नीतीश कुमार का समृद्धि यात्रा आज से ,सियासी संतुलन तक बिहार में नीतीश कुमार की ‘सेंचुरी’ की तैयारी
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है और इसके केंद्र में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। जो एक बार फिर राज्यव्यापी। यात्रा पर निकलने जा रहे हैं। 16 जनवरी से मुख्यमंत्री समृद्धि यात्रा की शुरुआत करने जा रहे हैं इस बार भी उनकी यात्रा पश्चिम चंपारण से शुरू हो सकती है। उनकी समृद्धि यात्रा केवल विकास कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सधे हुए राजनीतिक संदेश और शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बन चुकी है। 243 सदस्यीय विधानसभा में लगभग पूरा सदन उनके साथ खड़ा दिखाई दे रहा है, जो यह संकेत देता है कि नीतीश कुमार केवल सरकार नहीं चला रहे, बल्कि राजनीतिक दिशा भी तय कर रहे हैं।
नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जेडीयू को अब किसी की बैसाखी की जरूरत नहीं। संगठनात्मक स्तर पर जेडीयू को मजबूत करने की कवायद तेज है और इसका असर सहयोगी दलों पर भी दिखने लगा है। भाजपा को लेकर नीतीश का रुख अब पूरी तरह साफ है वे भाजपा को सत्ता की केंद्रीय भूमिका में नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका में देखना चाहते हैं। यही कारण है कि भाजपा की ओर से जेडीयू के कुछ नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिशों के बावजूद, नीतीश कुमार हमेशा “दो कदम आगे” नजर आ रहे हैं।
नीतीश कुमार ने बिना शोर किए यह संदेश दे दिया है कि सत्ता का वास्तविक नियंत्रण उन्हीं के हाथ में है और जब तक वे हैं, तब तक नीति भी वही तय करेंगे।
बिहार की राजनीति में इस समय जातीय समीकरण और भाजपा दोनों एक-दूसरे को रिप्लेस करने की तैयारी में दिखाई देते हैं। नीतीश कुमार इस टकराव को संतुलन में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। वे जानते हैं कि बिहार में स्थिरता तभी संभव है जब सत्ता मजबूत हो और विपक्ष भी स्पष्ट भूमिका में हो।
हालिया चूड़ा-दही कार्यक्रम इस बदलते सियासी परिदृश्य का अहम संकेत है। कांग्रेस के छह विधायक और लोजपा के कई विधायक की गैरमौजूदगी यह दर्शाती है कि राजनीतिक पंक्तियां खिसक रही हैं। यह महज संयोग नहीं, बल्कि आने वाले बड़े फेरबदल की आहट है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार “सेंचुरी” लगाने यानी निर्णायक बहुमत और पूर्ण नियंत्रण की ओर बढ़ रहे हैं। यदि ऐसा होता है, तो बिहार की राजनीति में बड़े उलट-पलट तय हैं।
इतिहास गवाह है कि बराबरी की ताकत वाले गठबंधन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होते। किसी न किसी को सत्ता से बाहर बैठना ही पड़ता है। देश के कई राज्यों में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां सत्ता-साझेदारी अंततः टकराव में बदली। बिहार भी इससे अछूता नहीं है।
दिल्ली की सत्ता बिहार पर नजरें गड़ाए बैठी है, जबकि पटना के सियासी केंद्र यह चाहते हैं कि बिहार को एक मजबूत और विश्वसनीय विपक्ष मिले। इस द्वंद्व के बीच नीतीश कुमार का संतुलन एक मिसाल बनकर उभर रहा है। फिलहाल स्थिति यह है कि पूरी विधानसभा का झुकाव नीतीश कुमार के पक्ष में दिखाई देता है, और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
बहरहाल समृद्धि यात्रा के बहाने नीतीश कुमार बिहार की राजनीति को एक नए संतुलन की ओर ले जा रहे हैं—जहां सत्ता स्पष्ट हो, विपक्ष मजबूत हो और निर्णय एक केंद्र से हों। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह ‘सेंचुरी रणनीति’ बिहार को स्थिरता देती है या एक नई राजनीतिक हलचल की शुरुआत करती है।

