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    सत्ता पक्ष को विपक्ष की भावनाओं का करना चाहिए सम्मान बहस, आलोचना और जवाबदेही से सशक्त होती है लोकतांत्रिक प्रक्रिया

    News DeskBy News DeskJuly 22, 2025No Comments3 Mins Read
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    त्वरित टिप्पणी:-

    सत्ता पक्ष को विपक्ष की भावनाओं का करना चाहिए सम्मान
    बहस, आलोचना और जवाबदेही से सशक्त होती है लोकतांत्रिक प्रक्रिया

    देवानंद सिंह

    भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संसद में बसती है, क्योंकि यह स्थान जहां एक तरफ सत्ता और विपक्ष मिलकर जनभावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं, वहीं बहस, आलोचना और जवाबदेही से लोकतांत्रिक प्रक्रिया सशक्त होती है। किंतु जब संसद के भीतर संवाद का स्वर कुंठित हो, असहमति को बाधित किया जाए, और सत्ता पक्ष विपक्ष की चिंता को ‘नाटक’ बताकर नकार दे, तो यह किसी एक व्यक्ति या दल की समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी संरचना पर उठते गंभीर प्रश्न का संकेत है।

     

    सोमवार से शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र इसी चिंता को उजागर करता है। राहुल गांधी द्वारा यह कहना कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा, केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि संसदीय संवाद की गिरती स्थिति की ओर इशारा है। जवाब में सरकार का यह कहना कि उन्हें समय दिया गया था या उन्होंने नाटक किया, इस समस्या की गंभीरता को हल्का कर देने का प्रयास प्रतीत होता है।

    लोकसभा सिर्फ एक सदन नहीं, एक मंच है, जहां प्रत्येक जनप्रतिनिधि को, चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में, अपनी बात कहने का समान और निर्बाध अधिकार है। यदि, विपक्ष के नेता यह महसूस करते हैं कि उन्हें बार-बार रोका जा रहा है, या उनका वक्तव्य व्यवधानों के बीच खो जाता है तो यह महज़ संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन नहीं, बल्कि जनमत के साथ अनादर की श्रेणी में आता है।

     

    इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष को निराधार आरोपों या अवांछनीय भाषा की छूट दी जाए, बल्कि यह कि असहमति के स्वर को दबाने की प्रवृत्ति न बढ़े। संसद में हर दृष्टिकोण को सुनना, तर्क के साथ उत्तर देना और लोकतांत्रिक तरीके से मतभेद दर्ज करना, यह सत्ता की मूल जिम्मेदारी है। संसद यदि एकपक्षीय शो में तब्दील हो जाए, तो संवाद की संस्कृति दम तोड़ देती है।

    राहुल गांधी की बातों से कोई असहमत हो सकता है, उनकी शैली से भी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें बोलने का अधिकार नकारा नहीं जा सकता। संसद की गरिमा इसी में है कि वह आलोचना को सहन करे, असहमति को स्थान दे और संवाद को रोके नहीं, प्रोत्साहित करे।

     

    आज जब लोकतंत्र की वैश्विक साख दांव पर है, भारत जैसे देश को अपने संस्थानों में अधिक पारदर्शिता, सहभागिता और सहिष्णुता दिखाने की आवश्यकता है। संसद केवल सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि जन-आकांक्षाओं का दर्पण है। यदि, इस दर्पण में केवल सरकार का चेहरा झलके और विपक्ष धुंधला पड़ जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।

    यह समय है, जब संसद में सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी संवैधानिक भूमिका को पुनः समझें। सत्ता, उत्तरदायित्व के साथ विनम्र हो, और विपक्ष, सार्थक आलोचना के साथ सजग। तभी लोकसभा, सचमुच ‘जनता की सभा’ बन पाएगी, केवल सरकार की सभा नहीं।

     

    भारत का लोकतंत्र मजबूत है, लेकिन उसकी ताकत बहस और विचारों की बहुलता में है। यह बहुलता बनी रहे, यही लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग है।

    आलोचना और जवाबदेही से सशक्त होती है लोकतांत्रिक प्रक्रिया सत्ता पक्ष को विपक्ष की भावनाओं का करना चाहिए सम्मान बहस
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