मैंने स्वयं को जलाया,
अत्यंत कष्टदायक थी
मृत्यु की यह यातना।
चिता तो ठीक-ठाक ही बनाई थी मैंने
बांस की कच्ची लकड़ियों की,
जिसमें सात परतें थीं
और लंबाई छह फीट।
धधकती आग में
कच्चे मांस की
वह दुर्गंध…
माँ-बापू के
आंसुओ के भीगे बरामदे में
मेरे ही जले अंशो को
दफनाया गया
इसी तरह
दस दिन दस रातें और…
मृत शरीर में अतृप्त आत्मा की चीख
सुखनिद्रा में मग्न आज
मेरे सभी रिश्तेदार
मृत्यु पर विजय प्राप्त
हो अगर जीवन का गान
फिर भी क्यों गुनगुनाते हम
भयावह तमस्विनी का संगीत ?
और कितना होना पड़ेगा विध्वस्त
जीवन-प्रलय की इस धार में
शायद इसीलिए मैं अब
सपनों में बुनती हूँ
जीवन पतन का ही छंद ।
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

