वोटर लिस्ट और लोकतंत्र भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं, जिनकी शुचिता पर हालिया घटनाक्रमों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देवानंद सिंह-
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का आधार केवल चुनाव नहीं, बल्कि नागरिकता की शुद्धता, प्रशासनिक सतर्कता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता भी है। बिहार के गोपालगंज से लेकर पश्चिम बंगाल तक हाल में सामने आए घटनाक्रम इन तीनों स्तंभों पर एक साथ सवाल खड़े करते हैं। एक ओर गोपालगंज में विदेशी नागरिकों के कथित रूप से बस जाने और वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने का मामला है, तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राज्य सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की स्थिति बनी।
भाजपा विधायक मिथिलेश तिवारी द्वारा उठाया गया प्रश्न साधारण नहीं है। वर्ष 1995 से 2015 के बीच मिशनरी (धार्मिक यात्रा) वीजा पर पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस से 173 विदेशी नागरिकों का गोपालगंज आना और उनकी वापसी का कोई स्पष्ट प्रशासनिक रिकॉर्ड न होना, गंभीर प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है। तत्कालीन एसपी द्वारा 2015 में इन यात्रियों के आगमन की पुष्टि स्वयं सरकार के रिकॉर्ड का हिस्सा रही है। लेकिन यदि इनमें से कुछ लोग अब भी वहीं रह रहे हैं, स्थायी आवास बना चुके हैं और यहां तक कि वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करा चुके हैं—तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक शुचिता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा जांच की घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यह है कि यह जांच अब क्यों? यदि सरकार के पास वर्षों से यह सूचना थी कि विदेशी नागरिक धार्मिक वीजा पर आए हैं, तो उनकी वापसी की निगरानी क्यों नहीं की गई? वीजा नियमों का उल्लंघन केवल व्यक्ति का अपराध नहीं होता, बल्कि प्रशासन की निष्क्रियता भी उतनी ही जिम्मेदार होती है।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह स्पष्ट होगा कि नागरिकता सत्यापन और मतदाता सूची की प्रक्रिया में भारी चूक हुई है। इससे यह शंका भी बलवती होती है कि क्या वोटर लिस्ट को लेकर देशभर में उठ रहे सवाल केवल राजनीतिक शोर हैं, या इनके पीछे वास्तविक प्रशासनिक कमजोरियां हैं।
मतदाता सूची लोकतंत्र की आत्मा होती है। इसमें एक भी अपात्र नाम शामिल होना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। गोपालगंज प्रकरण इस बात की याद दिलाता है कि SIR जैसे अभ्यास क्यों आवश्यक हैं।
यही संदर्भ पश्चिम बंगाल के SIR विवाद से जुड़ता है, जहां राज्य सरकार द्वारा इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मांग थी कि SIR पर रोक लगाई जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में इसे अस्वीकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ का संदेश साफ है चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बंगाल के डीजीपी को नोटिस जारी करना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक संवैधानिक चेतावनी है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि चुनाव अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है और इसमें कोई कोताही स्वीकार्य नहीं होगी।
हालांकि, अदालत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ERO को 14 फरवरी के बाद एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया, ताकि नई तैनाती के साथ जांच प्रक्रिया सुचारु रूप से पूरी की जा सके। यह संतुलन दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट न तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करना चाहता है और न ही प्रशासनिक वास्तविकताओं से आंख मूंद रहा है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नागरिकता और वोटर लिस्ट जैसे संवेदनशील विषय भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बनते जा रहे हैं। बंगाल में SIR को “राजनीतिक हथियार” बताना और बिहार में विदेशी नागरिकों के मुद्दे को “चुनावी एजेंडा” कहकर खारिज करना दोनों ही रवैये लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जांच से किसे राजनीतिक लाभ होगा, बल्कि यह होना चाहिए कि सच क्या है और उसे सामने कैसे लाया जाए। यदि कोई भी विदेशी नागरिक अवैध रूप से मतदाता सूची में शामिल है, तो उसे हटाना न केवल कानूनी आवश्यकता है, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता भी।
गोपालगंज का मामला और बंगाल का SIR विवाद मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावी भाषणों से सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि सख्त प्रशासन, पारदर्शी जांच और स्वतंत्र संस्थाओं से मजबूत होता है।
राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इसे केंद्र बनाम राज्य या सरकार बनाम अदालत का मुद्दा न बनाएं। सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है संविधान, चुनाव प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकार सर्वोपरि हैं।
आज आवश्यकता है कि जांच निष्पक्ष हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और वोटर लिस्ट की शुद्धता को लेकर देशभर में एक समान, पारदर्शी और सख्त मानक लागू किया जाए। तभी राष्ट्र संवाद केवल राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा का माध्यम बन पाएगा।


