राष्ट्र संवाद संवाददाता
जादूगोड़ा स्थित यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के अस्पताल में दवा आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि पिछले लगभग 10 महीनों से दवा वितरण का टेंडर पाने वाली आउटसोर्सिंग कंपनी केके फार्मा मरीजों को समय पर और पर्याप्त दवाएं उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रही है, जबकि प्रबंधन मूकदर्शक बना हुआ है।
नॉट अवेलेबल का खेल, मरीज परेशान
सूत्रों के अनुसार अस्पताल में नॉट अवेलेबल (दवा उपलब्ध नहीं) का प्रतिशत लगातार ऊंचा बना हुआ है। हालत यह है कि मरीजों को जिस दिन दवा की जरूरत होती है, उस दिन दवा नहीं मिलती उन्हें 2-3 दिन बाद या कभी-कभी एक सप्ताह बाद आने को कहा जाता है। इसके बावजूद भी दवा मिलने की कोई गारंटी नहीं होती।
रिटायर्ड कर्मियों की बढ़ी परेशानी
सबसे ज्यादा परेशानी रिटायर्ड कर्मियों को झेलनी पड़ रही है। दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों रुपये खर्च कर जादूगोड़ा अस्पताल पहुंचने वाले इन कर्मियों को दवा के लिए बार-बार चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कई बार तो वे बिना दवा लिए ही वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं।सूत्र यह भी बताते हैं कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं का रिकॉर्ड और वितरण व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। अगर मरीज दवा लिए बिना लौट जाता है, तो वह दवा आखिर जाती कहां है, यह जांच का विषय बन गया है।
भुगतान के बावजूद सेवा फेल
जानकारी के मुताबिक, यूसीआईएल प्रबंधन द्वारा क फार्मा को अब तक लगभग 2 करोड़ रुपये (जनवरी तक) का भुगतान किया जा चुका है। इसमें 20 लाख, 40 लाख, 1 करोड़, 5 लाख और 33 लाख जैसी बड़ी रकम शामिल है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर दवा आपूर्ति की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
सीएमडी और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यूसीआईएल के सीएमडी और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि उनकी नजरों के सामने यह अव्यवस्था लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
संयुक्त यूनियन ने उठाई ब्लैकलिस्टिंग की मांग
संयुक्त यूनियन ने केके फार्मा को तत्काल हटाने और ब्लैकलिस्ट करने की मांग की है। बावजूद इसके, प्रबंधन द्वारा इन मांगों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, जिससे मजदूरों में भारी आक्रोश है। मजदूरों और रिटायर्ड कर्मियों का कहना है कि यह मामला सीधे उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है, ऐसे में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यूसीआईएल प्रबंधन और सीएमडी इस गंभीर मुद्दे पर कब और क्या कार्रवाई करते हैं।

