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    Home » छात्रों के बूते राजनीति
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    छात्रों के बूते राजनीति

    Devanand SinghBy Devanand SinghDecember 18, 2019Updated:December 18, 2019No Comments4 Mins Read
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    छात्रों के बूते राजनीति
    देवानंद सिंह
    नागरिकता संशोधन कानून 2019 के लागू होने के बाद देश में जिस प्रकार उग्र आंदोलन हो रहे हैं, वह अत्यंत चितंनीय है। राजधानी दिल्ली भी इसकी चपेट में पूरी तरह आ चुकी है। मंगलवार को सीलमपुर और जाफराबाद में जिस प्रकार उपद्रवियों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, उससे लग रहा है कि लोगों के बीच जबरदस्त भ्रम की स्थिति है। खासकर, छात्रों में। क्योंकि इस पूरे आंदोलन में जिस प्रकार छात्रों को मोहरा बनाकर आगे किया जा रहा है, उससे लगता है कि कुछ राजनीतिक पार्टियां पूरे प्लान के साथ इस विरोध को अंजाम दे रही हैं। ऐसा इसीलिए हो रहा है, क्योंकि नागरिक संशोधन कानून को लेकर पूरा भ्रम फैला दिया गया है। इसको न तो छात्र समझने को तैयार हो रहे हैं और न ही विरोधी राजनीतिक पार्टियां। जबकि अधिनियम में कहीं भी इस बात का उल्लेख है ही नहीं कि इससे भारत के किसी भी नागरिक को नुकसान पहुंचेगा या उसकी नागरिकता छिनेगी। चाहे व हिंदू हो या फिर मुस्लिम। इसीलिए भारत के मुस्लिमों और मुस्लिम विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को इस बात को समझना चाहिए। ऐसी राजनीतिक पार्टियों के इरादों को भी समझना चाहिए, जो महज अपनी राजनीतिक रोटियों को सेंकने के लिए इस तरह का भ्रम फैला रही हैं।
    देश में बहुत से मुद्दों पर छात्र आंदोलन हुए हैं, लेकिन परिणामत: इसका कहीं-न-कहीं फायदा केवल राजनीतिक पार्टियों ने ही उठाया है। लिहाजा, छात्रों को ऐसी राजनीतिक पार्टियों द्बारा फैलाए जा रहे भ्रम में न आकर अधिनियम की मूल भावना को सही तरह से समझना चाहिए।

    अधिनियम में इतना भर है कि जो हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश हैं, वहां जो सताए गए अल्पसंख्यक हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। इसके अलावा जो ऐसे लोग वर्षों से भारत में रह रहे हैं और उन्हें अवैध माना जाता रहा है, उन्हें भी भारत की नागरिकता देना है, क्योंकि यह सच्चाई सभी जानते हैं कि हमारे पड़ोसी देशों खासकर, पाकिस्तान में अल्संख्यक काफी शोषित हैं। उन्हें वहां डर के माहौल में रहना पड़ता है। जब वे पीड़ित व शोषित होकर भारत की शरण में आते हैं तो वे महज शरणार्थी बनकर रह जाते हैं। लिहाजा, यह अधिनियम इन लोगों को इंसाफ देने का काम करने वाला है, जबकि इसमें भारत में रह रहे मुस्लिम नागरिकों से कोई भी लेना-देना नहीं है। उनकी नागरिकता भी भारत में उतनी ही सुरक्षित है, जितनी कि हिंदू नागरिकों की। इसीलिए इस विषय को लेकर न तो भ्रम फैलाने की कोई आवश्यकता होनी चाहिए और न ही किसी प्रकार के भ्रम में आने की।
    विपक्ष इस नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में संविधान के अनुच्छेद 1० और 14 की दुहाई दे रहा है, लेकिन वह यह समझने की जरूरत नहीं समझ रहा है कि क्या आखिर संविधान का अनुच्छेद 1० नागरिकता का अधिकार देता है। ऐसे में, सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस कानून से लोगों की नागरिकता को खतरा उत्पन्न होगा, जबकि इस कानून में नागरिकता खत्म किए जाने की कोई बात ही नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं, जो यह कहता है कि अगर आप आज नागरिक हैं तो कल से नागरिक नहीं माने जाएंगे। इसीलिए यह बात स्पष्ट है कि नया नागरिक संशोधन बिल सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 10 का उलंघन नहीं करता है। इसीलिए भ्रम की स्थिति में उत्पात मचाने से कोई फायदा नहीं है। राजनीतिक पार्टियों की मौकापरस्ती से प्रभावित होकर देश को आग में झौंकने वाले लोगों को समझना चाहिए कि इससे भारत के किसी भी धर्म समुदाय के लोगों को कोई खतरा नहीं है। वे भ्रम में आकर विरोध न करें और सरकारी संपत्ति को कोई नुकसान न पहुचाएं। छात्र एक पढ़ा-लिखा वर्ग होता है, उसे तो अधिनियम के बिंदुओं को गंभीरता से पढ़ लेना चाहिए। उन्हें उन चंद राजनीतिक पार्टियों द्बारा फैलाए जा रहे भ्रम में नहीं आना चाहिए, जो महज उन्हें मोहरा बना रहे हैं। वे ऐसा सिर्फ अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए कर रही हैं। पहले भी राजनीतिक पार्टियां ऐसा करती आईं हैं, लिहाजा छात्र अपने सोच को ऐसे नुकसानदेह प्रदर्शनों तक सीमित ना रखें, बल्कि आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ें।

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