देवानंद सिंह
जब मंगलवार को यह समाचार आया कि पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया, तब न केवल भारतीय राजनीति के एक अध्याय का अंत हुआ, बल्कि एक ऐसे शख़्स की विरासत पर फिर से चर्चा शुरू हो गई, जो सत्ता के केंद्र में रहकर भी सत्ता विरोधी तेवर अपनाने के लिए जाना जाता था। 77 वर्षीय सत्यपाल मलिक का जीवन एक रंगमंच जैसा था, जहां एक साथ कई किरदार निभाए गए, एक छात्र नेता से लेकर, सांसद, राज्यपाल, और अंततः एक मुखर आलोचक के रूप में।
सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के हिसावदा गांव में हुआ था। पिता के देहांत के बाद उन्होंने विषम परिस्थितियों में शिक्षा और राजनीतिक चेतना अर्जित की। लोहियावादी समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने मेरठ कॉलेज छात्रसंघ से राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। ये वही दौर था, जब चौधरी चरण सिंह जैसे नेता भारतीय राजनीति में किसानों और ग्रामीण भारत की आवाज़ बनकर उभर रहे थे। सत्यपाल मलिक ने इन्हीं विचारों को आत्मसात किया।
1974 में वे पहली बार चौधरी चरण सिंह की पार्टी ‘भारतीय क्रांति दल’ के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। मात्र 28 वर्ष की आयु में विधायक बन जाना, वह भी जाट बहुल क्षेत्र में, बताता है कि मलिक की राजनीति ज़मीनी थी। 1980 में राज्यसभा और फिर कांग्रेस में शामिल होना उनके राजनीतिक प्रयोगवाद की शुरुआत थी सत्यपाल मलिक का राजनीतिक जीवन विचारधाराओं के ध्रुवों के बीच बहता रहा। कांग्रेस से लेकर लोकदल, जनमोर्चा, समाजवादी पार्टी और अंततः भारतीय जनता पार्टी तक का सफ़र इस बात को दर्शाता है कि उन्होंने सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं से अधिक राजनीतिक प्रासंगिकता को तरज़ीह दी। 1987 में जब वी.पी. सिंह ने बोफोर्स मुद्दे पर मोर्चा खोला, मलिक उनके साथ आ गए, और जनता दल में सक्रिय भूमिका निभाई। 1989 में वे अलीगढ़ से लोकसभा पहुंचे, लेकिन 1996 और 2004 में बागपत और अलीगढ़ से करारी हार ने उनके जाट नेतृत्व की छवि को गहरा आघात पहुंचाया। यह यथार्थ उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ‘पदस्थ’ तो बनाए रखता है, लेकिन ‘जनादेश प्राप्त’ राजनेता के रूप में नहीं। 2004 में बीजेपी ज्वाइन करना और फिर पार्टी में विभिन्न पदों पर नियुक्तियां पाना, यह सत्यपाल मलिक के लिए एक पुनरागमन था। 2017 में बिहार, फिर जम्मू-कश्मीर, गोवा और अंततः मेघालय के राज्यपाल बनाए जाना, एक ऐसा क्रम था जिसमें वे संस्थागत पदों से जुड़े रहे, लेकिन कई बार इन पदों की सीमाओं को लांघते हुए सत्ता की आलोचना भी करते रहे।
जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए अनुच्छेद 370 का हटना, उनकी सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती और पहचान बन गई। वे अकेले ऐसे राज्यपाल रहे, जिन्होंने यह खुलासा किया कि उन्हें इस फैसले की जानकारी केवल एक दिन पहले दी गई थी। यह आरोप न केवल संविधानिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वे महज़ एक ‘साइनिंग अथॉरिटी’ बनाकर रख दिए गए थे। 2019 में पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों की शहादत को लेकर मलिक का केंद्र सरकार पर लगाया गया आरोप उनकी सबसे विवादास्पद टिप्पणी बनकर उभरा। उनका दावा कि यदि सीआरपीएफ को एयरलिफ्ट की अनुमति दी गई होती तो यह हमला टल सकता था, भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान पर एक गहरी चोट थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि जब उन्होंने प्रधानमंत्री को यह बात बताई, तो उन्हें चुप रहने की सलाह दी गई।
गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर सवाल उठाया कि मलिक ने उस समय चुप्पी क्यों साधी, जब वे राज्यपाल पद पर थे। यह प्रश्न न केवल मलिक की नैतिक ज़िम्मेदारी पर, बल्कि राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका की सीमाओं पर भी बहस को जन्म देता है। केंद्र की विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ जब दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन चल रहा था, तब सत्यपाल मलिक ने खुलकर आंदोलन का समर्थन किया। वे किसानों की मौत पर केंद्र सरकार की संवेदनहीनता के खिलाफ मुखर हुए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि दिल्ली से एक चिट्ठी तक नहीं आई, और किसानों की मौत पर प्रधानमंत्री से उनकी बहस भी हुई।
यह एक अपवाद था कि एक वर्तमान राज्यपाल अपनी संवैधानिक निष्पक्षता की सीमा लांघकर सरकार के खिलाफ खुले मंच से बोल रहा था। यह सत्यपाल मलिक के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू था, जो सत्ता का हिस्सा होकर भी सत्ता के विरुद्ध खड़ा हो सकता था। मलिक ने एक और सनसनीखेज दावा किया कि जम्मू-कश्मीर के गवर्नर रहते हुए उनके पास प्रधानमंत्री के करीबी लोग एक परियोजना के लिए दलाली का प्रस्ताव लेकर आए थे, और उन्हें 300 करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश की गई थी। उन्होंने इसे ठुकरा दिया और प्रधानमंत्री को इसकी जानकारी दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह आरोप न केवल मोदी सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत में संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के समक्ष किस प्रकार के ‘आकर्षण’ पेश किए जाते हैं, हालांकि सत्यपाल मलिक के कुछ बयान उनकी साफ़गोई के प्रतीक हैं, लेकिन कई बार उनकी भाषा और प्रस्तुत शैली ने उनकी गरिमा को भी प्रभावित किया। गवर्नर दारू पीता है जैसे बयान या यह कहना कि गवर्नर का कोई काम नहीं होता, संस्थागत गरिमा को क्षति पहुंचाते हैं, इससे उनकी छवि एक असंतुलित आलोचक की बन जाती है, जो तात्कालिक लोकप्रियता की खातिर अपने पद की मर्यादा भी भूल सकता है।
सत्यपाल मलिक की राजनीतिक यात्रा दरअसल भारतीय लोकतंत्र की बहुआयामी प्रवृत्तियों का आईना है। वे न तो विशुद्ध विचारधारात्मक नेता रहे, न ही केवल पदलोलुप अवसरवादी। उनका व्यक्तित्व एक ऐसी धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें विचार, अवसर और विवेक तीनों का मिश्रण दिखाई देता है। उनका जीवन यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति को सत्ताविरोध का नैतिक अधिकार है? क्या पुलवामा जैसे गंभीर मसले पर किसी राज्यपाल की ‘बाद में’ आई चेतना पर्याप्त मानी जानी चाहिए? क्या किसानों के पक्ष में बोलना ‘संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन’ था या जनतंत्र की आत्मा को बचाने की कोशिश? कुल मिलाकर, सत्यपाल मलिक का राजनीतिक और प्रशासनिक सफ़र बहसों और बगावतों से भरा रहा। वे कई बार असुविधाजनक सच कहने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आए, तो कई बार आत्म-विरोधाभासों में उलझे हुए। वे शायद पहले ऐसे राज्यपाल थे जिन्होंने सरकार के खिलाफ जाते हुए अपने संवैधानिक पद का ‘लोकतांत्रिक उपयोग’ किया। उनकी विरासत एक स्थायी बहस छोड़ जाती है—राजनीति में पद महत्वपूर्ण है या ईमानदारी? और क्या कोई व्यक्ति सत्ता के भीतर रहकर भी सच्चाई की आवाज़ बन सकता है? भारत सत्यपाल मलिक को एक ऐसे ‘राज्यपाल’ के रूप में याद रखेगा, जिसने सत्ता के विरुद्ध बोलने का साहस दिखाया, चाहे उसके लिए उन्हें संस्थागत अकेलापन क्यों न सहना पड़ा हो। उनकी चुप्पियां उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी उनकी बोलियां। अब उनके जाने के बाद, देश के पास उनके बयानों की गूंज रह गई है, जो लंबे समय तक सत्ता और जनता के बीच पुल का काम करती रहेगी।

