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    टिनप्लेट प्रोजेक्ट पर अब सबसे बड़ा सवाल चूक तकनीकी थी या डेडलाइन का दबाव?

    News DeskBy News DeskSeptember 23, 2026No Comments3 Mins Read
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    टिनप्लेट प्रोजेक्ट पर अब सबसे बड़ा सवाल
    चूक तकनीकी थी या डेडलाइन का दबाव?

    दो हादसों के बाद सुरक्षा ऑडिट और फैक्ट्री इंस्पेक्टर की जांच ने परियोजना प्रबंधन को कठघरे में खड़ा किया

    मृत्युंजय बर्मन,
    राष्ट्र संवाद संवाददाता, जमशेदपुर

    किसी औद्योगिक परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह निर्धारित समय में पूरी हुई या नहीं। असली कसौटी यह है कि उसे पूरा करने के दौरान कितने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। टिनप्लेट डिवीजन के विस्तार प्रोजेक्ट में सितंबर में हुए दो हादसों और फैक्ट्री इंस्पेक्टर की जांच के निष्कर्ष इस बुनियादी सवाल को फिर सामने खड़ा करते हैं, क्या परियोजना की समयसीमा और उत्पादन लक्ष्य के दबाव में ठेका श्रमिकों की सुरक्षा कहीं पीछे तो नहीं छूट रही?

    11 सितंबर को हादसे में ठेका मजदूर करण कुमार सिंह की मौत हुई। जांच में सामने आया कि साइट पर मृतक और सुपरवाइजर के बीच आवश्यक को-ऑर्डिनेशन और संवाद की व्यवस्था नहीं थी। 18 सितंबर को दूसरे हादसे में ठेका मजदूर संजय शर्मा की मौत हो गई, जबकि उसका साथी दिलीप गंभीर रूप से घायल हुआ। यानी एक ही सप्ताह में दो अलग-अलग घटनाओं में दो श्रमिकों की जान चली गई।

    दूसरे हादसे से संबंधित उपलब्ध तकनीकी रिपोर्ट और दुर्घटना स्थल की तस्वीरें भी महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार वेस्ट-वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के टावर क्रेन की फाउंडेशन केज के लिए एक्सटर्नल शटरिंग का काम चल रहा था। खुदाई वाले हिस्से की साइड की मिट्टी खिसककर शटरिंग बोर्ड पर आ गिरी और दो श्रमिक शटरिंग बोर्ड तथा सरियों के बीच फंस गए। दोनों को बाहर निकाला गया, लेकिन एक श्रमिक को मृत घोषित कर दिया गया।

    यहां सवाल केवल मिट्टी खिसकने का नहीं है। खुदाई की स्थिरता, मिट्टी की जांच, शटरिंग की पर्याप्त मजबूती, काम शुरू करने से पहले जोखिम का आकलन और श्रमिकों को सुरक्षित तरीके से कार्यस्थल पर लगाने जैसी प्रक्रियाएं कितनी प्रभावी थीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर तकनीकी जांच में मिलना जरूरी है।

    फैक्ट्री इंस्पेक्टर की जांच के बाद कंपनी प्रबंधन को 15-15 सवालों के जवाब देने के लिए नोटिस जारी होना और पूरे प्लांट का थर्ड पार्टी से सुरक्षा ऑडिट कराने का निर्देश दिया जाना बताता है कि मामला केवल सामान्य दुर्घटना मानकर समाप्त नहीं किया गया है। सुरक्षा मानकों को पूरा किए बिना सिविल कार्य दोबारा शुरू नहीं करने की बात भी सामने आई है।

    *ठेका श्रमिक ही क्यों बनते हैं पहला जोखिम?*

    औद्योगिक परियोजनाओं में ठेका श्रमिक अक्सर उस मोर्चे पर काम करते हैं जहां जोखिम सबसे ज्यादा होता है, खुदाई, ऊंचाई, भारी उपकरण, शटरिंग, मेंटेनेंस और निर्माण। ऐसे में यदि काम की गति बढ़ाने के दबाव में सुरक्षा जांच, संवाद, प्रशिक्षण या अनुमति प्रक्रिया में थोड़ी भी ढिलाई होती है तो उसका सबसे पहला असर इन्हीं श्रमिकों पर पड़ता है।

    यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन हादसों का कारण परियोजना को समयसीमा में पूरा करने की जल्दबाजी ही थी। लेकिन जांच में सामने आई तकनीकी और समन्वय संबंधी कमियां यह सवाल पूछने के लिए पर्याप्त हैं कि कहीं ‘काम कब पूरा होगा’ का सवाल ‘काम कितनी सुरक्षित तरीके से होगा’ पर भारी तो नहीं पड़ रहा था।

    औद्योगिक विकास जरूरी है, परियोजनाओं की समयसीमा भी जरूरी है। लेकिन डेडलाइन पूरी करने की कीमत किसी ठेका मजदूर की जिंदगी नहीं हो सकती। सुरक्षा ऑडिट और जांच का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पहचान करना होना चाहिए जिसमें एक तकनीकी चूक किसी परिवार के लिए हमेशा का मातम बन जाती है।

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