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    Home » देवानंद सिंह के संपादकत्त्व में छपने वाली राष्ट्रसंवाद पत्रिका किसी भी राष्ट्रीय पत्रिका से किसी मायने में कमतर नहीं:वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान
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    देवानंद सिंह के संपादकत्त्व में छपने वाली राष्ट्रसंवाद पत्रिका किसी भी राष्ट्रीय पत्रिका से किसी मायने में कमतर नहीं:वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 13, 2023Updated:March 13, 2023No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह के संपादकत्त्व में छपने वाली राष्ट्रसंवाद पत्रिका किसी भी राष्ट्रीय पत्रिका से किसी मायने में कमतर नहीं:वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान

    झारखंड की औद्योगिक राजधानी जमशेदपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका राष्ट्र संवाद अपनी स्थापना के 23वर्ष पूरे कर 24वें वर्ष में प्रवेश कर रही है. श्री देवानंद सिंह के संपादकत्त्व में छपने वाली यह पत्रिका किसी भी राष्ट्रीय पत्रिका से किसी मायने में कमतर नहीं है. मैं पिछले करीब 12-13 साल से देवानंद जी के संपर्क में हूं और इस पत्रिका को भी निरंतर देखने का अवसर मिलता रहा है. आमतौर पर क्षेत्रीय पत्रिकाओं मैं कुछ ना कुछ कमी दिखाई दे जाती है, चाहे वह कंटेंट के स्तर पर हो, कागज और छपाई के स्तर पर हो या फिर मेकअप, साज-सज्जा और कलेवर के स्तर पर.

     

     

    लेकिन राष्ट्र संवाद को देखकर कहीं से नहीं लगता कि यह पत्रिका क्षेत्रीय है. इसका तेवर, कलेवर और कंटेंट सबकुछ राष्ट्रीय स्तर का है और सही मायने में यह राष्ट्रीय पत्रिका ही है. आमतौर पर हम महानगरों से छपनेवाले पत्र-पत्रिकाओं को राष्ट्रीय मान लेते हैं, चाहे उनका प्रसार वहीं तक सीमित हो. लेकिन राष्ट्र संवाद सही मायने में राष्ट्रीय है, क्योंकि इसका प्रसार हिदी पट्टी के प्रमुख इलाके तक है. और यह सब संभव हो पाया है इसके संपादक देवानंद जी की लगन, समर्पण और पत्रकारिता के प्रति उनके जुनून के कारण.

     

    इतने लंबे समय तक किसी पत्रिका को चलाना ही अपने-आप में एक बड़ा दुश्वारी और चुनौती भरा काम है. पिछले 20-25 साल में हमने कितनी ही पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और समाचार चैनलों को खुलते और बंद होते देखा है. इसके कई कारण रहे हैं. कभी पूंजी का अभाव, कभी कागज और मुद्रण की बढ़ती लागत, तो कभी विज्ञापनों का अभाव. कोरोना काल में तो बड़े अखबारों और मैगजीन में भी विज्ञापन लगभग बंद हो गए थे, तो छोटे पत्र-पत्रिकाओं को कहां से मिलते. उन्हें तो सामान्य दिनों में भी विज्ञापन कम ही मिलते हैं.

     

    ऐसी स्थिति में भी किसी पत्र- पत्रिका का प्रकाशन निरंतर जारी रखना और उसका स्तर बनाए रखना एक बेहद चुनौती भरा कार्य है, जिसे देवानंद जी ने बखूबी निभाया है. उनका सहयोग उनके छोटे भाई धीरज सिंह करते आ रहे हैं और अब तो उनके सुपुत्र भी इस कार्य में उनका बखूबी हाथ बंटा रहे हैं.

    देवानंद जी के साथ समर्पित पत्रकारों की एक टीम है और यह टीम पूरे भारत में फैली हुई है. मैं देवानंद जी को विगत एक दशक से ज्यादा समय से निजी रूप से जानता हूं और उनके श्रम को और उनके समर्पण को भी मैंने देखा और जाना है. आज जहां पत्रकारिता के नाम पर एक मोबाइल लेकर लोग कुछ भी बोल और दिखा रहे हैं, वैसे में पत्रकारिता के मानकों को स्थापित रखने में राष्ट्र संवाद जैसी पत्रिकाएं और देवानंद जी जैसे संपादक आज के दौर में बेहद अहम जान पड़ते हैं.

     

    हम जानते हैं कि आजादी के पहले से ही पत्रकारिता की दो धाराएं रही हैं. एक मुख्यधारा की पत्रकारिता जिनकी कमान बड़े समूहों के हाथ में रही. इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, ट्रिब्यून और ऐसे ही दूसरे अखबार थे, जो अंग्रेज मालिकों द्वारा निकाले गए और बाद में हिंदुस्तानी धनाढ्य वर्ग ने उनका अधिग्रहण कर लिया और वे अभी भी चल रहे हैं. आजादी के बाद मुख्य धारा की इस पत्रकारिता में नये घराने भी जुड़े, लेकिन आजादी के पहले जो असली पत्रकारिता थी, वह मुख्यधारा की मीडिया ने नहीं की. उसे छोटे पत्र-पत्रिकाओं ने बखूबी निभाया और इन्हें किसी बड़े औद्योगिक घराने या किसी बड़े व्यापारिक घराने ने नहीं निकाला,

     

    बल्कि इसे उन लोगों ने निकाला जो आजादी की लड़ाई में या तो सीधे तौर पर भागीदार थे या जो आजादी के कट्टर समर्थक थे. राजा राममोहन राय, जुगल किशोर, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक जैसे जुनूनी लोगों ने आजादी के पहले प्रेस के दमन के दौर में भी सच्ची पत्रकारिता की मशाल को जलाए रखा. उस दौर में छोटे पत्र-पत्रिकाओं ने जो काम किया, वह बड़े और मुख्यधारा के अखबारों ने नहीं किया.

    आज के दौर में जब मीडिया और पत्रकारों को “गोदी मीडिया” और “भक्त मीडिया”, प्रेस्टीट्यूट और पत्तलकार जैसे विशेषणों से संबोधित किया जा रहा है और ज्यादातर मीडिया हाउसेज और बड़े पत्रकार किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहे हैं, निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारिता करना भी कांटों पर चलने से कम नहीं रह गया है. लेकिन सुखद बात यह है कि सरोकार की पत्रकारिता की मशाल देवानंद जी जैसे लोगों ने थाम रखी है. इससे लगता है कि पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.

     

    मुझे खुशी है कि राष्ट्र संवाद अगले साल अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर जाएगा. इस खुशी के अवसर पर मैं राष्ट्र संवाद परिवार और खासतौर पर इसके संपादक देवानंद जी को बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि आनेवाले समय में भी यह पत्रिका सरोकारी और निष्पक्ष पत्रकारिता के मानकों को पूरा करते हुए निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता के नए मानदंड स्थापित करेंगे. एक बार पुनः मेरी तरफ से राष्ट्र संवाद परिवार को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं.
    आनंद कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान

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