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    सर दोराबजी टाटा : औद्योगिक भारत के सच्चे शिल्पकार

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarAugust 26, 2025Updated:August 26, 2025No Comments2 Mins Read
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    सर दोराबजी टाटा : औद्योगिक भारत के सच्चे शिल्पकार

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जमशेदपुर।भारत के औद्योगिक इतिहास में सर दोराबजी टाटा का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 27 अगस्त, 1859 को जन्मे जे. एन. टाटा के बड़े पुत्र सर दोराबजी ने अपने पिता की दूरदर्शी सोच को साकार करने में अहम भूमिका निभाई। इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कुछ समय बॉम्बे गजट में पत्रकारिता की, परंतु जल्द ही टाटा समूह की जिम्मेदारी संभाली।

    1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना के साथ ही उन्होंने अपने जीवन का ध्येय निर्धारित किया—राष्ट्र को एक मजबूत औद्योगिक आधार देना। 1932 तक लगभग पच्चीस वर्षों तक कंपनी के चेयरमैन के रूप में वे तन-मन-धन से लगे रहे। कंपनी पर संकट आया तो अपनी निजी संपत्ति तक गिरवी रख दी।

    श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। 1920 की हड़ताल के समय वे स्वयं जमशेदपुर आए और श्रमिकों की समस्याएं सुनकर विवाद का समाधान कराया। 1932 में टाटा स्टील के पहले संस्थापक दिवस पर उन्होंने श्रमिकों के कल्याण हेतु 25 हजार रुपये का अनुदान दिया।

    खेलों के क्षेत्र में भी सर दोराबजी का योगदान अद्वितीय है। घुड़सवारी, क्रिकेट और टेनिस में दक्ष रहे सर दोराबजी ने 1920 एंटवर्प ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों की पहली भागीदारी का पूरा खर्च स्वयं उठाया। 1924 पेरिस ओलंपिक में भारत की उपस्थिति सुनिश्चित की और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्य बने। उनके प्रयासों का परिणाम था कि 1928 एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारत ने हॉकी का पहला स्वर्ण पदक जीता।

    समाजसेवा की भावना से ओतप्रोत सर दोराबजी ने तीन करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति परोपकारी ट्रस्ट को समर्पित की। वर्ष 1910 में उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 3 जून, 1932 को उनका निधन हो गया।

    सर दोराबजी टाटा ने राष्ट्रनिर्माण, उद्योग, श्रमिक कल्याण और खेलों की दुनिया में जो विरासत छोड़ी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।

    सर दोराबजी टाटा : औद्योगिक भारत के सच्चे शिल्पकार
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