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    Home » हरियाणा विधानसभा भंग करने के पीछे का सच !
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    हरियाणा विधानसभा भंग करने के पीछे का सच !

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 19, 2024Updated:September 19, 2024No Comments5 Mins Read
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    हरियाणा विधानसभा भंग करने के पीछे का सच !

    कुमार समीर

    हरियाणा में अगले महीने 5 अक्टूबर को चुनाव हैं और विधानसभा चुनाव से ऐन 52 दिन पहले हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने प्रदेश विधानसभा भंग कर दी है। संवैधानिक संकट को कारण बताया जा रहा है। हालांकि जो कारण बताया जा रहा है वह देश में संवैधानिक संकट का पहला मामला है। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ जबकि इससे पहले भी हरियाणा में तीन-तीन बार विधानसभा भंग हो चुकी हैं लेकिन कारण कभी भी यह नहीं रहा जो इस बार रहा है। उन तीनों ही मामलों में समय से पहले चुनाव करवाने के लिए ऐसा किया गया था।

     

     

    बता दें कि फरवरी 1972 में कांग्रेस सरकार में बंसीलाल ने एक साल पहले विधानसभा भंग कराई थी। दिसंबर-1999 में इनेलो सरकार में तत्कालीन सीएम ओमप्रकाश चौटाला ने 16 माह पहले विधानसभा भंग करवाकर चुनाव करवा दिए। तीसरी बार अगस्त-2009 में कांग्रेस सरकार में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने विधानसभा भंग कर समय से पहले चुनाव करवाए थे।
    लेकिन 1947 में देश आजाद होने के बाद कभी किसी राज्य में मौजूदा सैनी सरकार जैसी नौबत नहीं आई। यहां तक कि कोरोनाकाल में भी हरियाणा में ऐसे ही संकट को टालने के लिए एक दिन का सेशन बुलाया गया था लेकिन इस बार नहीं बुलाया जा सका। यह सबसे बड़ा सवाल है। हालांकि राज्य की भाजपा सरकार की सिफारिश पर ही गवर्नर ने इसका नोटिफिकेशन जारी किया है।

     

     

     

    विधानसभा भंग करने के नोटिफिकेशन में गवर्नर ने लिखा- ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 के खंड (2) के उप-खंड (बी) द्वारा मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए मैं बंडारू दत्तात्रेय, राज्यपाल, हरियाणा तत्काल प्रभाव से हरियाणा विधानसभा भंग करता हूं।’
    CM नायब सिंह सैनी की अगुआई वाली कैबिनेट ने बीते बुधवार को ही विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। गवर्नर के मुताबिक, अगली सरकार का गठन होने तक नायब सैनी कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

    दरअसल, 6 महीने की अवधि में विधानसभा सेशन न बुला पाने के संवैधानिक संकट से बचने के लिए सैनी सरकार ने यह कदम उठाया। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल कि कोरोना काल तक में जब एक दिन का सेशन बुला लिया गया तो फिर अब सामान्य दिनों में आखिर कैसे नहीं किया जा सका। क्या इसके पीछे कोई खास वजह ? कहने वालों ने बहुत कुछ कहना शुरू कर दिया है लेकिन एक बात जो काफी तेजी से फैलनी शुरू हो गई है कि डर की वजह से सैनी सरकार ने विधानसभा का सेशन नहीं बुलाया। उन्हें डर था कि सेशन में अगर बहुमत साबित करने की नौबत आई तो कहीं वह ऐसा करने में विफल नहीं हो जाएं।

     

     

     

    बता दें कि हरियाणा की 14वीं विधानसभा का कार्यकाल 3 नवंबर तक था। यानी अभी कार्यकाल पूरा होने में 52 दिन बचे थे। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, विधानसभा के 2 सेशन में छह महीने से ज्यादा का गैप नहीं हो सकता। प्रदेश विधानसभा के पिछले सेशन को 12 सितंबर को 6 महीने पूरे हो गए। चूंकि राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं इसलिए सेशन बुलाना संभव नहीं था।

    संवैधानिक मामलों के जानकार और दिल्ली हाईकोर्ट के एडवोकेट संतोष कुमार का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 174(1) के तहत किसी भी राज्य की विधानसभा के 2 सेशन के बीच 6 महीने से ज्यादा का गैप नहीं हो सकता। हरियाणा में 13 मार्च 2024 को विधानसभा का एक दिन का विशेष सेशन बुलाया गया था। उसमें CM नायब सैनी ने बहुमत साबित किया। इसके बाद 6 महीने के भीतर यानी 12 सितंबर तक हर हाल में दूसरा सेशन बुलाया जाना अनिवार्य था। सैनी सरकार ऐसा नहीं कर पाई।

    सैनी सरकार ऐसा क्यों नहीं कर पायी, इसकी दो वजहें गिनाई गई हैं। बताया गया है कि संवैधानिक बाध्यता के बावजूद सरकार सेशन नहीं बुला पाई क्योंकि 16 अगस्त 2024 को 15वीं विधानसभा के गठन के लिए चुनाव आचार संहिता लागू हो गई। सैनी सरकार इसे भांप नहीं पाई। सरकार को 17 अगस्त की जिस कैबिनेट मीटिंग में सेशन पर फैसला लेना था, उससे एक दिन पहले ही आचार संहिता लग गई।

     

     

     

    डबल इंजन सरकार होने के बावजूद इसका अंदाजा नहीं होने की बात इसलिए नहीं पच पा रही है क्योंकि मीडिया तक में यह बात जोर-शोर से प्रचारित की जा रही थी कि जम्मू-कश्मीर, हरियाणा सहित कुछ राज्यों में चुनाव की तारीख की घोषणा चुनाव आयोग करने जा रहा है। मीडिया में तो 48 घंटे पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस फलां दिन होने जा रहा है इसकी घोषणा तक की जा चुकी थी लेकिन सैनी सरकार इस सबसे भी अनजान रही। क्या इस पर विश्वास किया जा सकता है ?

    बता दें कि 90 सदस्यीय विधानसभा में 16 अगस्त तक 81 विधायक थे। दावा किया जा रहा है कि भाजपा के पास बहुमत यानि 41 का आंकड़ा पार करने लायक विधायक थे लेकिन दावे और हकीकत में अंतर होने की बात कही जा रही है। कहा जा रहा है कि सेशन बुलाने की सूरत में अगर सदन में क्रॉस वोटिंग के चलते कोई प्रस्ताव गिर जाता तो सरकार को शर्मसार होने की नौबत आ जाती। यही वजह है कि सैनी सरकार के पास चुनाव के बीचों-बीच विधानसभा को समयपूर्व भंग करने की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

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