देवानंद सिंह
बीते कुछ हफ्तों में पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर अस्थिर और विभाजित कर दिया है। इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमले ने सिर्फ क्षेत्रीय तनाव को नहीं बढ़ाया, बल्कि दुनिया की महाशक्तियों और उभरते हुए राष्ट्रों के लिए भी एक कूटनीतिक परीक्षा खड़ी कर दी है। भारत दशकों से इसराइल, खाड़ी देशों और ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति पर चल रहा है, अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। उसके हालिया कदमों से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह धीरे-धीरे इसराइल के पक्ष में झुकता दिख रहा है, और यह झुकाव उसकी पारंपरिक ‘संतुलनवादी विदेश नीति’ से एक विचलन की तरह देखा जा रहा है।
12 जून को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ग़ज़ा में तत्काल युद्धविराम को लेकर मतदान हुआ। 149 देशों ने युद्धविराम के पक्ष में वोट किया, जबकि केवल 12 देशों ने इसके विरुद्ध मतदान किया और 19 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। भारत भी उन्हीं 19 देशों में था, जिन्होंने खुद को मतदान से अलग रखा। इन 19 देशों में से अधिकांश की वैश्विक राजनीति में सीमित भूमिका है। जैसे टोगो, साउथ सूडान और पनामा। इसके विपरीत, जिन 149 देशों ने युद्धविराम के समर्थन में मतदान किया, उनमें चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और अधिकांश यूरोपीय संघ के सदस्य देश शामिल थे।
भारत, जो स्वयं को वैश्विक दक्षिण का अगुवा और जिम्मेदार उभरती शक्ति बताता रहा है, इस मतदान में न सिर्फ अलग-थलग पड़ा, बल्कि एक तरह से चुप्पी की नीति को अपनाकर अपने पुराने रुख से भी विमुख हो गया। भारत की स्थिति तब और असहज हो गई जब 14 जून को शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) ने इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की आधिकारिक रूप से निंदा की। भारत भी एससीओ का संस्थापक सदस्य है, लेकिन उसने इस बयान से खुद को अलग कर लिया। इससे पहले ब्रिक्स जैसे मंचों पर भी भारत युद्धविराम या इसराइली आक्रामकता की निंदा से बचता रहा है। ब्रिक्स के अधिकांश सदस्यों चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने इसराइल की आलोचना की, लेकिन भारत और इथियोपिया मतदान से दूर रहे।
यह ट्रेंड संकेत देता है कि भारत अब अपने परंपरागत मंचों पर भी न तो सामूहिक स्वर के साथ चल रहा है, और न ही स्पष्ट रूप से स्वतंत्र रुख अपना रहा है। उसकी मौन उपस्थिति एक तरह से कूटनीतिक रणनीति को दर्शाती है।
क्वॉड, जिसे आमतौर पर चीन के मुकाबले बनाए गए रणनीतिक गुट के रूप में देखा जाता है, उसमें भारत के साथ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। दिलचस्प यह है कि यूएन में इसराइल-ग़ज़ा युद्धविराम के समर्थन में जापान और ऑस्ट्रेलिया ने वोट किया, जबकि भारत ने नहीं। अमेरिका ने युद्धविराम के खिलाफ मतदान किया, जो उसकी पारंपरिक इसराइल समर्थक नीति का हिस्सा रहा है।
यह विरोधाभास भारत की कूटनीतिक स्थिति को और जटिल बना देता है। वह जिन मंचों पर सदस्यता लेता है, उन मंचों पर वह अब अलग रुख अख्तियार कर रहा है, जो या तो आत्मविश्वास का संकेत है या रणनीतिक भ्रम का। भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अत्यंत गहरे हैं। पारसी समुदाय, फारसी साहित्य और व्यापारिक रिश्ते सदियों पुराने हैं। चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आपूर्ति के क्षेत्र में भी ईरान भारत के लिए रणनीतिक सहयोगी रहा है। इसके विपरीत, पाकिस्तान से शत्रुतापूर्ण संबंधों के चलते इसराइल ने भारत को एक स्वाभाविक साझेदार माना है।
इसराइल और भारत के संबंधों में हाल के वर्षों में स्पष्ट निकटता देखी गई है, विशेषकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में। प्रधानमंत्री मोदी ने 2017 में इसराइल का दौरा कर एक ऐतिहासिक पहल की थी। दोनों देशों के बीच रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि और नवाचार के क्षेत्र में गहरे सहयोग हैं। फिर भी, भारत ने ऐतिहासिक रूप से इसराइल और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखा है। इस संतुलन को बनाए रखने की ज़रूरत इसलिए भी थी, क्योंकि भारत में एक बड़ी मुस्लिम आबादी है, जो फिलिस्तीन के मुद्दे को लेकर संवेदनशील रही है।
भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने बिल्कुल सटीक कहा है कि आज की दुनिया सिर्फ यह नहीं पूछती कि भारत क्या कर रहा है, बल्कि यह भी पूछती है कि वह क्या कह रहा है और क्या नहीं कह रहा। जब कोई देश वैश्विक मंचों पर बड़ा किरदार बनना चाहता है, तो उसकी खामोशी भी संदेश बन जाती है। और जब खामोशी अर्थ ग्रहण करने लगे, तो वह नीति न होकर एक धारणा बन जाती है या तो दबाव में की गई चुप्पी या मौन समर्थन।
इस संदर्भ में विदेश मंत्रालय द्वारा एससीओ के वक्तव्य से दूरी बनाने का निर्णय भारत की मौन रणनीति को और स्पष्ट करता है, जो अब स्पष्टवादिता की जगह अस्पष्ट संकेतों पर आधारित प्रतीत होती है। भारत की कूटनीतिक नीति दशकों पुरानी है, जिसमें किसी एक ध्रुव के साथ खड़े होने की बजाय बहुपक्षीयता पर बल दिया गया है, लेकिन आज जब रूस खुलकर इसराइल की आलोचना कर रहा है, अमेरिका इसराइल का पक्ष ले रहा है, चीन युद्धविराम का समर्थन कर रहा है और यूरोप भी इसराइल से संयम बरतने की अपील कर रहा है। ऐसे में, भारत का तटस्थ बने रहना अब पहले की तरह प्रभावशाली नहीं रह गया है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत का झुकाव अभी भी स्पष्ट समर्थन के स्तर तक नहीं पहुंचा है, लेकिन चुप्पी की कूटनीति भी अब वैचारिक स्पष्टता की मांग करती है।
कुल मिलाकर, भारत आज एक ऐसे मुकाम पर है, जहां उसकी हर कूटनीतिक चाल वैश्विक मंचों पर विवेचना का विषय बन जाती है। उसके एक्शन और इनएक्शन दोनों का आकलन अब पहले से अधिक गहराई से होता है। इसराइल-ईरान संघर्ष के संदर्भ में भारत की नीति भले ही रणनीतिक विवेक पर आधारित हो, लेकिन यह प्रश्न अब ज़रूरी हो गया है कि क्या यह नीति अब भी संतुलन बनाए रख पा रही है, या फिर यह झुकाव एक नई दिशा का संकेत है? यदि, भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे सिर्फ अवसरों की तलाश में नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में भी स्पष्ट, न्यायोचित और नैतिक रुख अपनाना होगा। एक निष्पक्ष नेतृत्व वही होता है जो जब बोलता है तो वाजिब बात कहता है, और जब चुप रहता है तो उसकी चुप्पी भी समझदारी से भरी होती है न कि भ्रम और द्वंद्व से।
भारत के लिए यह क्षण कूटनीतिक पुनरावलोकन का है, जहां उसे यह तय करना है कि क्या वह अब भी पुरानी संतुलनवादी नीति को आगे बढ़ाएगा या किसी एक पक्ष की तरफ़ स्पष्ट झुकाव दिखाकर अपने नैतिक नेतृत्व के दावे को चुनौती में डालेगा। दुनिया अब भारत से केवल उसकी क्षमता नहीं, बल्कि उसकी दृष्टि और नैतिकता का भी आकलन कर रही है।

