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    ओज और पुरुषार्थ का स्वर : राष्ट्र कवि दिनकर

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 24, 2025No Comments3 Mins Read
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    ओज और पुरुषार्थ का स्वर : राष्ट्र कवि दिनकर

    शब्दों में ओज और साहस की ज्वाला लिए जिस साहित्यकार की रचना आज भी हमारी धमनियों में देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित करती है, उस शब्द ऋषि रामधारी सिंह दिनकर की आज जयंती है। इन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से साहित्य और राजनीति के बीच एक संतुलित सेतु का निर्माण किया । इनकी रचनाओं और शब्दों में जो भावनाएं होती थी उसमें जनमानस की पीड़ा और उसके अधिकारों की बात प्रमुखता से होती थी । यह बात अद्भुत थी कि स्वयं सत्ता के गलियारों से जुड़े रहने के बाद भी उनके सिर पर राजनीतिक स्वार्थ और सरोकार ने कभी अनधिकृत हमला नहीं किया।

     

     

    अपनी रचनाओं में इन्होंने सदैव जनता की आवाज को ही अपनी आवाज माना। कभी भी किसी को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने कलम नहीं थामा। उनके अंतर्मन में जो भी कथा और व्यथा रही उन्होंने उसी को आधार मानकर अपनी साहित्यिक रचनाएं लिखी। एक बार एक अंग्रेज अधिकारी वौस्टेड ने पूछा, ‘क्या आप रेणुका के लेखक हैं ?’ दिनकर जी ने स्वीकार किया। वौस्टेड बोला, ‘आपने सरकार विरोधी कविताएं क्यों लिखीं? प्रकाशन से पहले आपने सरकार से अनुमति क्यों नहीं मांगी?’ दिनकर जी ने कहा, ‘मेरा भविष्य साहित्य में है। अनुमति मांगकर किताबें छपवाने से मेरा भविष्य बिगड़ जाएगा। और रेणुका की कविताएं सरकार विरोधी नहीं, मात्र देशभक्तिपूर्ण हैं। अगर देशभक्ति अपराध हो, तो मैं वह बात जान लेना चाहूंगा।’

     

     

    वौस्टेड बोला, ‘देशभक्ति अपराध नहीं है, वह अपराध कभी नहीं होगी।’ और दिनकर जी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
    ऐसे बेबाक और हाज़िरजवाब थे हम सबके दिनकर।
    “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” में इन्होंने जनता के स्वर के साथ निर्भीक होकर अपना स्वर मिलाया जबकि उर्वशी में इन्होंने प्रेम पथ के पथिक की भावनाओं को भी श्रृंगारित किया।
    इन्हें विपरीत भावनाओं के बीच संतुलन बिठाने की कला में महारत हासिल था ।

     

    इन्होंने कहा है कि “परंपरा और विद्रोह, जीवन में दोनों का स्थान है। परंपरा घेरा डालकर पानी को गहरा बनाती है। विद्रोह घेरों को तोड़कर पानी को चौड़ाई में ले जाता है। परंपरा रोकती है, विद्रोह आगे बढ़ना चाहता है। इस संघर्ष के बाद जो प्रगति होती है, वही समाज की असली प्रगति है।”
    भारत की जनता के सामूहिक चेतना का स्पष्ट दर्पण उनकी रचनाओं में दिखता है। इनके विचारानुसार “नारी केवल नर को रिझाने अथवा उसे प्रेरणा देने को नहीं बनी है। जीवन-यज्ञ में उसका भी अपना हिस्सा है और वह हिस्सा घर तक ही सीमित नहीं, बाहर भी है। जिसे भी पुरुष अपना क्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है।”

     

    यह एक ऐसे कवि थे जो जनता के सारथी थे। संघर्षशील और कर्मयोगी रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के बेगूसराय जिला के सिमरिया घाट में हुआ था।‌अपने संघर्षपूर्ण जीवन , अपने ज्ञान और मान के कारण यह अपने क्षेत्र में अदि्वतीय रहे। गंगा किनारे के निवासी दिनकर को‌ किसी बांध में बांधना संभव नहीं हुआ।‌ यह पल में कण भी थे और पल में दिक् दिगंत भी ।
    आज का दिवस राष्ट्र से प्रेम करने वालों के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिवस है।

    डॉ कल्याणी कबीर
    प्राचार्या
    रंभा कॉलेज ऑफ एजुकेशन

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