सड़क दुर्घटनाएं: तेज रफ्तार बन रही युवाओं की दुश्मन
वर्तमान समय में हमारे समाज के लिए सड़क दुर्घटनाएं एक अभिशाप बन गई हैं। आए दिन समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों में हम देखते हैं कि कई उभरते हुए युवक-युवतियों का जीवन सड़क पर असमय ही समाप्त हो जाता है। परिवहन विभाग द्वारा बार-बार दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बावजूद, चालकों का एक वर्ग अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन को भी खतरे में डाल रहा है।
अत्यधिक गति केवल नियम का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह एक आत्मघाती कदम है। तेज़ रफ़्तार वाहन चलाते समय चालक का नियंत्रण खोने की संभावना 90% तक बढ़ जाती है। परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश दुर्घटनाएं रात के समय या सुनसान सड़कों पर अत्यधिक गति के कारण होती हैं। हमारे समाज को यह समझना चाहिए कि घर पर कोई उनका इंतज़ार कर रहा है। क्षणिक आनंद या ‘थ्रिल’ के लिए पूरे जीवन को रोक देना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है। इसलिए, आइए हम शपथ लें— “सड़क पर नियमों का पालन करेंगे, जीवन सुरक्षित रखेंगे।”
इसके लिए हमें कुछ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना होगा:
सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान: गति सीमा का पालन करें। परिवहन विभाग द्वारा निर्धारित गति से अधिक तेज़ गाड़ी न चलाएं।
हेलमेट और सीटबेल्ट: दुपहिया वाहन पर हेलमेट और चौपहिया वाहन में सीटबेल्ट का हमेशा उपयोग करें।
नशे में गाड़ी न चलाएं: नशे की दुनिया में जीवन के महत्व को भूलना उचित नहीं है।
मोबाइल का प्रयोग: गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग करना मौत को आमंत्रण देने के समान है।
सुरक्षित घर वापसी: समय से पहले मौत के दरवाजे पर पहुँचने से बेहतर है कि सुरक्षित घर पहुँचें।
यदि हम सभी परिवहन विभाग के नियमों का पालन करें, तो निश्चित रूप से समाज को सुरक्षित रख पाएंगे। अन्यथा, हमारे समाज में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि— “सड़क का नशा या मौत की चीख? परिवहन के नियमों का मज़ाक उड़ाकर खत्म हो रही है युवा पीढ़ी!”
आज हमारे राज्य के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में सड़क दुर्घटनाएं एक महामारी की तरह फैल गई हैं। परिवहन विभाग की बार-बार चेतावनी के बावजूद, कुछ चालकों की मनमानी और तेज़ रफ़्तार के शौक के कारण हर दिन सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। विशेष रूप से 18 से 30 वर्ष के युवाओं के बीच तेज़ रफ़्तार मोटरसाइकिल या वाहन चलाने की जो होड़ शुरू हुई है, वह आज समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
भारत में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में से लगभग 71.2% केवल अत्यधिक गति के कारण होती हैं।
हर साल लगभग 1.5 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। यानी भारत में हर घंटे लगभग 18 लोगों की सड़क पर मौत होती है।
इन दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले लोगों में लगभग 66.5% लोग कार्यक्षम आयु वर्ग (18-45 वर्ष) के होते हैं।
इसलिए कानून के तहत नियमों को सख्त करना होगा। नियम तोड़ने वालों पर न केवल जुर्माना लगाया जाना चाहिए, बल्कि उनका लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करने जैसे कदम भी उठाए जाने चाहिए। सड़क सुरक्षा किसी एक विभाग का काम नहीं है, इसे एक जन आंदोलन बनना चाहिए। परिवहन विभाग के निर्देश हमारी मौत के लिए नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए हैं। इसलिए, “सावधानी हटी, दुर्घटना घटी” की बात को याद रखते हुए हमें एक जिम्मेदार चालक बनना समय की मांग है।
यहाँ यह भी कहना होगा कि कभी-कभी दूसरों की गलती के कारण निर्दोष जनता के लिए सड़क सुरक्षा एक दुखद अध्याय बन जाती है। वर्तमान में सड़क पर चल रही ‘रफ़्तार की प्रतिस्पर्धा’ न केवल चालक के लिए खतरा पैदा कर रही है, बल्कि यह आम जनता के लिए भी काल बन गई है। जो व्यक्ति हर नियम का पालन करता है, हेलमेट पहनता है या सीटबेल्ट लगाकर सही गति से गाड़ी चलाता है, वह भी आज सुरक्षित नहीं है।
इसके मुख्य कारण हैं:
गलत ओवरटेकिंग: विपरीत दिशा से आना या दूसरों से आगे निकलने की होड़ में एक जागरूक चालक को दुर्घटना की ओर धकेल दिया जाता है।
पदयात्रियों की असुरक्षा: सड़क किनारे चलने वाले राहगीर या साइकिल सवार अक्सर तेज़ रफ़्तार वाहनों का शिकार हो जाते हैं। इसमें राहगीर की कोई गलती नहीं होती, फिर भी किसी चालक की “लापरवाही” के कारण उसे अपनी जान गंवानी पड़ती है।
नशे में धुत चालक: शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोग नियंत्रण खो देते हैं और सड़क किनारे की दुकानों या लोगों पर गाड़ी चढ़ा देते हैं, ऐसी दुखद घटनाएं हाल के दिनों में बढ़ी हैं।
“मैं नियमों का पालन कर रहा हूँ, इसलिए मैं सुरक्षित हूँ”— यह धारणा आज की सड़कों पर गलत साबित हो रही है। क्योंकि दूसरों की गैर-जिम्मेदारी हमारे समाज में एक जागरूक चालक को भी दुर्घटना के मुँह में धकेल कर उसकी जान ले सकती है।
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता: जालुकबारी

