लेखक: अजय कुमार
बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता न मिलना पार्टी के लिए गंभीर चेतावनी है। चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों के नतीजों ने साबित कर दिया कि हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की रणनीति अब काम नहीं आएगी। जब मतपत्र से चुनाव हुए तब भी कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में नाकाम रही, खासकर उस कर्नाटक में जहां उसकी अपनी सरकार है।
बैलेट पेपर से हुए चुनाव और कर्नाटक का झटका
कर्नाटक में सत्ता हाथ में होने के बावजूद कांग्रेस चारों सीटें भाजपा-जद(एस) गठबंधन के हाथों हार गई। शिक्षक और स्नातक मतदाता जिन्हें प्रबुद्ध वर्ग माना जाता है, उन्होंने सत्ताधारी दल पर भरोसा नहीं जताया। यह महज चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक खोखलेपन का प्रमाण है। उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय संगठन की निष्क्रियता और सरकार के कामकाज से शिक्षित वर्ग का असंतोष इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
नागपुर की जीत और उसकी सीमाएं
नागपुर में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराया। वंजारी को 67,231 वोट मिले जबकि कोहले को 63,960। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय वाले शहर में यह जीत मनोबल बढ़ाने वाली है, लेकिन एक सीट की जीत से व्यापक संगठनात्मक कमजोरी ढक नहीं सकती। बिहार में सहयोगी दल जीते मगर कांग्रेस अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर सकी। गठबंधन की बैसाखी पर चलना और अपने दम पर जनाधार बनाना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।
ईवीएम बनाम बैलेट: बहानेबाजी का अंत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैलेट पेपर के नतीजों पर तंज कसा तो कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने वाराणसी में भाजपा की हार और नागपुर में अपनी जीत का हवाला देकर पलटवार किया। उनका तर्क सही है कि भाजपा को भी आत्ममंथन करना चाहिए, लेकिन दूसरे की हार गिनाने से अपनी हार का हिसाब खत्म नहीं होता। वाराणसी में भाजपा की पराजय कांग्रेस की जीत नहीं है। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर याचिकाएं खारिज करते हुए बैलेट पेपर व्यवस्था में लौटने की मांग ठुकरा दी थी। इसका अर्थ यह नहीं कि सवाल नहीं उठाए जा सकते, लेकिन गंभीर आरोपों के लिए गंभीर प्रमाण भी चाहिए। केवल संदेह दोहराने से वह तथ्य नहीं बन जाता।
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं की संख्या सीमित होती है, पर उनका प्रभाव व्यापक होता है। शिक्षक जनमत तैयार करते हैं, स्नातक रोजगार, महंगाई और शासन पर दलों को परखते हैं। यदि कांग्रेस इन वर्गों में प्रभाव खो रही है, तो उसे अपने राजनीतिक संदेश और संगठन दोनों की पड़ताल करनी होगी। चुनाव केवल नारों से नहीं, मतदाता के भरोसे से जीते जाते हैं।
आगे की राह: बहाने या भरोसा?
भाजपा को भी इन नतीजों से अजेय होने का भ्रम नहीं पालना चाहिए। वाराणसी में सपा की जीत और नागपुर में कांग्रेस की सफलता बताती है कि मजबूत गढ़ भी दरक सकते हैं। मगर कांग्रेस को समझना होगा कि भाजपा की कमजोरी अपने आप उसकी ताकत नहीं बन जाती। विपक्ष बनने के लिए आलोचना काफी नहीं, ठोस विकल्प देना पड़ता है। बेरोजगारी और महंगाई पर सवाल जरूरी हैं, लेकिन उनसे निपटने की ठोस नीति पेश करना उससे ज्यादा जरूरी है।
कांग्रेस के सामने दो रास्ते हैं: हर हार के बाद नए आरोपों की ढाल तलाशे या संगठन, नेतृत्व और नीतियों की कमजोरियों पर ईमानदारी से काम करे। पहला रास्ता आसान है मगर राजनीतिक रूप से खोखला, दूसरा कठिन है मगर वापसी की संभावना उसी में है। बैलेट पेपर हो या ईवीएम, मतदाता अंततः अपने अनुभव और भरोसे के आधार पर फैसला करता है। जनता को बहाने नहीं, भरोसेमंद विकल्प चाहिए और भरोसा बयानबाजी से नहीं, जमीन पर किए गए काम से बनता है। अधिक जानकारी के लिए भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

