विज्ञापनों पर जनता के पैसों की अनावश्यक बर्बादी सही नहीं
देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता, राजनीति और प्रचार का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है, लेकिन सवाल तब उठता है कि जब जनता के पैसों से ऐसे आयोजनों का जश्न मनाया जाने लगे, जिनका न तो किसी ऐतिहासिक महत्व से संबंध हो और न ही किसी जनकल्याणकारी योजना से। पांच साल, दस साल, 25 साल, 50 साल या 100 साल जैसे पड़ावों पर जश्न मनाना समझ में आता है, लेकिन 23 साल पूरे होने पर उत्सव और उस पर करोड़ों रुपये खर्च किया जाना स्वाभाविक तौर पर सवाल खड़े करता है।

गुजरात में 7 अक्टूबर 2024 को ऐसा ही एक मामला सामने आया। इस तारीख को नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक पद पर आने के 23 वर्ष पूरे हुए। 2001 में वे पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, और उसके बाद प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। इस अवसर पर गुजरात सरकार ने सफल और सक्षम नेतृत्व के 23 वर्ष और विकास सप्ताह के नाम से बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियान चलाया। इन विज्ञापनों में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती दिनों की तस्वीर से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री के रूप में उनकी छवि तक को उभारा गया।
सूचना के अधिकार के तहत जो आंकड़े सामने आए, उनके अनुसार इन दोनों अभियानों पर कुल मिलाकर लगभग 8.81 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसमें से करीब 2.12 करोड़ रुपये अखबारों में विज्ञापनों पर, 3.05 करोड़ रुपये प्रिंट मीडिया में विकास सप्ताह प्रचार पर और लगभग 3.64 करोड़ रुपये इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सोशल मीडिया प्रचार पर खर्च किए गए।

यानी जनता के पैसों से केवल दो अभियानों के लिए लगभग नौ करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। दिलचस्प यह है कि विज्ञापनों का स्वरूप ऐसा था जिसमें मोदी की राजनीतिक यात्रा और उनकी उपलब्धियों को केंद्र में रखा गया। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की ओर से दिए गए बधाई संदेशों में मोदी को विकास पुरुष, यशस्वी प्रधानमंत्री और गुजरात के गौरव जैसे विशेषणों से अलंकृत किया गया।
यहां मूल सवाल यह है कि क्या सरकारी विज्ञापनों का उद्देश्य यही है कि किसी नेता की प्रशंसा की जाए? सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में ‘कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ’ मामले में स्पष्ट किया था कि सरकारी विज्ञापनों का मकसद जनता को नीतियों, योजनाओं और सेवाओं के बारे में जानकारी देना होना चाहिए। अदालत ने कहा था कि प्रधानमंत्री की तस्वीर योजनाओं के प्रचार में शामिल की जा सकती है, लेकिन विज्ञापन का उद्देश्य प्रधानमंत्री या किसी व्यक्ति विशेष का प्रचार नहीं होना चाहिए।
स्पष्ट है कि गुजरात सरकार के विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा मोदी के ‘23 वर्ष पूरे होने’ पर केंद्रित था। इस मौके का न तो किसी योजना से सीधा संबंध था और न ही जनता के हित में कोई नई जानकारी दी गई। ऐसे में, यह तर्क मजबूत होता है कि यह महज़ आत्म-प्रचार का मामला था, जिसमें जनता के पैसे का इस्तेमाल किया गया।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारें जनता के पैसों की ट्रस्टी होती हैं। संविधान या किसी भी क़ानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि कोई नेता अपनी व्यक्तिगत छवि निखारने के लिए सरकारी खजाने से विज्ञापन जारी कर सके। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है ताकि वे उसके लिए फैसले लें और पैसे का इस्तेमाल विकास कार्यों में करें। लेकिन जब वही पैसा व्यक्तिगत या दलगत प्रचार में लगने लगे तो लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट होती है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे विज्ञापन मूलतः तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा हैं। छोटे नेता बड़े नेता को खुश करने के लिए इस तरह के प्रचार करते हैं, लेकिन इसका जनता को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलता। उनका तर्क है कि सरकारी नीतियों की पहचान किसी चेहरे से नहीं, बल्कि उनके असर से होती है। ऐसे विज्ञापन चुनावी गणित से भी जुड़े होते हैं, हालांकि गुजरात में उस समय कोई तत्काल चुनाव निर्धारित नहीं था, लेकिन मोदी की छवि को लगातार मजबूत बनाए रखना बीजेपी के लिए जरूरी है। पार्टी की रणनीति में मोदी का चेहरा सबसे बड़ा ब्रांड है और उसे लगातार चमकाते रहना राजनीतिक रूप से फायदेमंद माना जाता है।

यह सिलसिला केवल बीजेपी तक सीमित नहीं है। देश की अन्य राज्यों में गैर-बीजेपी सरकारें भी नेताओं की छवि को बढ़ावा देने के लिए इसी तरह के विज्ञापन देती रही हैं। फर्क बस इतना है कि गुजरात में 23 साल पूरे होने जैसे अपेक्षाकृत अजीब अवसर पर इतना बड़ा अभियान चलाया गया, जिससे इसकी आलोचना और बढ़ गई।
इस तरह के विज्ञापन जनता या जनकल्याण से जुड़े नहीं होते, बल्कि यह किसी बड़े नेता की प्रशंसा में जनता के पैसों को खर्च करने की कवायद होती है। अगर, सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाए और उसका लाभ समाज के वंचित वर्ग को मिले तो उसका औचित्य समझा जा सकता है, लेकिन किसी नेता की तारीफ के लिए विज्ञापन देना समाज के लिए बेनतीजा है। किसी सरकार का पांच साल या दस साल का कार्यकाल पूरा होने पर उपलब्धियों का ब्यौरा दिया जा सकता है, लेकिन 23 साल पूरे होने जैसी बात पर भारी-भरकम विज्ञापन सवाल पैदा करते हैं।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकारी विज्ञापन राजनीतिक रूप से तटस्थ होने चाहिए। इनमें किसी दल या नेता की प्रशंसा नहीं होनी चाहिए और इन्हें जनता को योजनाओं की जानकारी देने तक सीमित रहना चाहिए। समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जनता के पैसे का इस्तेमाल किसी नेता की सकारात्मक छवि बनाने या विपक्ष की नकारात्मक छवि दिखाने के लिए नहीं किया जा सकता, लेकिन व्यवहार में इन दिशानिर्देशों का पालन शायद ही कभी होता है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर आए दिन ऐसे विज्ञापन जारी करती हैं, जिनमें नेता की छवि सबसे आगे रखी जाती है। इस पूरे मामले का एक और पहलू है मीडिया। जब सरकारें बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर खर्च करती हैं, तो अखबार और चैनल उनके प्रमुख ग्राहक बन जाते हैं। इससे मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित होती है और सरकार की आलोचना करने में संस्थान हिचकने लगते हैं। सरकारें विज्ञापनों के जरिए मीडिया को परतंत्र बना रही हैं। लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन इस तरह की नीतियां उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर देती हैं।

जनता से वसूले गए टैक्स का इस्तेमाल जब शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढांचे की बजाय आत्म-प्रचार पर होने लगे तो यह सीधे-सीधे जनता के विश्वास का अपमान है। जनता सरकार को चुनती है, ताकि उसके हित में फैसले हों, लेकिन जब वही सरकार उसके पैसों का इस्तेमाल किसी नेता की प्रशंसा के लिए करती है, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचती है। कुल मिलाकर, गुजरात में मोदी के सार्वजनिक पद पर 23 साल पूरे होने के अवसर पर दिया गया विज्ञापन अभियान केवल एक उदाहरण है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिवाद किस तरह संस्थागत रूप ले चुका है। यह सिर्फ बीजेपी या मोदी तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर दल और राज्य में यही प्रवृत्ति देखी जाती है। फर्क सिर्फ अवसरों और पैमाने का है।
सवाल यह नहीं है कि मोदी ने 23 साल में क्या हासिल किया। सवाल यह है कि जनता के पैसों से उनकी प्रशंसा क्यों की गई? यदि सरकारें अपने नेताओं की उपलब्धियों का जश्न मनाना चाहती हैं तो उसके लिए पार्टी फंड का इस्तेमाल कर सकती हैं। लेकिन सरकारी खजाने से ऐसे अभियान चलाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ अन्याय है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद इस तरह के विज्ञापन लगातार दिए जा रहे हैं। यह न सिर्फ जनता के पैसे की बर्बादी है, बल्कि लोकतंत्र की उस भावना का भी उल्लंघन है जिसमें जनता सर्वोपरि है और सरकार उसके प्रति जवाबदेह।

लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव जीतना नहीं है, बल्कि जनता के पैसे और विश्वास की रक्षा करना भी है। जब सरकारें इस जिम्मेदारी को भूल जाती हैं और जनता के पैसे का इस्तेमाल आत्म-प्रचार के लिए करती हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है। गुजरात का यह प्रकरण उसी प्रवृत्ति का हिस्सा है, जो धीरे-धीरे भारतीय राजनीति का सामान्य अभ्यास बनता जा रहा है।

