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    Home » सिदगोड़ा सूर्य मंदिर में सात दिवसीय दिव्य दार्शनिक प्रवचन एवं संकीर्तन में पशुपतिनाथ जी नेपाल से पधारे पूज्य स्वामी श्री रामदास जी ने चतुर्थ दिन किया प्रवचन, बताया- कर्म, योग और ज्ञान से नहीं ‘भक्ति से ही होगा कल्याण
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    सिदगोड़ा सूर्य मंदिर में सात दिवसीय दिव्य दार्शनिक प्रवचन एवं संकीर्तन में पशुपतिनाथ जी नेपाल से पधारे पूज्य स्वामी श्री रामदास जी ने चतुर्थ दिन किया प्रवचन, बताया- कर्म, योग और ज्ञान से नहीं ‘भक्ति से ही होगा कल्याण

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 14, 2023No Comments5 Mins Read
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    सिदगोड़ा सूर्य मंदिर में सात दिवसीय दिव्य दार्शनिक प्रवचन एवं संकीर्तन में पशुपतिनाथ जी नेपाल से पधारे पूज्य स्वामी श्री रामदास जी ने चतुर्थ दिन किया प्रवचन, बताया- कर्म, योग और ज्ञान से नहीं ‘भक्ति से ही होगा कल्याण

    जमशेदपुर। सिदगोड़ा स्थित सूर्य मंदिर में घनश्याम कृपालु धाम वृंदावन एवं जमशेदपुर सूर्य मंदिर समिति के संयुक्त सौजन्य में चल रहे सात दिवसीय दिव्य दार्शनिक प्रवचन एवं संकीर्तन के चौथे दिन पशुपतिनाथ जी नेपाल से आए हुए पूज्य स्वामी श्री रामदासजी ने ‘कर्म, योग और ज्ञान से नहीं ‘भक्ति से ही होगा कल्याण’ विषय पर मार्गदर्शन किया। उन्होंने बताया कि भगवान इन्द्रिय-मन-बुद्धि से परे हैं, दिव्य हैं इसलिए हम अपने इन्द्रिय-मन-बुद्धि के द्वारा

     

     

    भगवान को नहीं जान सकते। गीता में भगवान कहते हैं कि भगवान की कृपा से ही भगवान को जाना जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है कि भगवान की कृपा को पाने के लिए सबसे पहले भगवान की शरण में जाना होगा। वेद शास्त्र कहते हैं कि शरणागति मन को ही करनी है क्योंकि मन ही ईश्वरीय जगत में कर्ता है। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। स्वामी श्री रामदास जी ने भगवान की शरण में जाने के लिए कौन सा मार्ग सही है यह भी बताया।

     

     

    शास्त्रों में तीन मार्ग बताए गए हैं- कर्म, ज्ञान एवं भक्ति मार्ग अन्य सभी मार्ग इन के अंतर्गत ही आते हैं। कर्म का अभिप्राय है वर्णाश्रम धर्म-कर्म वेदों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास इन चार आश्रमों में जो जो कर्म करने के लिए कहा गया है उनको कर्म या धर्म कहते हैं। अगर कोई कर्म अथवा धर्म का ठीक-ठीक पालन करे तो उसकी गति स्वर्ग तक है। लेकिन स्वर्ग में भी वास्तविक सुख नहीं है। वहीं दुःख है, अशान्ति है।

     

     

    स्वर्ग में कुछ समय के लिए दुःख मिश्रित सीमित सुख को भोग करने के बाद स्वर्ग से जीव का पतन होता है। कलियुग में वर्णाश्रम धर्म का पालन करना शत प्रतिशत संभव नहीं है। क्योंकि कर्म करने के लिये छह कड़े कड़े नियम हैं-देश, काल, द्रव्य, पुरोहित, कर्ता, मन्त्र। अगर इनमें से कहीं भी त्रुटि होती है तो यजमान का ही नाश होता है।

    एक उपाय यह है कि हम कर्म करें और साथ में भगवान का स्मरण करते जाएं। कर्म को भगवान में समर्पित करते जाएं। गीता में भगवान ने अर्जुन से यही कहा है कि तुम कर्म करो और साथ में निरंतर मेरा स्मरण भी करते रहो। इसको कहते हैं कर्मयोग। क्योंकि कर्मयोग में भगवान की भक्ति भी की जाती है, इसीलिए कर्मयोग वंदनीय है। कर्मयोग के द्वारा हम भगवान के शरण में जा सकते हैं, भगवान को प्राप्त कर सकते हैं।

     

     

     

    यदि गुरु आज्ञा दें तो हम कर्म को पूरी तरह छोड़ सकते हैं। भगवान ने परम गोपनीय उपदेश देते हुए अर्जुन से यही कहा था कि अर्जुन सभी कर्म-धर्मों को छोड़कर के मेरी ही शरण में आ जाओ। इसको कहते हैं कर्मसंन्यास। कर्मसन्यास एवं कर्मयोग के द्वारा हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन केवल कर्म के द्वारा स्वर्ग ही मिल सकता है, जिसमें हमारा अनंत सुख नहीं है। दूसरा मार्ग है ज्ञान मार्ग ज्ञान मार्ग निर्गुण-निर्विशेष निराकार ब्रह्म को प्राप्त करने का मार्ग है। जो ब्रह्म के उपासक हैं उन्हें ज्ञानी कहते हैं। शास्त्र कहते हैं कि ज्ञान मार्ग में प्रवेश पाने के लिये पहले चार साधनों से संपन्न होना पड़ता है- विवेक, वैराग्य, शमादि षट्सम्पत्ति ( शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान) और मुमुक्षुत्व कलियुग में इन चार साधनों से संपन्न व्यक्ति दिया ले करके ढूंढने पर भी कदाचित् न मिले। यदि कोई अधिकारी है भी और ज्ञान साधना करता भी है तो ज्ञान साधना बहुत कठिन है। इसमें बार बार पतन होने का खतरा रहता है और अन्ततः उस ज्ञानी को केवल आत्मज्ञान ही हो सकता है, ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि ज्ञानियों के उपासक ब्रह्म अकर्ता है। वह कृपा नहीं कर सकते। अतः ज्ञानी को भी अन्त में सगुण साकार भगवान की भक्ति करनी पड़ती है। तब भगवान की कृपा से उनको मोक्ष मिलता है।

     

     

    एक और मार्ग है योग मार्ग, योग मार्ग परमात्मा को प्राप्त करने का मार्ग है। परमात्मा के जो उपासक हैं उनको योगी कहते हैं। आज कल लोग कुछ आसनों एवं प्राणायाम को करना ही योग कहते हैं। लेकिन योग में पहले यम और नियम होते हैं जिनका पालन करना कलियुग में असंभव है। अन्य युगों में भी योग साधन करने पर भले ही ऋद्धि-सिद्धि मिल जाय लेकिन योग साधन से भगवान नहीं मिलते क्योंकि योगियों के उपासक परमात्मा न्यायकर्ता हैं। वह कृपा नहीं करते हैं। अतः योग से भी हमारा कल्याण नहीं हो सकता इसलिए तुलसीदासजी महाराज ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि कलियुग में कर्म,

     

     

    ज्ञान और योग के द्वारा हम भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। केवल भगवान की भक्ति के द्वारा ही हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं, उनकी कृपा को प्राप्त कर सकते हैं। अतः हमें भगवान की भक्ति ही करनी होगी। भगवान की भक्ति कैसे करनी है यह स्वामीजी कल के प्रवचन में बताएंगे। इस दौरान पूरे पांडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही।

     

    बताया- कर्म योग और ज्ञान से नहीं 'भक्ति से ही होगा कल्याण सिदगोड़ा सूर्य मंदिर में सात दिवसीय दिव्य दार्शनिक प्रवचन एवं संकीर्तन में पशुपतिनाथ जी नेपाल से पधारे पूज्य स्वामी श्री रामदास जी ने चतुर्थ दिन किया प्रवचन
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