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    डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर होने की जरूरत

    News DeskBy News DeskSeptember 1, 2024No Comments4 Mins Read
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    डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर होने की जरूरत
    देवानंद सिंह
    कोलकाता के अस्पताल में ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। इस घटना ने अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा के मुद्दे को एक बार फिर से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया है। इस संदर्भ में भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) द्वारा किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण के परिणाम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नाइट शिफ्ट के दौरान डॉक्टर खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्थिति केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं बल्कि एक गंभीर और व्यापक समस्या है, जिसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    दरअसल, आईएमए को गूगल फॉर्म के जरिए किए गए सर्वे में 3885 रिस्पॉन्स मिले, जिसमें एक तिहाई डॉक्टरों ने माना कि नाइट ड्यूटी के दौरान उन्हें डर लगता है, इसमें से ज्यादातर लेडी डॉक्टर शामिल हैं। नाइट शिफ्ट करने वाले डॉक्टरों की सुरक्षा संबंधित विषयों का विश्लेषण करने के लिए किए गए सर्वे में पाया गया कि 45 प्रतिशत को नाइट शिफ्ट के दौरान ‘ड्यूटी रूम’ तक नहीं मिलता। जिनके पास ड्यूटी रूम होता है, वे फिर भी खुद को थोड़ा सुरक्षित पाते हैं।

     

     

    वहीं, आधे से ज्यादा मामलों (53 प्रतिशत) में ड्यूटी रूम अस्पताल में वॉर्ड या कैजुएलिटी एरिया से बहुत दूर होता है। ड्यूटी रूम में लॉक तक नहीं होता, जहां पर ड्यूटी रूम है, वहां पर एक तिहाई जगहों पर ड्यूटी रूम में अटैच बाथरूम नहीं होता। भीड़भाड़ वाले अस्पतालों में डॉक्टरों को इसी तरह के ड्यूटी रूम में आराम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। डॉक्टरों के रिस्पॉन्स से यह भी सामने आया है कि अस्पताल और मेडिकल कॉलेज प्रशासन का ढुलमुल रवैया, सुरक्षा को लेकर गंभीर न होना भी आम बात है, जो निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है। सर्वे में सामने आया है कि मेडिकल संस्थानों में ट्रेंड सिक्योरिटी स्टाफ की भी कमी है।

     

     

    ऐसी स्थिति में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर यह विचार करना आवश्यक है कि अस्पताल एक ऐसा स्थान है, जहां काम करते हुए डॉक्टरों को मानसिक और शारीरिक सुरक्षा की पूरी गारंटी मिलनी चाहिए। यह एक ऐसा पेशा है, जिसमें दिन-रात, सप्ताह के सातों दिन काम किया जाता है। नाइट शिफ्ट के दौरान डॉक्टरों की सुरक्षा की कमी का सीधा असर उनके कामकाजी माहौल और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। निश्चित ही, नाइट शिफ्ट के दौरान डॉक्टरों की सुरक्षा की स्थिति काफी चिंताजनक है। कई डॉक्टरों ने यह भी कहा कि उन्हें काम के दौरान सुरक्षा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    इसके अलावा, अस्पतालों में भीड़-भाड़ और कभी-कभी हिंसक परिदृश्यों का सामना करना पड़ता है, जो कि उनकी सुरक्षा को खतरे में डालता है। लिहाजा, अस्पतालों को अपने सुरक्षा प्रोटोकॉल की पुनरावृत्ति और अपडेट की आवश्यकता है। सुरक्षा कैमरे, सुरक्षा गार्ड्स और आपातकालीन अलार्म जैसे तकनीकी और मानव संसाधन सुरक्षा उपकरणों को मजबूत किया जाना चाहिए। अस्पतालों में कम सैलरी पर सुरक्षा गार्ड्स को रखा जाता है, जो आपात स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं होते हैं।

     

     

    लिहाजा प्रशिक्षित सुरक्षा गार्ड्स की तैनाती की जानी चाहिए। वहीं, डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ के लिए नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इन प्रशिक्षणों में उन्हें न केवल संभावित खतरों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में सही प्रतिक्रिया देने की विधियों का भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

    हाई रिस्क एरिया जैसे कैजुएलिटी और आईसीयू में एक्स सर्विसमैन और बाउंसरों की नियुक्ति भी की जानी चाहिए। साथ ही, महिला सुरक्षा गार्ड्स भी होनी चाहिए। अस्पताल में पुलिस चेकपोस्ट होनी चाहिए। अस्पतालों में जूनियर डॉक्टर्स सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार होते हैं और प्रशासन को उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।  वहीं, अस्पतालों में सुरक्षा नियमों और उपायों का कठोर कार्यान्वयन होना चाहिए। इसका मतलब है कि सुरक्षा गार्ड्स की तैनाती और सीसीटीवी कैमरों की सक्रिय निगरानी सुनिश्चित की जाए।

    इसके अलावा, डॉक्टरों को एक सशक्त समर्थन नेटवर्क की आवश्यकता होती है। इसमें न केवल अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी होती है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग का भी सहयोग आवश्यक है। आपसी सहयोग से ही हम एक सुरक्षित माहौल सुनिश्चित कर सकते हैं। समाज में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के प्रति सम्मान और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जागरूकता अभियानों और शिक्षा की आवश्यकता है, ताकि लोगों को समझाया जा सके कि डॉक्टरों की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

     

    डॉक्टरों की सुरक्षा केवल उनके व्यक्तिगत अधिकार का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब डॉक्टर सुरक्षित होंगे, तभी वे अपनी पूरी क्षमता और समर्पण के साथ मरीजों की देखभाल कर पाएंगे। सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदम अस्पतालों में कार्यरत लोगों की सुरक्षा को बेहतर बनाएंगे और समाज में चिकित्सा पेशे के प्रति सम्मान और विश्वास को भी बढ़ाएंगे।

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