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    Home » सस्टेनेबल नहीं, ‘सनातन विकास’ मॉडल अपनाएं-सरयू राय
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    सस्टेनेबल नहीं, ‘सनातन विकास’ मॉडल अपनाएं-सरयू राय

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarMay 23, 2026No Comments9 Mins Read
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    सस्टेनेबल नहीं, ‘सनातन विकास’ मॉडल अपनाएं-सरयू राय

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जमशेदपुर। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने पहले पहाड़ और नदियों को बचाने, फिर विकास करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि आज का मॉडल थोड़ा दूसरे किस्म का है। आज विकास खूब किया जा रहा है और कभी संभव हुआ तो पहाड़ और नदियों को बचाने की बात की जा रही है। दरअसल, आज वाला विकास का मॉडल विनाश का मॉडल है। उन्होंने माना कि विकास का काम जरूरी है लेकिन वो ऐसा विकास हो, जो चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर हो। पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन छोड़े। इस विकास के मॉडल को उन्होंने ‘सनातन विकास’ का नाम दिया।


    यहां मोतीलाल नेहरु पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि कई लोगों ने जानना चाहा कि इतने कानून होते हुए नए कानून की जरूरत क्या है। पुराने कानून लागू क्यों नहीं होते। हम लोग रोज इस स्थिति से दो-चार होते हैं। पर्यावरण की छोड़िए, सामान्य प्रसासन में जो कानून पहले से बने हुए हैं, वो लागू नहीं होते। जो लागू होते हैं, वो कानून की मूल भावना के विपरीत भावना से ही लागू होते हैं। ये विडंबना है।
    सरयू राय ने कहा कि सरकार ने भारी भरकम कानून बनाए हैं। उन्हीं के आलोक में विकास और पर्यावरण के संबंधों की हम लोग मीमांसा करते हैं। कुछ दिन पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी कर दी कि पर्यावरण का काम करने वाले बताएं कि उन्होंने विकास का कहां समर्थन किया। ऐसी टिप्पणियों पर जनमानस के बीच में हमें सफाई भी देनी चाहिए। जो पर्यावरण की बात करते हैं, वो विकास के दौरान होने वाली ऐसी घटनाएं होती हैं जो समाज में प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, जिस नाते कानून बनाए गए हैं, कानून के असली उद्देश्य पूर्ण हों।


    उन्होंने कहा कि विकास हो, लेकिन एकांगी न हो। इन दिनों सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात हो रही है। भारत सरकार ने 2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट का लक्ष्य रखा है। इतने दिनों में डेवलपमेंट को सस्टेनेबल बनाने के लिए कुछ होता दिख नहीं रहा। हमें लगता है कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट के बदले अगर सनातन डेवलपमेंट की बात करें तो बेहतर होगा। सनातन का अर्थ क्या है-नित्य नूतन, चिर पुरातन। शुरुआती दौर से जो विकास के कार्य हो रहे हैं, हमें उन्हें आगे बढ़ाना है। उसमें कोई खामी दिखे तो उसे दूर करना है। इस तरह से विकास की धारा चलती रहती है। विकास में दिशा में कोई अचानक परिवर्तन न करे।
    श्री राय ने कहा कि सनातन विकास की बात इसलिए आई क्योंकि शुरुआती दौर से चले आ रहे विकास कार्य को अनंत काल तक चलाना है। पुरातन विचार भी यही है। उन्होंने कहा कि पहले वन विभाग के लोग उन्हें अवसर विशेष पर बुलाते थे और वह जाते भी थे। जब से उन्होंने पूछना शुरु किया कि हमारा-आपका इस दिवस विशेष के प्रति कर्तव्य क्या है, उन्होंने बुलाना ही बंद कर दिया।


    उन्होंने कहा कि पहले के कानून लागू नहीं हो रहे हैं और नया कानून हम लोग बनाने के लिए प्रयासरत हैं। नए कानून से कुछ और नहीं होगा तो जनता के हाथ में एक और हथियार आ जाएगा। वो न्यायालय का दरवाजा तो खटखटा सकते हैं। हम भी विकास चाहते हैं। लेकिन हम जो विकास चाहते हैं, वो ऐसा विकास हो जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अस्तचित्व पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।
    अतिथियों का सम्मान
    इसके पूर्व गौतम सूत्रधार का संजीव मुखर्जी ने, अरुण कु. शुक्ला का प्रवीण सिंह और प्रेम ने, संजय उपाध्याय का संतोष भगत तथा टुनटुन सिंह ने, प्रो. एम.के. जमुआर का नीरू सिंह और सुनीता सिंह ने, प्रो. गोपाल शर्मा का विनीत ने, मनोज सिंह का निर्मल सिंह ने शाल, पौधा और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। यूपी संघ के अध्यक्ष डीपी शर्मा का विधायक सरयू राय और राजेंद्र सिंह ने स्वागत किया।
    सरयू राय की पुस्तक चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा का और स्मारिका का विमोचन


    जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और कई पुस्तकों के लेखक सरयू राय की नई पुस्तक चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा का आज विमोचन हुआ। यह पुस्तक अंग्रेजी में है। इसमें सारंडा में आए परिवर्तन के बारे में जानकारी दी गई है। पुस्तक की कीमत मात्र 100 रुपये है। आज स्मारिका का भी विमोचन किया गया। स्मारिका के संपादक अंशुल शरण हैं। इसमें 126 पेज हैं जो पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर लिखे गए लेखों से अटे पड़े हैं।
    ड्राफ्ट फाइनल करने का जिम्मा प्रो. अंशुमाली और प्रो.पीयूष कांत पांडेय को
    जमशेदपुर। राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के संरक्षक राजेंद्र सिंह ने प्रो. पीयूष कांत पांडेय और प्रो. अंशुमाली को कानून का ड्राफ्ट तय करने की जिम्मेदारी सौंपी है। ये दोनों मिल कर कुल तीन ड्राफ्टों का अध्ययन कर एक ड्राफ्ट बनाएंगे जिसमें हर वो तथ्य शामिल होंगे, जो दो दिनों तक यहां डिस्कस किये गए। ये दोनों हफ्ते भर के भीतर उस ड्राफ्ट को तैयार कर राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय को भेजेंगे। उसके उपरांत उस पर और चर्चा होगी।

    माई कह कर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़ः राजेंद्र सिंह
    जमशेदपुर। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा है कि माई कह कर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़। नदी और पहाड़ को इकोनॉमिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मानना गलत है। दुर्भाग्य ये कि आज भारत के विकास में प्रकृतिक संसाधनों को इसी नजरिये से देखा जा रहा है।
    यहां मोतीलाल नेहरु पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर अध्यक्ष उन्होंने कहा कि भारत सरकार का एजेंडा है रेयर मैटेरियल को ज्यादा से ज्यादा निकालना। हम लोग जिस कानून को लेकर चल रहे हैं, वह कहता है कि यह काम नहीं करना है। हमें समझ लेना चाहिए कि भारत सरकार का रास्ता और हमारा रास्ता क्या है?


    राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी हो गया है। अब आपको अपने घर, मोहल्ले आदि में इसके संबंध में लोगों से चर्चा करनी है ताकि कानून बनवाने में मदद मिले। हम लोगों से मिलेंगे। आप भी लोगों से मिलें। ड्राफ्ट भर बना देने से कानून नहीं बन जाएगा।
    जलपुरुष ने कहा कि कल (रविवार) वह बेगलुरू जा रहे हैं। वहां उन्होंने एक सम्मेलन बुलाया है। उस सम्मेलन में इसी कानून पर चर्चा की जाएगी। उसमें कई विधायकों को भी आमंत्रित किया गया है।
    उन्होंने कहा कि इस कानून के लिए एक माहौल बनाने की जरूरत है। इसके लिए हमें सोशल मीडिया, मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। संवाद बनाएं। सांसदों-विधायकों से भी संवाद करें। इस कानून के लिए लोग यात्राएं कर सकते हैं। शिक्षण संस्थानों के लोग इसमें ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। वो विद्यार्थियों को मोटिवेट कर सकते हैं। गांवों में, पंचायतों में जाएं लोग। वह भी जाएंगे। अब उनका कोई एजेंडा नहीं है, सिवाय इस कानून को बनाने का।


    श्री सिंह ने कहा कि एक तरफ पर्यावरण और हमारा भविष्य है। दूसरी तरफ हमारा देश, संस्कृति और प्रकृति है। इन दोनों के रिश्तों को जबसे हमने समझना छोड़ दिया है, तब से हम नीचे की तरफ जा रहे हैं। भारत में जब तक संस्कृति और प्रकृति के योग से विकास हो रहा था, तब भारत का जीडीपी 32 प्रतिशत था। यह मात्र 200 साल पुरानी बात है। जब से विकास का यह नया मॉडल आया है, हमारे ज्ञान का विस्थापन हो गया है। इस विकास में विनाश है।

    कानून (ड्राफ्ट) को लेकर आए सुझाव
    -भाषा सरल हो और आम आदमी के समझ में आ जाए
    -कानून ऐसा बने, जिसमें गोलाकार टेबल पर जज और वकील बैठ सकें
    -साइंटिफिक संस्थानों को भी इसमें पावर दिया जाए
    -पॉलिसी बनाने वाले भी इसमें मजबूत स्थिति में हों
    -राज्य और केंद्र के बारे में ध्यान से देखना होगा
    -पहाड़ की सम्यक परिभाषा देनी पड़ेगी, ताकि कोई चुनौती न दे सके
    -वैध और अवैध खनन पर विस्तार से चर्चा हो
    -ब्लास्टिंग पर पूर्णतः रोक हो
    -रिवर बेसिन प्रोटेक्शन के बारे में भी पूरी चर्चा हो

    राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के आखिरी दिन जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी
    जमशेदपुर। तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट तथा मिशनY के संयुक्त तत्वावधान में साकची स्थित मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑटियोरियम में लगातार दो दिनों तक मैराथन बैठक के उपरांत राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन में शनिवार को जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी किया गया।
    घोषणा पत्र में कहा गया कि हम, तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, मिशनY के प्रतिनिधि तथा 22 एवं 23 मई 2026 को जमशेदपुर में आयोजित राष्ट्रीय नदी एवं पर्वत सम्मेलन के समस्त प्रतिनिधिगण, भारत के पर्वतीय एवं नदी पारितंत्रों के संरक्षण, सुरक्षा एवं सतत प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ता से व्यक्त करते हैं।
    घोषणापत्र में कुल 10 बिंदु हैं। पहले बिंदु में कहा गया कि हम यह स्वीकार करते हैं कि पर्वतीय पारितंत्र जल सुरक्षा, नदियों के पुनर्जीवन, जैव विविधता तथा करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दूसरे बिंदु में कहा गया कि हम उन पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों एवं जलस्रोतों की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, जो नदियों एवं भूजल भंडारों को पोषित करते हैं। तीसरे बिंदु के अनुसार, हम यह मान्यता देते हैं कि आदिवासी एवं स्थानीय पर्वतीय समुदाय पर्वतीय पारितंत्रों के प्रमुख संरक्षक हैं तथा पर्वतीय पारितंत्र प्रबंधन संबंधी उनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान एवं स्वीकार करते हैं। चौथे बिंदु में कहा गया है कि हम पर्वतीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के दीर्घकालिक नियमन हेतु एक समग्र, पारितंत्र-आधारित एवं अधिकार-सम्मानित विधिक ढांचा विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
    पांचवे बिंदु में कहा गया है कि हम नदियों एवं पर्वतों के अधिकार सुनिश्चित करने तथा उनके सुशासन हेतु संस्थागत व्यवस्थाएं स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसी प्रकार छठे बिंदु में हम भारत के पर्वतीय पारितंत्रों के लिए विधिक ढांचा तैयार करने हेतु देशव्यापी परामर्श आयोजित करने का संकल्प लेते हैं। सातवें बिंदु में कहा गया है कि इस घोषणा की तिथि से एक वर्ष के भीतर उक्त विधिक ढांचे के प्रारूप को तैयार करने का संकल्प लेने, आठवें बिंदु में नागरिक समाज संगठनों, शिक्षाविदों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, समाज वैज्ञानिकों, विधिवेत्ताओं, आदिवासी समुदायों के प्रमुखों तथा अन्य हितधारकों से आग्रह करते हैं कि वे पर्वतीय पारितंत्रों के लिए विधिक ढांचे के निर्माण में सहयोग प्रदान करने, नौवें बिंदु में कहा गया कि हम राज्य सरकारों एवं भारत सरकार से आग्रह करते हैं कि विकसित किए गए इस विधिक ढांचे पर विचार कर इसे “पर्वत संरक्षण अधिनियम” के विधेयक के रूप में संबंधित विधानसभाओं तथा लोकसभा एवं राज्यसभा के समक्ष पारित करने हेतु प्रस्तुत करें। सबसे आखिरी, 10वें बिंदु के रुप में कहा गया कि हम इस घोषणा-पत्र को अंगीकृत करते हुए इसके प्रभावी क्रियान्वयन के प्रति स्वयं को समर्पित करते हैं।

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