पत्रकारिता पर हमले के लिए सिर्फ सत्ता नहीं, समाज भी जिम्मेदार है
गोदी मीडिया के विरोध से स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा नहीं होगी, जब तक पत्रकार के संकट में समाज, पाठक और पत्रकार बिरादरी उसके साथ खड़े नहीं होंगे।
देवानंद सिंह
जंतर-मंतर पर एक बार फिर प्रदर्शन होंगे। नारे लगेंगे, भाषण होंगे, पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर चिंता जताई जाएगी और मीडिया पर हो रहे हमलों के खिलाफ आवाज बुलंद की जाएगी। यह सब जरूरी भी है, लेकिन एक सवाल अपनी जगह कायम रहेगा जब किसी पत्रकार पर हमला होता है, जब उसे माफिया और गुंडों की धमकियां मिलती हैं, जब उसकी आजीविका छीनने की कोशिश होती है, तब उसके साथ खड़ा कौन होता है?
टीवी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अगर सत्ता की चरण-वंदना में लगा रहा, तो उसे गोदी मीडिया कहा गया। सत्ता से सवाल पूछने के बजाय सत्ता के सुर में सुर मिलाने वाली पत्रकारिता की आलोचना होनी भी चाहिए। पत्रकारिता का धर्म सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उससे जवाब मांगना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गोदी मीडिया का विरोध करते-करते हमने उन पत्रकारों को भी खारिज कर दिया, जो सीमित संसाधनों में स्वतंत्र पत्रकारिता की लड़ाई लड़ रहे थे? क्या किसी पूरे पेशे को एक अपमानजनक विशेषण से बांध देना पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा का सही रास्ता है?
सच्चाई यह है कि पत्रकारिता केवल बड़े स्टूडियो, चमकदार स्क्रीन और बड़े संस्थानों का नाम नहीं है। छोटे अखबारों, स्थानीय समाचार पत्रों और स्वतंत्र पत्रकारों की एक बड़ी दुनिया भी है, जो बिना बड़े आर्थिक सहारे के जनहित के सवाल उठाती है। कई बार इन्हीं पत्रकारों को स्थानीय माफिया, दबंगों और आपराधिक तत्वों के सामने सबसे अधिक जोखिम उठाना पड़ता है। उनके पास न बड़े संस्थानों की कानूनी टीम होती है, न संकट के समय खड़े होने वाला कोई मजबूत प्रबंधन। हमला होता है, धमकी मिलती है, मुकदमे झेलने पड़ते हैं, लेकिन उनकी पीड़ा अक्सर सुर्खियों तक नहीं पहुंचती।
विडंबना देखिए कि जिस समाज के लिए पत्रकार जोखिम उठाता है, वही समाज कई बार उसके संघर्ष से मुंह मोड़ लेता है। पड़ोस में रहने वाले लोगों को भी यह जानने की जरूरत महसूस नहीं होती कि धमकी झेल रहे पत्रकार और उसके परिवार का क्या हाल है। पत्रकार पर हमला किसी एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि समाज के सूचना पाने और सच जानने के अधिकार पर हमला है। फिर भी संवेदना अक्सर सोशल मीडिया की कुछ पंक्तियों तक सिमटकर रह जाती है।
इस तस्वीर का दूसरा पहलू पाठकों और अखबारों के आर्थिक संबंधों से जुड़ा है। हर पाठक चाहता है कि उसे खबरें मुफ्त मिलें, अखबार सस्ता मिले और पत्रकारिता लगातार चलती रहे। हॉकर से लेकर छोटे अखबार के प्रकाशक तक भुगतान के लिए चक्कर लगाते हैं। पाठक की आर्थिक मजबूरी अपनी जगह है, लेकिन यह भी समझना होगा कि खबर तैयार करने, पत्रकारों को वेतन देने, छपाई और वितरण की व्यवस्था चलाने में वास्तविक खर्च होता है। यदि समाज स्वतंत्र पत्रकारिता चाहता है, तो उसे उसके आर्थिक आधार को मजबूत करने पर भी विचार करना होगा। मुफ्त खबरों की अपेक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता की मांग के बीच का विरोधाभास अनदेखा नहीं किया जा सकता।
पत्रकार बिरादरी भी आत्ममंथन से बच नहीं सकती। कुछ तथाकथित बड़े पत्रकारों ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल पत्रकारों के साझा हितों के बजाय निजी प्रतिष्ठा और सुविधाओं के लिए किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बहिष्कार को कभी-कभी सिद्धांत का नाम दिया गया, तो कहीं नेताओं के दरवाजों पर पहुंचकर महंगे उपहार स्वीकार करना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। सत्ता के साथ निकटता को उपलब्धि मानने वाली मानसिकता ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया। हालांकि सभी पत्रकारों को एक ही तराजू पर तौलना भी उतना ही अनुचित होगा।
आज जरूरत किसी एक मीडिया समूह को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता के पूरे तंत्र की कमजोरियों को पहचानने की है। सत्ता की जवाबदेही तय हो, मीडिया संस्थानों की भूमिका की समीक्षा हो, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और विज्ञापन तथा आर्थिक दबावों से संपादकीय स्वतंत्रता बचाई जाए। साथ ही पत्रकार संगठनों को छोटे अखबारों और स्वतंत्र पत्रकारों के संकट में भी उसी तत्परता से आगे आना चाहिए, जैसी तत्परता बड़े नामों के मामलों में दिखाई जाती है।
जंतर-मंतर पर आवाज उठे, जरूर उठे। लेकिन वह आवाज केवल नारों में सीमित न रहे। पत्रकार पर हमला होने पर निष्पक्ष जांच, कानूनी सहायता और परिवार की सुरक्षा की मांग भी उठे। पाठक अखबार की कीमत और पत्रकारिता के श्रम का सम्मान करे। पत्रकार अपने पेशे की गरिमा बनाए रखें और सत्ता से निकटता को सफलता का पैमाना न बनने दें।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन गोदी मीडिया है। बड़ा सवाल यह है कि जब सच बोलने वाला पत्रकार अकेला पड़ जाएगा, तब उसके साथ कौन खड़ा होगा?
पत्रकारिता को बचाना है तो पत्रकार को बचाना होगा। और पत्रकार को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, समाज, पाठक, मीडिया संस्थानों और स्वयं पत्रकार बिरादरी की भी है।
स्वतंत्र पत्रकारिता केवल नारे से नहीं बचेगी; उसे निष्पक्षता, आर्थिक सम्मान और संकट के समय एकजुटता का सहारा देना होगा।

