राष्ट्र संवाद संवाददाता
देश के रणनीतिक महत्व वाले उपक्रम यूसिआईएल में इस समय सबसे बड़ा सवाल उत्पादन को लेकर खड़ा हो गया है। पिछले कुछ वर्षों तक लगातार बढ़ोतरी दर्ज करने के बाद अब उत्पादन में आई गिरावट ने प्रबंधन की कार्यशैली पर चर्चा तेज कर दी है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020-21 में 510 टन उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर 2022-23 में 590 टन और 2023-24 में 622 टन तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद गिरावट शुरू हुई और 2024-25 में उत्पादन 570 टन पर आ गया। वहीं, 2025-26 में यह घटकर करीब 490 टन तक सिमट गया है, जो हाल के वर्षों में सबसे कम स्तर माना जा रहा है। लगातार तीन वर्षों तक उत्पादन बढ़ने के बाद अचानक आई गिरावट कई सवाल खड़े कर रही है। जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि प्रबंधन, संचालन और समन्वय से जुड़ा मुद्दा हो सकता है। विशेष रूप से नए सीएमडी डॉ. कंचन आनंद राव के कार्यकाल में उत्पादन का 500 टन से नीचे जाना चर्चा का विषय बना हुआ है।
सूत्रों के अनुसार, कार्यभार संभालने के करीब छह माह बाद भी बगजाता, नरवापहाड़, तुरामडीह, मोहुलडीह खदानों और तुरामडीह मिल जैसे प्रमुख इकाइयों का दौरा नहीं किया जाना कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय है। ये इकाइयां यूसीआईएल की उत्पादन रीढ़ मानी जाती हैं। ऐसे में जमीनी स्तर पर संवाद और निरीक्षण की कमी को उत्पादन पर असर डालने वाला एक कारण माना जा रहा है। आंतरिक स्तर पर यह भी चर्चा है कि फील्ड अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और वरिष्ठ प्रबंधन जैसे जीएम और ईडी स्तर के साथ व्यापक तकनीकी विमर्श की जरूरत महसूस की जा रही है।यूसीआईएल जैसे संवेदनशील उपक्रम में अंतिम मूल्यांकन उत्पादन और कार्यक्षमता से ही होता है। पिछले वर्षों की तुलना में उत्पादन में आई गिरावट यह संकेत दे रही है कि प्रबंधन और संचालन के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता है। अब नजर इस बात पर है कि सीएमडी डॉ. कंचन आनंद राव उत्पादन को फिर से पटरी पर लाने और संगठन में संतुलित प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।

