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    Home » पुरुष समाज पर मंडराता ख़तरा चिंताजनक
    Breaking News Headlines जमशेदपुर संपादकीय

    पुरुष समाज पर मंडराता ख़तरा चिंताजनक

    News DeskBy News DeskJune 20, 2025No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    भारत में घरेलू हिंसा की चर्चा वर्षों से महिलाओं के उत्पीड़न को लेकर केंद्रित रही है, जो अपने आप में एक गंभीर और वास्तविक सामाजिक संकट है, लेकिन इन अब यह सच्चाई इसके उलट नजर आ रही है। यह सच्चाई है पत्नियों द्वारा की जा रही पतियों की हत्या। ऐसे घटनाएं जैसे आम सी हों चलीं हैं। हरियाणा के जींद ज़िले इसी तरह घटना सामने आई है, जहां के बुढ़ाखेड़ा रेलवे स्टेशन  साजिद नाम के शख्स का शव मिला है, जिसकी हत्या उसकी पत्नी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर की गई, पति की हत्या करने वाली महिला गुलफसा और उसका प्रेमी, साजिद के ही चचेरे भाई मोहम्मद खालिद, केवल एक ‘हत्या’ नहीं करते, बल्कि वे सामाजिक मूल्यों, विवाह संस्था और भरोसे को भी निर्ममता से मार डालते हैं।
    जिस प्रकार साजिद की हत्या को अंजाम दिया गया, वह पूरी तरह सुनियोजित और निर्मम था। गुलफसा ने अपने ही पति को झाड़ियों में ‘लघुशंका’ के बहाने ले जाकर प्रेमी संग मिलकर मौत के घाट उतार दिया। यह घटना इसलिए भी भयावह है, क्योंकि इसमें ना सिर्फ़ एक हत्या है, बल्कि विश्वासघात, छल और रिश्तों की मर्यादा का घोर उल्लंघन भी है। साजिद का दोष क्या था? कि वह एक मेहनतकश मजदूर था? वह अपने परिवार के लिए रोटी कमाने ईंट-भट्ठे पर काम करता था?
    इससे पहले शिलांग हनीमून पर गई सोनम ने अपने पति राजा की हत्या कर दी थी। वहीं, मेरठ में सौरभ हत्याकांड ने भी पूरे देश को झकझोर दिया था।

    इसी तरह 2024 में गाजियाबाद एक महिला ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को जहर देकर मार डाला, फिर शव को जला दिया। वहीं, 2023 में झारखंड में महिला ने अपने प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या की, और पुलिस को गुमराह करने के लिए रेप और लूट की झूठी कहानी गढ़ी। इसी तरह 2022 में केरल में एक प्रसिद्ध ‘साइबर अफेयर’ केस में महिला ने अपने पति को ऑनलाइन मिले प्रेमी के साथ मिलकर मार डाला। ऐसी कई घटनाएं आए दिन सामने आ रहीं हैं। ये घटनाएं न केवल एक जघन्य हत्या के मामले हैं, बल्कि ये यह भी सवाल भी उठाते  हैं कि आख़िर ये लड़कियां या औरतें चाहती क्या हैं?

    इन मामलों में एक पैटर्न साफ़ उभरता है, पति, प्रेमी और साजिश। इसीलिए सवाल उठता है कि क्या भारतीय समाज में पारिवारिक संरचना अब टूट रही है? क्या विवाह केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह गया है, जिसमें प्रेम, निष्ठा और विश्वास की कोई जगह नहीं?
    जब कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है, तब मीडिया, समाज, कानून सभी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं, लेकिन जब कोई पुरुष पीड़ित होता है, विशेषकर जब वह अपनी ही पत्नी द्वारा पीटा, प्रताड़ित या मारा जाता है, तब उसे या तो मज़ाक बना दिया जाता है, या संवेदनहीन चुप्पी साध ली जाती है।

    भारतीय पुरुष अधिकार संगठनों की मानें तो हर साल हजारों पुरुष घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और झूठे मुकदमों का शिकार होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वाले विवाहित पुरुषों की संख्या महिलाओं से दोगुनी है। इनमें से बड़ी संख्या ने घरेलू तनाव, पत्नी द्वारा उत्पीड़न या संबंधों में धोखा जैसे कारण बताए। भारतीय दंड संहिता की धारा 498A घरेलू हिंसा अधिनियम कानून में असंतुलन और पुरुषों के लिए न्याय की राह कठिन करता है, क्योंकि ये कानून महिलाओं के  इसीलिए इस कानून को एकतरफा कहा जाएगा। इनमें पुरुष की बात सुनने की गुंजाइश नहीं होती। कोई भी महिला किसी भी पुरुष को मात्र आरोप लगाकर गिरफ़्तार करवा सकती है।

    आज तक पुरुषों के लिए कोई समकक्ष कानून नहीं है, जो उन्हें घरेलू उत्पीड़न से बचा सके। सरकारें इस विषय पर बात तक नहीं करना चाहतीं। शायद उन्हें यह डर है कि महिलाओं के मतदाता नाराज़ न हो जाएं। इन परिस्थितियों में मीडिया की भूमिका भी यहां कटघरे में है। अधिकांश समाचारों में जब पति की हत्या की खबर आती है, तो उसके पीछे पत्नी का उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना या प्रेम संबंध जैसे कारणों को सहानुभूति की चादर में लपेट दिया जाता है, जबकि जब कोई पुरुष पत्नी की हत्या करता है, तब उसे हत्यारा, पशु, क्रूर और महिला विरोधी जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पीड़ित के लिंग के आधार पर हमारी संवेदनाएं बदल जाती हैं?

    साजिद की पत्नी गुलफसा का अपने ही देवर से प्रेम संबंध केवल एक घटना नहीं है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम आदि ने विवाहेत्तर संबंधों को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई है। भावनात्मक असंतोष या आकर्षण से अधिक आज यह सामाजिक क्षरण बन चुका है। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक जिम्मेदारियों और नैतिकता का निर्वाह भी जरूरी है। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि रिश्तों में धोखा देना, या अपने पति को रास्ते से हटा देना जायज़ हो जाए। आज के दौर में स्त्री-विमर्श ने न्यायपूर्ण दिशा की जगह उग्र नारीवाद का रूप ले लिया है, जहां हर पुरुष को ‘संभावित अपराधी’ और हर महिला को ‘स्वाभाविक पीड़िता’ मान लिया जाता है। यदि, महिलाएं समानता चाहती हैं, तो यह समानता उत्तरदायित्व, नैतिकता और कानून के स्तर पर भी होनी चाहिए। कानून सबके लिए बराबर हो, सज़ा भी समान रूप से मिले।

    घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और विवाहेत्तर संबंधों के कारण पीड़ित पुरुषों के लिए एक समर्पित कानून बनाया जाए। सभी दंडात्मक कानूनों को लैंगिक रूप से तटस्थ किया जाए, जिसमें पुरुष, महिला, और अन्य सभी की सुनवाई बराबरी से हो। विवाह टूटने से पहले आपसी संवाद और काउंसलिंग को अनिवार्य किया जाए। पीड़ित के लिंग के आधार पर पूर्वग्रह न रखें। विवाह के महत्व, निष्ठा और पारिवारिक जिम्मेदारियों की शिक्षा स्कूल स्तर पर दी जाए। कुल मिलाकर, समय रहते पुरुषों के प्रति हो रहे अपराधों को न रोका गया, तो वह दिन दूर नहीं जब पुरुष विवाह से डरने लगेंगे, रिश्तों पर से भरोसा उठ जाएगा, और समाज में अविश्वास की खाई और गहरी हो जाएगी। अब वक्त आ गया है कि हम बिना लैंगिक चश्मा पहने, केवल इंसानियत की दृष्टि से इस विषय पर गंभीरता से चर्चा करें और समाधान की तरह आगे बढ़ें।

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