हिंसा पर बदलते सुर: बंगाल की राजनीति और लोकतंत्र की कसौटी
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन जो बदलता रहा है, वह है राजनीतिक दलों का रुख। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद जब राज्य में हिंसा, तोड़फोड़ और प्रतिशोध की घटनाएं सामने आई थीं, तब तृणमूल कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगे थे और विपक्ष ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। उस समय सख्त कार्रवाई और निष्पक्षता की मांग जोर-शोर से की गई थी।
आज, जब हालिया चुनावों के बाद फिर हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं, तो वही तृणमूल कांग्रेस इन घटनाओं को लेकर चिंता जता रही है और कार्रवाई की मांग कर रही है। यह बदलाव केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उस दोहरे मानदंड को उजागर करता है, जहां सत्ता और विपक्ष की भूमिका के साथ नैतिकता का पैमाना भी बदल जाता है।
लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति खतरनाक है। हिंसा चाहे किसी भी दल के समर्थकों द्वारा हो, उसका समर्थन या मौन स्वीकृति समान रूप से गलत है। यदि 2021 में हिंसा अस्वीकार्य थी, तो आज भी है और यदि आज इसकी निंदा की जा रही है, तो वही कसौटी हर दौर में लागू होनी चाहिए। राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता इसी निरंतरता से तय होती है।

यह भी स्पष्ट है कि चुनावी जीत का उत्सव यदि हिंसा में बदल जाए, तो वह जनादेश का अपमान बन जाता है। राज्य की मशीनरी की जिम्मेदारी है कि वह बिना किसी राजनीतिक दबाव के कानून का राज स्थापित करे। साथ ही, सभी दलों को अपने कार्यकर्ताओं को संयम और लोकतांत्रिक मर्यादा का पाठ पढ़ाना होगा।
ममता बनर्जी और अन्य नेताओं के लिए यह एक अवसर भी है यह दिखाने का कि वे केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं, बल्कि शासन में निष्पक्षता और शांति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो हिंसा पर बदलते सुर केवल राजनीतिक सुविधा का प्रतीक बनकर रह जाएंगे।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव परिणामों में नहीं, बल्कि उसके बाद के आचरण में होती है। सिद्धांतों की स्थिरता ही राजनीति को विश्वसनीय बनाती है और यही आज सबसे बड़ी जरूरत है।

