Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » बिहार के एक मंत्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बिना विधायक बने छह महीने से ज्यादा मंत्री रहने पर मांगा जवाब
    Breaking News Headlines पटना बिहार

    बिहार के एक मंत्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बिना विधायक बने छह महीने से ज्यादा मंत्री रहने पर मांगा जवाब

    News DeskBy News DeskJuly 31, 2026No Comments5 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पहुंच गया है. सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को संकेत दिया कि बिहार सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि दीपक प्रकाश बिना विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे बने रहे. यह मामला संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या और उसकी सीमा से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बन गया है.

    दीपक प्रकाश पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र हैं. उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) बिहार में भाजपा की सहयोगी पार्टी है. दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं, लेकिन वे राज्य विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. इसी आधार पर उनके मंत्री पद पर बने रहने को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है.

    मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद दीपक प्रकाश अब भी मंत्री बने हुए हैं, जबकि संविधान गैर-विधायक मंत्री को केवल सीमित अवधि तक ही पद पर बने रहने की अनुमति देता है. याचिकाकर्ता ने इस मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है.

    बिहार सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यह मामला पहले से ही 27 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है. सरकार के वकील ने कहा कि सुनवाई की तारीख पहले करने का निर्णय अदालत के विवेक पर निर्भर है. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यह पूरी तरह कानून और संविधान की व्याख्या से जुड़ा प्रश्न है तथा राज्य सरकार को यह बताना होगा कि किस संवैधानिक आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को छह महीने से अधिक समय तक मंत्री बनाए रखा गया, जो राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है.

    सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस याचिका पर अगले सप्ताह मंगलवार को सुनवाई कर सकता है. अदालत यह भी देखेगी कि क्या मंत्री के रूप में दीपक प्रकाश की निरंतर नियुक्ति संविधान के अनुरूप है या नहीं.

    इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर बिहार सरकार को नोटिस जारी किया था. याचिका में दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की गई है.

    याचिका के अनुसार, दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को बिहार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. उस समय भी वे न तो विधायक थे और न ही विधान परिषद के सदस्य. बाद में 15 अप्रैल 2026 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद मंत्रिपरिषद स्वतः समाप्त हो गई. इसके बाद 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से पंचायती राज मंत्री नियुक्त कर दिया गया, जबकि तब भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं बने थे.

    पूरा विवाद संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या पर केंद्रित है. इस अनुच्छेद के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनाया जाता है और वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे लगातार छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य है. यदि ऐसा नहीं होता, तो छह महीने पूरे होने पर वह स्वतः मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार खो देता है.

    संविधान के अनुच्छेद 164(4) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “यदि कोई मंत्री लगातार छह महीने तक राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता है, तो उस अवधि की समाप्ति पर वह मंत्री नहीं रहेगा.”

    हालांकि इस मामले में एक कानूनी पेच सामने आया है. दीपक प्रकाश ने पहली नियुक्ति में लगातार छह महीने पूरे नहीं किए थे. वे पहली बार लगभग चार महीने 26 दिन मंत्री रहे. इसके बाद सरकार बदलने के कारण 22 दिन का अंतराल आया और फिर उन्हें दोबारा उसी विभाग का मंत्री बना दिया गया. सरकार का संभावित तर्क यह हो सकता है कि दोनों कार्यकाल अलग-अलग हैं, इसलिए लगातार छह महीने की शर्त लागू नहीं होती. दूसरी ओर, याचिकाकर्ता का कहना है कि यह केवल संवैधानिक सीमा से बचने का तरीका है और कुल अवधि छह महीने से अधिक हो चुकी है.

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य विफल करने के लिए पुनर्नियुक्ति का सहारा लिया है. इसे संवैधानिक शक्तियों का रंगरूप बदलकर किया गया प्रयोग (Colourable Exercise of Power) बताया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार केवल तकनीकी आधार पर छह महीने की सीमा को दरकिनार नहीं कर सकती.

    याचिका में वर्ष 2001 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया है. उस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को मंत्री बनाए जाने की व्यवस्था केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए है. इसे बार-बार इस्तीफा, मंत्रिमंडल परिवर्तन, पुनर्गठन या पुनर्नियुक्ति के माध्यम से दोहराया नहीं जा सकता. याचिकाकर्ता का तर्क है कि दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति उसी सिद्धांत का उल्लंघन करती है.

    जनहित याचिका में अदालत से यह घोषणा करने की मांग की गई है कि दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री के रूप में नियुक्ति असंवैधानिक और शून्य घोषित की जाए. साथ ही ‘क्वो वारंटो’ (Quo Warranto) की रिट जारी करने का भी अनुरोध किया गया है, जिसके माध्यम से अदालत यह पूछ सकती है कि वह किस कानूनी अधिकार के आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं.

    यह मामला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) की सीमा, उसके उद्देश्य और गैर-विधायकों की मंत्री नियुक्ति से जुड़े सिद्धांतों की न्यायिक व्याख्या के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर अब सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका प्रभाव भविष्य में राज्यों में गैर-विधायकों की मंत्री नियुक्ति और पुनर्नियुक्ति से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है.

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleरहाणे के संन्यास के बाद केकेआर में कप्तानी की जंग तेज, रिंकू से लेकर हार्दिक तक ये 5 दिग्गज दौड़ में
    Next Article फर्जी पासपोर्ट मामले में छोटा राजन दोषी करार, सीबीआई कोर्ट ने सुनाई 7 साल की सजा

    Related Posts

    दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को लेकर प्रशासन अलर्ट, डीसी और एसएसपी ने घाटों का किया निरीक्षण

    October 20, 2026

    मानगो के ओल्ड पुरुलिया रोड मे फल की गुमटी में लगी भीषण आग, दमकल ने पाया काबू

    October 20, 2026

    जम्बू अखाड़ा महिला विंग की ओर से 108 कन्याओं का पूजन, शस्त्र पूजन के साथ मनाया गया धार्मिक अनुष्ठान

    October 20, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को लेकर प्रशासन अलर्ट, डीसी और एसएसपी ने घाटों का किया निरीक्षण

    मानगो के ओल्ड पुरुलिया रोड मे फल की गुमटी में लगी भीषण आग, दमकल ने पाया काबू

    जम्बू अखाड़ा महिला विंग की ओर से 108 कन्याओं का पूजन, शस्त्र पूजन के साथ मनाया गया धार्मिक अनुष्ठान

    भीषण सड़क हादसे के बाद बवाल, एक की मौत- दर्जनभर घायल, आक्रोशित लोगों ने कार में लगाई आग

    आशियाना गार्डन में छत से गिरकर 77 वर्षीय बुजुर्ग की मौत, मॉर्निंग वॉक के दौरान हादसा

    कल्याण तालुका के वरप गांव में गरबा पंडाल पर तलवार से हमला, 8 हुड़दंगियों ने मचाया आतंक

    त्योहारों की रोशनी में दम न तोड़ दे ज़िंदगी

    भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 23-25 अक्टूबर 2026 -क़्या बदलेगी वैश्विक चावल अर्थव्यवस्था? -19 अक्टूब

    कदमा टोल ब्रिज के पास किशोर की चाकू मारकर हत्या, इलाके में सनसनी

    मां रूपी सोरेन की अस्थियां लेकर रजरप्पा पहुंचे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, दामोदर-भैरवी संगम पर करेंगे विसर्जन

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.