छठ पर्व की महिमा है अपार
छठ शायद इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें सामाजिक तानाबाना के हर वर्ग की उपयोगिता है। प्रकृति के हर रुप का प्रयोग किया जाता है। इस पर्व की खासियत इसमें बरती जाने वाली शुद्धता है। आज कोरोना काल में जिस शुद्धता पर इतना जोर है, वह छठ व्रतधारी परिवारों के लिये आम है। केवल वह परिवार ही नहीं, बल्कि छठ के मौके पर सामान्य लोग भी अध्र्य देने के लिये नदी तालाब जाने वाले मार्ग की साफ सफाई खुद करते है। जिनका घर उस मार्ग पर पड़ता है, वह इसे सौभाग्य मानते हैं और सुबह से ही मार्ग की धुलाई में लग जाते हैं। सामाजिक सरोकार के इस महापर्व की महिमा अपार है।बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलते हुए अब यह राष्ट्रव्यापी त्योहार बन चुका है। केवल पूर्वांचल के ही नहीं, देश के दूसरे हिस्से के लोग भी उसी श्रद्धा से इस पर्व का हिस्सा बनने लगे हैं। यह ऐसा पर्व है जिसे हरकोई एक साथ एक घाट पर मनाता है। न कोई बड़ा रह जाता है, न छोटा। जात-पात की दूरी खत्म हो जाती है। छठ का प्रसाद ग्रहण करने के लिये किसी का भी हाथ किसी के आगे बढ जाता है और उसे निराश नहीं होना पड़ता। यह ऐसा पर्व है जिसमें साक्षात सूर्य की अराधना की होती है। डूबते सूर्य को पहले अध्र्य प्रदान किया जाता है। सूर्य को ग्रंथों में ऐसा प्रत्यक्ष देवता माना है जिसका हम साक्षात दर्शन कर सकते हैं। अभी कोरोना काल में सूर्य की तपिश की क्या उपयोगिता है, इसे पूरी दुनियां महसूस कर रही है। सूर्य ऊर्जा का स्रोत है और इसकी किरणों से विटामिन डी जैसे तत्व शरीर को मिलते हैं। सूर्य मौसम चक्र को चलाने वाला ग्रह है। ज्योतिष के नजरिए से सूर्य आत्मा का ग्रह माना गया है। सूर्य पूजा आत्मविश्वास जगाने के लिए की जाती है। पुराणों के नजरिए से देखें तो सूर्य को पंचदेवों में से एक माना गया है, ये पंच देव हैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा और सूर्य। किसी भी शुभ काम की शुरुआत में सूर्य की पूजा अनिवार्य रूप से की जाती है। शादी करते समय भी सूर्य की स्थिति खासतौर पर देखी जाती है। भविष्य पुराण से ब्राह्म पर्व में श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र सांब को सूर्य पूजा का महत्व बताया है। बिहार में मान्यता प्रचलित है कि पुराने समय में सीता, कुंती और द्रौपदी ने भी ये व्रत किया था।
छठ माता यानि सूर्यदेव की बहन के लिए निर्जला व्रत किया जाता है, यानी व्रतधारी करीब 36 घंटे तक जल भी ग्रहण नहीं पीते हैं। पंचमी तिथि पर खरना होता है जिसे तन और मन का शुद्धिकरण माना जाता है। इस पर्व में जिस दौरा, सूप का उपयोग किया जाता है, उसे समाज का सबसे निचले तबका माना जाने वाला वर्ग तैयार करता है। इस त्योहार में तमाम मौसमी फसल, फल, आदि का उपयोग किया जाता है। सूप दौरा में जिन फलो, आदि को सजाया जाता है, ऐसा उदाहरण कहीं और देखने को नहीं मिलता। छठ के कर्णप्रिय गीतों से करीब एक सप्ताह तक सारा वातावरण एक तरह से शुद्ध होता रहता है। कोरोना के इस दौर में भी छठ के उत्साह में कोई कमी नही ंआई है। सरकार के गाइड लाइन के बीच लोग पूरी श्रद्धा के साथ पूजा कर रहे हैं।

