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    Home »  डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी 134वी जयंती पर उन्हें शत शत नमन
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     डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी 134वी जयंती पर उन्हें शत शत नमन

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 21, 2021No Comments5 Mins Read
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    डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी 134वी जयंती पर उन्हें शत शत नमन

    अविभजित बिहार के विकास में उनके अतुलनीय, अद्वितीय व अस्मरणीय योगदान के लिए “बिहार केसरी” श्रीबाबू को आधुनिक बिहार के निर्माता के रूप में जाना जाता है। अधिकांश लोग उन्हें सम्मान और श्रद्धा से “बिहार केसरी” और “श्रीबाबू” के नाम से संबोधित करते हैं।श्री बाबू एक महान समाज सुधारक और न्यायप्रेमी व्यक्ति थे। उनके समय में बिहार विकास के क्षेत्र में भारत का पहला राज्य था। उन्होंने सबसे पहले जमीदारी प्रथा का उन्मूलन किया था। वह बिहार के मुख्यमंत्री होने के साथ ही एक प्रसिद्ध अधिवक्ता भी थे।

    भारत के अखंड बिहार राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री 1946 से 1961 तक मात्र 10 वर्षों के शासनकाल में बिहार में उद्योग, कृषि, शिक्षा, सिंचाई, स्वास्थ्य, कला व सामाजिक क्षेत्र में की उल्लेखनीय कार्य हुये। उनमें आजाद भारत की पहली रिफाइनरी- बरौनी ऑयल रिफाइनरी, आजाद भारत का पहला खाद कारखाना- सिन्दरी व बरौनी रासायनिक खाद कारखाना, एशिया का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग कारखाना-भारी उद्योग निगम (एचईसी) हटिया, देश का सबसे बड़ा स्टील प्लांट-सेल बोकारो, बरौनी डेयरी, एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड-गढ़हरा, आजादी के बाद गंगोत्री से गंगासागर के बीच प्रथम रेल सह सड़क पुल-राजेंद्र पुल, कोशी प्रोजेक्ट, पुसा व सबौर का एग्रीकल्चर कॉलेज, बिहार, भागलपुर, रांची विश्वविद्यालय इत्यादि जैसे अनगिनत उदाहरण हैं। उनके शासनकाल में संसद के द्वारा नियुक्त फोर्ड फाउंडेशन के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री एपेल्लवी ने अपनी रिपोर्ट में बिहार को देश का सबसे बेहतर शासित राज्य माना था और बिहार को देश की दूसरी सबसे बेहतर अर्थव्यवस्था बताया था।

    वोट मांगने नहीं जाते थे श्री बाबू

    बिहार में विधानसभा चुनाव के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक अपने प्रत्याशियों के लिए चुनावी मैदान में जाकर वोट मांग रहे हैं। लेकिन बिहार केसरी श्री बाबू चुनाव के दौरान श्री बाबू प्रत्याशियों के लिए तो क्या अपने लिए भी वोट मांगने नहीं जाते थे। दरअसल, श्री बाबू 1946 में बिहार के सीएम बने थे और 1961 तक इसी पद पर रहे। उनसे जुड़ा यह किस्सा साल 1957 का है, उस वक्त वह शेखपुरा जिले के बरबीघा से चुनाव लड़ रहे थे। उस दौरान उन्होंने अपने सहयोगियों से साफ कह दिया था कि इस चुनाव में वह जनता से वोट मांगने नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने काम किया होगा या जनता मुझे इस लायक समझेगी, तो वोट देगी। अगर मुझे लायक नहीं समझेगी तो वोट नहीं देगी।

    सुरक्षाकर्मियों को छोड़ देते थे बाहर

    बिहार के बुजुर्ग लोग बताते हैं कि श्री बाबू जब सीएम थे तो कई बार अपने गांव भी जाते थे। उस वक्त वह अपने सुरक्षाकर्मियों को गांव के बाहर ही छोड़ देते थे। वह कहते थे कि यह मेरा गांव है। यहां मुझे कोई खतरा नहीं। बिहार के लोग आज भी कहते हैं कि श्री बाबू कभी अपने क्षेत्र में वोट मांगने नहीं आते थे। वह हमेशा लोगों के लिए सुलभ रहते थे।

    जन्म स्थान – खनवां गांव जो नवादा जिला में हैं। जहां उनका ननिहाल था। इनमें उनकी स्मृति में एक स्मारक भवन, पार्क, पॉलीटेक्निक कॉलेज, हॉस्पिटल, पावर हाउस, पावर ग्रिड इत्यादि का निर्माण प्रमुख हैं।

    पैतृक गांव- माउर जो शेखपुरा जिला में हैं।यहां उनकी स्मृति में एक प्रवेश द्वार बनाया गया है, श्रीबाबू के पैतृक आवास पर व बरबीघा चौक पर एक-एक प्रतिमा स्थापित की गई है, विभिन्न शिक्षण संस्थाओं का नामांकरण श्रीबाबू की स्मृति में किया गया है इत्यादि।

    कर्मभूमि गढ़पुरा- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गांधी जी ने गुजरात में साबरमती आश्रम से लगभग 340 किलोमीटर की पदयात्रा कर दांडी में अंग्रेजी हुकूमत के काले नमक कानून को भंग किया था। गांधी जी के आहवान पर बिहार में “बिहार केसरी” डॉ. श्रीकृष्ण सिंह “श्रीबाबू” ने मुंगेर से गंगा नदी पार कर लगभग 100 किलोमीटर लंबी दुरूह व कष्टप्रद पदयात्रा कर गढ़़पुरा के दुर्गा गाछी में अपने सहयोगियों के साथ अंग्रेजों के काले नमक कानून को तोड़ा था। इस दरम्यान ब्रिटिश फौज़ के जूल्म से उनका बदन नमक के खौलते पानी से जल गया था,पर वह हार नहीं माने थे। गढ़़पुरा के इस ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के बाद महात्मा गांधी ने उन्हें बिहार के प्रथम सत्याग्रही कहा था। स्वतंत्रता संग्राम की इस अनमोल विरासत व श्रीबाबू की कर्मभूमि के दिन बहुरने लगे हैं। यहां एक स्मारक निर्माणाधीन है, इस हेतु भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है।
    ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह की स्मृति में पिछले 8 वर्षों से एक पदयात्रा “गढ़़पुरा नमक सत्याग्रह गौरव यात्रा” का आयोजन किया जा रहा है। वर्तमान में यह पदयात्रा प्रतिवर्ष 17 अप्रैल को मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवा सदन से प्रारंभ होकर वाया बलिया, बेगूसराय, मंझौल, रजौड़ 21 अप्रैल को गढ़़पुरा पहुंचती है। सरकार ने बेगूसराय से गढ़़पुरा नमक सत्याग्रह स्थल तक जाने वाली लगभग 34 किलोमीटर लंबी सड़क का नामांकरण “नमक सत्याग्रह पथ” किया है। किसी भी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में नामांकित देश की यह सबसे लंबी सड़क है। गढ़़पुरा के छोटे से हॉल्ट जैसे स्टेशन का नामांकरण श्रीबाबू की स्मृति में “डॉ.श्रीकृष्ण सिंह नगर-गढ़पुरा” किया गया है जिसका स्टेशन कोड DSKG है। यहां करोड़ों की लागत से कई उल्लेखनीय विकास कार्य हुए हैं और यात्री सुविधाओं का विस्तार हुआ है।
    मुंगेर में कष्टहरणी घाट के निकट गंगा नदी पर नवनिर्मित रेल सह सड़क पुल का आधिकारिक रूप से नामांकरण “श्रीकृष्ण सेतु” किया गया है। पटना में गांधी मैदान के उत्तरी भाग में राजधानी का सबसे बड़ा सभागार “श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल” का निर्माण किया गया है। जहां उनकी एक आदमकद प्रतिमा भी स्थापित किया गया है। गांधी मैदान,पटना के पश्चिमी छोड़ पर श्रीबाबू की स्मृति में “श्रीकृष्ण विज्ञान केन्द्र” की स्थापना की गई है।
    बेगूसराय के जीडी कॉलेज, श्रीकृष्ण महिला कॉलेज, नगर निगम चौक, कचहरी रोड, श्रीकृष्ण इंडोर स्टेडियम व रिफाइनरी टाउनशिप में “बिहार केसरी” श्रीबाबू की स्मृति में प्रतिमा स्थापित की गई है। श्रीबाबू की स्मृति में यहां एक इनडोर स्टेडियम और कचहरी रोड पर जिला परिषद का एक विशाल कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स भी है।
    उनके नाम से झारखंड की राजधानी राँची में एक पार्क है। किसी समय में झारखंड बिहार ही का भाग था।

    धीरज कुमार
    धरहरा, हाजीपुर, वैशाली

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