीन में जन्म दर में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई।

    इसका कारण सीधा है, शहरीकरण, शिक्षा और जीवनशैली की प्राथमिकताओं में बदलाव। जैसे-जैसे लोगों की आय और शिक्षा का स्तर बढ़ता है, वे कम बच्चे पैदा करना पसंद करते हैं, क्योंकि अब प्राथमिकता ‘क्वॉन्टिटी’ नहीं, ‘क्वालिटी’ बन चुकी है। बच्चे अब निवेश बन चुके हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और समय लगाना होता है, और इसका बोझ सिर्फ महिलाओं पर नहीं, पूरे परिवार पर पड़ता है। विडंबना यह है कि कुछ ही साल पहले आंध्र प्रदेश में ऐसा कानून बनाया गया था, जिसमें तीन से अधिक बच्चे वाले व्यक्तियों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया गया था। अब वही राज्य बड़े परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देकर जन्म दर बढ़ाना चाहता है। यह नीति-निर्माण में गंभीर अंतर्विरोध को दर्शाता है। यदि, जनसंख्या वृद्धि एक राजनीतिक प्राथमिकता है, तो क्या ऐसे प्रतिबंधात्मक नियमों को रद्द किया जाएगा? और क्या यह जनसंख्या नीति का स्थायी समाधान बन सकता है?

    भारत की सबसे बड़ी चुनौती जनसंख्या की संख्या नहीं, उसकी गुणवत्ता है। देश के पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, लेकिन यह जनसंपदा तभी विकास में सहायक बन सकती है, जब वह शिक्षित, स्वस्थ और स्किल्ड हो। ऐसे में जरूरी है कि सरकारें अपनी ऊर्जा जनसंख्या बढ़ाने की बजाय मौजूदा आबादी को सक्षम बनाने पर केंद्रित करें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, कौशल विकास योजनाएं, एमएसएमई सेक्टर का विस्तार, महिला सशक्तिकरण, और हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी पहलें कहीं अधिक जरूरी और दूरगामी प्रभाव वाली होंगी। साथ ही, यह समझना आवश्यक है कि जब जन्म दर गिरती है, तो सामाजिक संरचना में भी बदलाव आता है। बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की जरूरतें बदलती हैं। ऐसे में बच्चे बढ़ाओ जैसी योजनाएं इन संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं हैं।

    यह समय है, जब हम जनसंख्या के विमर्श को संख्या से हटाकर निवेश की भाषा में बदलें। यदि, प्रत्येक नागरिक में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के रूप में निवेश किया जाए, तो भारत की विकास गाथा को स्थायित्व मिलेगा। जन्म दर को बढ़ाना या घटाना कोई बटन नहीं है, जिसे सरकारें अपने हितों के अनुसार दबा सकती हैं। जनसंख्या एक जैविक, सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया है, जिसे सिर्फ इंसेंटिव्स से नहीं, दीर्घकालिक रणनीति से ही संतुलित किया जा सकता है। चंद्रबाबू नायडू की जनसंख्या नीति का प्रस्ताव दक्षिण भारत की एक वास्तविक राजनीतिक चिंता को दर्शाता है, लेकिन इसका समाधान एक गलत दरवाजे से तलाशा जा रहा है। आज भारत को ज़रूरत है अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को बचाने और उसका कुशल उपयोग करने की, न कि कृत्रिम उपायों से जन्म दर को बढ़ाने की।

    कुल मिलाकर, यह नीतिगत कदम सामाजिक जटिलताओं की अनदेखी करते हुए एक राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश ज़रूर है, परंतु यह दीर्घकाल में देश की जनसंख्या संरचना और संसाधनों पर क्या प्रभाव डालेगा, इसका मूल्यांकन अभी शेष है। दक्षिण को यह समझना होगा कि शक्ति केवल संख्या से नहीं आती, बल्कि वह सोच, संकल्प और समावेशी विकास से आती है।

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