166 लाशें, एक कसाब, और सत्रह साल का अनसुलझा सवाल,क्यों! सत्रह बरसी नहीं, सत्रह साल का खुला ज़ख्म है ये !
मुम्बई/ 26 नवंबर 2008 की उस काली रात को, जब मुंबई सोने की तैयारी कर रही थी, दस युवक समुद्र के रास्ते शहर में घुसे और मौत बाँटने लगे। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, ताज महल पैलेस, ओबरॉय ट्राइडेंट, नरीमन हाउस, लियोपोल्ड कैफे और कामा अस्पताल,ये नाम अब सिर्फ़ जगहें नहीं, हमारे सामूहिक दर्द के पते हैं। 166 लोग मारे गए। सैकड़ों घायल हुए। एक शहर रातोंरात घुटनों पर आ गया, फिर उठा और चल पड़ा।हर साल इस दिन हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं, श्रद्धांजलि देते हैं, और सोचते हैं,क्या हमने सच में कुछ सीखा है!हमने सीखा कि नफ़रत की गोलियाँ धर्म, भाषा, जाति नहीं देखतीं। स्टेशन पर टिकट लेने वाला मज़दूर, ताज में डिनर कर रहा विदेशी मेहमान, नरीमन हाउस में रहने वाला यहूदी रब्बी और दो साल का मोशे
होल्ट्ज़बर्ग,सब एक ही निशाने पर थे। आतंक का कोई पासपोर्ट नहीं होता। हमने सीखा कि बहादुरी बड़े-बड़े पदों पर नहीं, छोटे-छोटे लोगों के सीने में भी धड़कती है। ताज के कर्मचारी जो मेहमानों को बचाने के लिए अपनी जान पर खेल गए। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जो बोले, “मुझे मत रोको, मेरे पीछे मेरा देश है।” तुकाराम ओंबले, जिन्होंने खाली हाथ कसाब की एके-47 पकड़ ली और शहर को दूसरा हमला होने से बचा लिया। संदीप देशपांडे, करीमुल्लाह, विष्णु ज़ुल्फिकार,वे सारे पुलिसवाले जिनकी वर्दी में छेद हो गए, पर हौसला नहीं डगमगाया। और हमने सीखा कि घाव भर सकते हैं, पर निशान रह जाते हैं।
सैंडरा सैमुअल आज भी मोशे की “इंडियन नैन” हैं। मोशे हर साल मुंबई आता है, अपने माता-पिता की याद में साइलेंस रखता है।
देविका रोटावन, जो उस दिन स्टेशन पर गोली लगने से लंगड़ाती हुईं बच गईं, आज देश की सबसे कम उम्र की किरण बेदी पुरस्कार विजेता हैं। वो बच्चे जो अनाथ हो गए, वो पत्नियाँ जो विधवा हो गईं, वो माँ-बाप जो अपने जवान बेटों को तिरंगे में लिपटे देखकर भी चुप रहे,उनकी आँखों में आज भी वही सवाल है! “क्यों”! सत्रह साल बाद भी कसाब को फाँसी हो चुकी, उसके आकाओं को सज़ा मिल चुकी या नहीं,इससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल ये है कि हमने अपनी सीमाओं को कितना मज़बूत किया! हमारी खुफ़िया एजेंसियाँ कितनी चुस्त हुईं! हमारा समाज कितना एकजुट हुआ! मुंबई ने दिखाया कि वो रुकती नहीं।
ताज फिर चमकने लगा। स्टेशन पर फिर वही भीड़ है। लियोपोल्ड में फिर वही ठंडी बीयर और हँसी है। पर हर बार जब हम गेटवे ऑफ़ इंडिया के सामने से गुज़रते हैं और समुद्र की लहरें देखते हैं, एक ठिठकन होती है। एक खामोशी होती है। एक वादा होता है,हम भूलेंगे नहीं। आज 26/11 की सत्रहवीं बरसी पर सिर्फ़ श्रद्धासुमन नहीं, एक संकल्प चाहिए। कि हम अपने बच्चों को बताएँगे कि इस शहर ने कैसे आँसुओं को ताकत बनाया।
कि हम अपने फ़ौजियों, पुलिसवालों और आम नागरिकों को याद रखेंगे जिन्होंने हमें जिंदा रहने का हक़ दिया। और कि हम कभी नहीं भूलेंगे,मुंबई सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक जज़्बा है। जय हिंद !जय महाराष्ट्र। और उन तमाम शहीदों को कोटि-कोटि प्रणाम, जिनकी वजह से आज भी हम साँस ले पा रहे हैं।
– indra Yadav / Independent Journalist..🙏

