त्योहारों की रोशनी में दम न तोड़ दे ज़िंदगी
वायु प्रदूषण: मानव जीवन, प्रकृति और भविष्य के लिए बढ़ता खतरा
**लेखक: संजय राठी*
त्योहारों की खुशियाँ और जहरीली होती हवा
त्योहार हमारी संस्कृति, आस्था, उल्लास और सामाजिक एकता के प्रतीक हैं। दीपावली अंधकार पर प्रकाश और निराशा पर आशा की विजय का संदेश देती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस मौसम में हम अपने घरों को रोशन करते हैं, उसी दौरान उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा में वायु प्रदूषण एक गंभीर संकट बनकर सामने आता है। आतिशबाजी, वाहनों का धुआँ, पराली जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल और ईंट-भट्ठों से निकलने वाले प्रदूषक मिलकर हवा की गुणवत्ता को बिगाड़ते हैं।
अक्टूबर और नवंबर के दौरान मौसम की परिस्थितियाँ भी प्रदूषकों को वातावरण में जमा होने में मदद कर सकती हैं। परिणामस्वरूप हवा में हानिकारक कणों की मात्रा बढ़ जाती है और स्वच्छ हवा में साँस लेना चुनौती बन जाता है। सवाल यह है कि क्या त्योहारों की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य और जीवन की कीमत पर मनाई जानी चाहिए?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2021 में वायु प्रदूषण के प्रमुख घटकों के लिए स्वास्थ्य-सुरक्षात्मक दिशानिर्देश जारी किए। इनके अनुसार, अति सूक्ष्म कणों पीएम 2.5 की वार्षिक औसत सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे की औसत सीमा 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर अनुशंसित है। मोटे सूक्ष्म कणों पीएम 10 के लिए ये सीमाएँ क्रमशः 15 और 45 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हैं।
ये विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य संबंधी दिशानिर्देश हैं, भारत की कानूनी वायु गुणवत्ता सीमाएँ नहीं। फिर भी इनसे प्रदूषण के स्वास्थ्य जोखिमों की गंभीरता समझी जा सकती है।
पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुँच सकते हैं और रक्त परिसंचरण तंत्र को भी प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारियों, दमा और समय से पहले मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण केवल वातावरण में धुआँ दिखाई देने की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर संकट है। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों पर सबसे अधिक असर
वायु प्रदूषण का प्रभाव समाज के प्रत्येक वर्ग पर पड़ सकता है, लेकिन नवजात शिशु, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग और पहले से बीमार व्यक्ति अधिक संवेदनशील होते हैं।
बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं। प्रदूषित हवा उनके श्वसन स्वास्थ्य और सामान्य विकास को प्रभावित कर सकती है। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए सुबह की सैर, खुले मैदानों में खेलना और अन्य बाहरी गतिविधियाँ भी प्रदूषण बढ़ने पर जोखिमपूर्ण हो सकती हैं।
बुजुर्गों और हृदय रोग, दमा या फेफड़ों की पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों को साँस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण का संपर्क भी प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा पाया गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रदूषण फैलाने में इन वर्गों की कोई भूमिका नहीं होती, लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपने स्वास्थ्य से चुकानी पड़ सकती है। इसलिए स्वच्छ हवा उपलब्ध कराना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता का प्रश्न भी है!
दीपावली के दौरान बड़े पैमाने पर आतिशबाजी से वायु में सूक्ष्म कणों और विभिन्न रासायनिक पदार्थों की मात्रा तेजी से बढ़ सकती है। पहले से प्रदूषित वातावरण में पटाखों का धुआँ स्थिति को और गंभीर बना सकता है। कई बार वातावरण में धुंध की मोटी परत दिखाई देती है और लोगों को आँखों में जलन, खाँसी तथा साँस लेने में परेशानी होती है।
पटाखों का प्रभाव केवल उन्हें चलाने वाले व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता। बच्चे, बुजुर्ग, राहगीर, सफाई कर्मचारी और खुले वातावरण में काम करने वाले लोग भी प्रभावित होते हैं। ध्वनि प्रदूषण से मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी परेशानी होती है।
त्योहार मनाना हमारा सांस्कृतिक अधिकार है, लेकिन दूसरों के स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्थानों पर उनके अधिकारों का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। दीप जलाकर, जरूरतमंदों की सहायता करके और पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाकर भी उत्सव की खुशियाँ साझा की जा सकती
वायु तथा ध्वनि प्रदूषण को लेकर न्यायपालिका की चिंता भी महत्वपूर्ण है। 15 अक्टूबर 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सड़कों, गलियों और फुटपाथों पर पटाखे फोड़ने पर रोक का उसका आदेश महाराष्ट्र में पूरे वर्ष और सभी त्योहारों पर लागू होगा। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनका पालन सुनिश्चित करने की अपेक्षा की।
यह आदेश महाराष्ट्र के संदर्भ में है, पूरे भारत में लागू प्रतिबंध नहीं। फिर भी इसका व्यापक संदेश स्पष्ट है कि उत्सव के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन आवश्यक है। सरकारों और प्रशासन को न्यायालयों के निर्देशों का पालन करते हुए प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए।
केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। उनकी जानकारी आम जनता तक पहुँचाना, उल्लंघन रोकना और नियमों का निष्पक्ष पालन कराना भी उतना ही आवश्यक है।
दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा में वायु प्रदूषण की चर्चा केवल पटाखों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वाहनों का धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों की धूल, कचरा जलाना और ईंट-भट्ठों से निकलने वाले प्रदूषक भी गंभीर चिंता के विषय हैं।
ईंट-भट्ठे निर्माण क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं और रोजगार भी उपलब्ध कराते हैं, लेकिन यदि वे निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं करते, तो उनसे निकलने वाला धुआँ और सूक्ष्म कण आसपास की आबादी के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
नियमों के बावजूद यदि कोई औद्योगिक इकाई या ईंट-भट्ठा निर्धारित मानकों का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही स्वच्छ तकनीक अपनाने, ईंधन की गुणवत्ता सुधारने और उत्सर्जन की नियमित निगरानी पर जोर दिया जाना चाहिए।
वाहनों के मामले में भी सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर नियमों के अनुसार कार्रवाई करना और स्वच्छ परिवहन को प्रोत्साहित करना जरूरी है। किसी एक स्रोत पर कार्रवाई करके समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए सभी स्रोतों को ध्यान में रखकर व्यापक रणनीत प्रदूषण नियंत्रण के लिए जिम्मेदार संस्थाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी न हो, निरीक्षण नियमित रूप से न किए जाएँ और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई न हो, तो पर्यावरण संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं।
यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी उद्योग या ईंट-भट्ठे को राजनीतिक अथवा प्रशासनिक प्रभाव के कारण अनुचित संरक्षण न मिले। यदि अधिकारियों और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के बीच मिलीभगत या भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन शिकायतों की अनदेखी करना भी उतना ही गलत है। निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने, वायु गुणवत्ता के आँकड़ों में पारदर्शिता रखने, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करने और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कानूनी कदम उठाने से जनता का विश्वास बढ़ सकता है।
प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की जिम्मेदारी केवल नियम बताना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि नियमों का पालन वास्तव में हो रहा है। यदि निगरानी करने वाला तंत्र ही जवाबदेह नहीं होगा, तो प्रदूषण पर नियंत्रण का दावा खोखला साबित हो सकता है।
**प्रशासनिक उदासीनता और प्रमाणित भ्रष्टाचार को केवल व्यवस्था की छोटी-मोटी कमियाँ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इनके कारण नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचता है।**
उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाएँ भी मौसमी प्रदूषण की समस्या को बढ़ा सकती हैं। हालांकि, वायु प्रदूषण का स्तर अलग-अलग दिनों में मौसम, हवा की गति, स्थानीय उत्सर्जन और अन्य क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषकों पर भी निर्भर करता है। इसलिए किसी एक कारण को पूरी समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
किसानों को पराली प्रबंधन के लिए सस्ती मशीनें, तकनीकी सहायता, आर्थिक सहयोग और फसल अवशेषों के उपयोग के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। केवल दंड और आरोपों के आधार पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
किसानों, वैज्ञानिकों, कृषि विभागों और प्रशासन को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें पराली का उपयोग पशु चारे, जैविक संसाधनों, ऊर्जा उत्पादन अथवा अन्य उपयुक्त कार्यों में किया जा सके। किसान को समाधान का भागीदार बनाना आवश्यक है, न कि पूरी समस्या का अकेला जिम्मेदार।
प्रदूषण का प्रभाव केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। पक्षियों, पशुओं, कीटों, पेड़-पौधों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। वायु में मौजूद कुछ प्रदूषक पौधों की वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित कर सकते हैं। प्रदूषक मिट्टी और जल में पहुँचकर प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं।
पटाखों की तेज आवाज और चमक से पशु-पक्षियों में भय और तनाव पैदा हो सकता है। धुआँ और रासायनिक अवशेष आसपास के पर्यावरण को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रकृति मनुष्य की संपत्ति मात्र नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। पेड़-पौधे, जल, मिट्टी, पशु-पक्षी और स्वच्छ हवा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनके संतुलन को बिगाड़कर मनुष्य अपने भविष्य को सुरक्षित नहीं रख सकता।
आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और स्वस्थ पर्यावरण देना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। विकास की वास्तविक कसौटी केवल ऊँची इमारतें, बड़ी सड़कें और औद्योगिक उत्पादन नहीं, बल्कि यह भी है कि आम नागरिक कितनी स्वच्छ हवा में साँस ले सकता
वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, उद्योगों, किसानों और नागरिकों को साझा जिम्मेदारी निभानी होगी।
सबसे पहले, प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की पहचान करके उनके उत्सर्जन पर वैज्ञानिक निगरानी रखी जाए। ईंट-भट्ठों और औद्योगिक इकाइयों का नियमित निरीक्षण हो तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने और सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाए।
निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, कचरा जलाने पर रोक, पराली प्रबंधन के व्यावहारिक विकल्प और हरित क्षेत्रों का संरक्षण भी आवश्यक हैं। प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की कार्यप्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए तथा उनकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
नागरिक भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। अनावश्यक वाहन उपयोग कम करना, कचरा न जलाना, पेड़-पौधों की देखभाल करना और जिम्मेदारी से त्योहार मनाना उपयोगी कदम हैं। प्रदूषण बढ़ने पर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों को स्वास्थ्य संबंधी सलाह के अनुसार अतिरिक्त सावधानी बरतनी
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रदूषण को केवल दीपावली या सर्दियों की मौसमी समस्या मानकर न देखा जाए। यह स्वास्थ्य, पर्यावरण, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रश्न है।
सरकारों को समय रहते प्रभावी कदम उठाने होंगे। उद्योगों को पर्यावरणीय नियमों का पालन करना होगा। प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से काम करना होगा। समाज को भी यह समझना होगा कि व्यक्तिगत आनंद की सीमा वहाँ समाप्त हो जाती है, जहाँ दूसरे व्यक्ति के स्वास्थ्य और अधिकार प्रभावित होने लगते हैं।
त्योहारों की रोशनी तभी सार्थक है, जब वह जीवन में उजाला लाए, न कि हवा में जहर घोले। विकास तभी वास्तविक है, जब वह प्रकृति के विनाश के बजाय उसके संरक्षण के साथ आगे बढ़े।
**स्वच्छ हवा किसी अधिकारी की कृपा या सरकार का उपकार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।**
आइए, ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें जहाँ दीपावली के दीप जलें, लेकिन किसी बच्चे की साँस न घुटे; जहाँ विकास हो, लेकिन प्रकृति का विनाश न हो; और जहाँ उत्सव की खुशियाँ किसी दूसरे के जीवन पर भारी

