लेखक: संजय सक्सेना
यूपी एमएलसी चुनाव के हालिया नतीजों ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी, दोनों ही खेमों में अपनी-अपनी जीत के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत सत्ताधारी दल के लिए बेहद चिंताजनक है।
यूपी एमएलसी चुनाव में भाजपा की हार के गहरे निहितार्थ
भारतीय जनता पार्टी के पास पहले भी इन 11 में से छह सीटें थीं और इस बार भी वह छह सीटें अपनी झोली में डालने में सफल रही है, जिससे वह तकनीकी तौर पर अपनी स्थिति बरकरार रखने का दावा कर रही है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के लिए यह चुनाव एक बड़ी मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक बढ़त लेकर आया है, क्योंकि उसकी सीटों की संख्या में दो सीटों का इजाफा हो गया है। सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी यानी वाराणसी की स्नातक विधान परिषद सीट पर भाजपा को मिली करारी शिकस्त की हो रही है। वीवीआईपी क्षेत्र में सत्ताधारी दल की यह हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं है, बल्कि इसने पार्टी के भीतर सरकार और संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अखिलेश यादव की त्रिस्तरीय रणनीति का असर
इस चुनावी सफलता से उत्साहित होकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या और मथुरा के बाद अब काशी में भी भाजपा की हार और सपा की जीत को एक बड़ा सियासी संदेश बताया है। उन्होंने इसे प्रभु का विशेष आशीर्वाद करार देते हुए कहा है कि जनता अब बदलाव का मन बना चुकी है। सपा की इस अप्रत्याशित सफलता के पीछे पार्टी आलाकमान की एक बेहद सूक्ष्म और त्रिस्तरीय दीर्घकालिक रणनीति सक्रिय थी। अखिलेश यादव ने चुनाव की घोषणा से काफी पहले ही सिर्फ जिताऊ और स्थानीय समीकरणों में फिट बैठने वाले प्रत्याशियों का चयन कर लिया था, जिन्हें उन्होंने पीडीए के पांडव कहकर संबोधित किया।
जमीन पर चुपचाप किया गया सघन कार्य
विपक्ष की इस विशेष रणनीति के तहत केवल बड़े बयानों पर निर्भर रहने के बजाय चुपचाप जमीन पर काम किया गया। सपा ने अपने मौजूदा विधायकों, सांसदों के साथ-साथ पूर्व जनप्रतिनिधियों की एक विशाल टीम को सिर्फ मतदाता बनाने और जिलों में सघन प्रचार के लिए उतार दिया था। जिला संगठनों को सक्रिय कर हर एक बूथ स्तर पर स्नातक और शिक्षक मतदाताओं से सीधा संवाद साधा गया, जिसकी निरंतर समीक्षा खुद अखिलेश यादव कर रहे थे। सपा प्रमुख द्वारा वाराणसी और आगरा जैसे संवेदनशील केंद्रों पर 500-500 समर्पित कार्यकर्ताओं की टोलियां शिफ्ट में तैनात की गई थीं, ताकि वोटों की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
भाजपा संगठन में शीर्ष स्तर पर फैसलों में देरी
परिषद चुनाव में भाजपा आलाकमान की लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं रही। संगठन के शीर्ष स्तर पर फैसलों में देरी और मंत्रियों को सांगठनिक जिम्मेदारी सौंपने की नीति पार्टी पर भारी पड़ी है। उदाहरण के तौर पर, केंद्रीय मंत्री होने के कारण भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी संगठन के कार्यों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पा रहे हैं। एक व्यक्ति के पास दो बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होने की वजह से उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में संगठन को जिस सघन समय और ऊर्जा की आवश्यकता थी, वह उसे नहीं मिल सकी। इसका सीधा असर चुनाव की तैयारियों पर पड़ा।
वोटर लिस्ट प्रबंधन में घोर लापरवाही उजागर
जमीनी स्तर पर हालात इतने बदतर हो चुके थे कि बीजेपी के परंपरागत मतदाताओं का नाम तक पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी और कार्यकर्ता वोटर लिस्ट में शामिल नहीं करा पाए। पूरे प्रदेश में ऐसे तमाम स्नातक और शिक्षक मतदाता मौजूद थे, जो भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक समर्थक थे और चुनाव में वोट देना चाहते थे, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता और पार्टी की सुस्ती के कारण चाहकर भी उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सका। वोटर लिस्ट के प्रबंधन में बरती गई इसी घोर लापरवाही का नतीजा था कि भाजपा को अपनी मजबूत पकड़ वाली लखनऊ स्नातक सीट पर भी हार का मुंह देखना पड़ा। राजधानी में पार्टी के गढ़ में इस तरह की हार संगठन की आंखें खोलने वाली है। भारत निर्वाचन आयोग के मानकों के अनुरूप सूची प्रबंधन न होना घातक साबित हुआ।
मध्यम वर्ग और शिक्षित युवाओं में पनपता असंतोष
अगर समग्र रूप से इन 11 सीटों के चुनावी नतीजों का गहरा विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि मध्यवर्गीय, शिक्षक और शिक्षित युवा वर्ग, जो लंबे समय से भाजपा का मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है, उसके भीतर कहीं न कहीं व्यवस्था को लेकर असंतोष और नाराजगी पनप रही है। इसके विपरीत, भाजपा का चुनावी तंत्र अति-आत्मविश्वास का शिकार रहा। कार्यकर्ताओं में वह पुराना जोश और सक्रियता गायब दिखी, जो कभी पन्ना प्रमुख स्तर तक दिखाई देती थी। जब संगठन का कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाता है और मतदाता से सीधा संपर्क टूट जाता है, तो सत्ता का संरक्षण भी चुनाव जिताने में नाकाफी साबित होता है।
आने वाले चुनावों के लिए सबक और आत्मनिरीक्षण
इस चुनाव ने भाजपा को स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल बड़े नेताओं के दौरों और रैलियों के भरोसे स्थानीय और निकाय स्तर के चुनावों को नहीं जीता जा सकता। यदि वोटर लिस्ट तैयार करने जैसे बुनियादी संगठनात्मक कार्यों में इतनी बड़ी कोताही बरती जाएगी, तो आने वाले बड़े चुनावों में इसके और भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। काशी और लखनऊ जैसे शहरों में मिली हार भाजपा के लिए आत्मनिरीक्षण का एक बड़ा अवसर है, जहां उसे सरकार और संगठन के बीच के संतुलन को फिर से कायम करना होगा।

