चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर सीडीएस के बयान के मायने

देवानंद सिंह
भारत की सुरक्षा चुनौतियां आज जिस मोड़ पर खड़ी हैं, उसका स्वरूप पहले से कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है। गोरखपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान के बयान ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया कि भारत के सामने सबसे बड़ी और स्थायी चुनौती चीन के साथ सीमा विवाद है, जबकि पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध एक सतत दर्द की तरह भारत की सुरक्षा और स्थिरता को प्रभावित करता रहेगा।

जनरल चौहान ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत जैसे देशों के सामने आने वाली चुनौतियां अस्थायी नहीं होतीं, बल्कि वे समय-समय पर नए रूप और रणनीति के साथ सामने आती रहती हैं। उनका यह आकलन वस्तुतः भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौतियों की गहरी समझ को दर्शाता है। चाहे वह चीन के साथ हिमालयी सीमा पर तनातनी हो, पाकिस्तान का आतंकवाद प्रायोजित अभियान हो या फिर आधुनिक युग के नए मोर्चे—साइबर और अंतरिक्ष युद्ध भारत के लिए हर क्षेत्र में संतुलित और ठोस तैयारी आवश्यक हो चुकी है।

भारत-चीन संबंधों का इतिहास जटिल और विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक संपर्क जारी है, तो दूसरी ओर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव बार-बार उभरकर सामने आता है। गलवान घाटी की घटना हो या अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ की कोशिशें, इन सभी ने यह संकेत दिया कि सीमा विवाद केवल एक अनसुलझा मुद्दा नहीं है, बल्कि एक ऐसी चुनौती है, जो समय-समय पर भारत की सामरिक क्षमता और राजनीतिक धैर्य की परीक्षा लेती है।
हाल ही में तियानजिन में हुए शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात को द्विपक्षीय संबंधों में बर्फ़ पिघलने का संकेत माना जा रहा है, किंतु सीडीएस का यह कहना कि चीन भारत की सबसे बड़ी चुनौती है और आगे भी बनी रहेगी, यह बताता है कि कूटनीतिक गर्मजोशी और वास्तविक भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच एक बड़ा अंतर है।
दरअसल, चीन की रणनीति केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। वह दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के साथ गठजोड़, हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी बढ़ती सैन्य मौजूदगी और साइबर-स्पेस में लगातार आक्रामक रुख अपनाकर भारत की रणनीतिक परिधि को चुनौती देता है। भारत के लिए यह एक मल्टी-फ्रंट चुनौती है, जहां सैन्य, कूटनीतिक और तकनीकी सभी स्तरों पर सजगता अनिवार्य हो जाती है। भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध है। पाकिस्तान की यह नीति नई नहीं है। लंबे समय से वह हज़ार जख्म देकर भारत को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहा है। आतंकवाद को प्रायोजित करना, सीमा पार से घुसपैठ कराना, जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़काना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करना, पाकिस्तान की यही हाइब्रिड वॉर की रणनीति रही है।
जनरल चौहान ने कहा कि भारत की सहनशीलता की भी एक रेडलाइन है, और मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर इसी रेडलाइन का प्रतीक था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया, और इसमें भारतीय सेना को योजना बनाने से लेकर लक्ष्य तय करने तक पूरी स्वतंत्रता दी गई थी। खास बात यह थी कि यह केवल पारंपरिक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक मल्टी-डोमेन अभियान था, जिसमें थल, जल, नभ के साथ-साथ साइबर वॉरफेयर को भी शामिल किया गया।
यह संदेश स्पष्ट था कि भारत अब केवल प्रतिक्रियावादी नहीं रहेगा, बल्कि हमले की प्रकृति और गंभीरता के आधार पर जवाब देने के लिए पहले से तैयार है। यह रणनीति पाकिस्तान की प्रॉक्सी वॉर नीति पर सीधा दबाव बनाती है। दिलचस्प पहलू यह है कि भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का युद्ध केवल उसका निजी अभियान नहीं रह गया है। जुलाई में भारतीय सेना के डिप्टी चीफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने खुलासा किया था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने अपने उपग्रहों के जरिए भारतीय सैन्य तैनाती पर नज़र रखी और पाकिस्तान को वास्तविक समय (रियल-टाइम) में सूचना दी। इसे एक तरह से ड्यूल वॉरफेयर की स्थिति कहा जा सकता है, जहां पाकिस्तान की ओर से चीन लड़ रहा था।
यह संकेत बेहद महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान और चीन अब केवल सामरिक साझेदार ही नहीं, बल्कि सामरिक अभियानों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के सहयोगी बन चुके हैं। डिप्टी चीफ़ का यह भी कहना था कि चीन ने इस संघर्ष को एक लाइव लैब की तरह इस्तेमाल किया, ताकि वह पाकिस्तान को दिए गए अपने हथियारों और तकनीक की वास्तविक उपयोगिता का परीक्षण कर सके।
यानी भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान या केवल चीन नहीं है, बल्कि उनका संयुक्त मोर्चा है। यह मोर्चा भविष्य में किसी बड़े संघर्ष की आशंका को और गंभीर बनाता है। सीडीएस चौहान ने एक और अहम बात कही कि युद्ध के स्वरूप बदल चुके हैं। आज केवल परंपरागत सीमा युद्ध ही नहीं, बल्कि साइबर और अंतरिक्ष युद्ध भी वास्तविक खतरे बन चुके हैं। चीन और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं, ऐसे में भारत को अपने सैन्य अभियानों की योजना बनाते समय इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।
साइबर सुरक्षा आज केवल सरकारी दफ्तरों या वित्तीय संस्थाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। अंतरिक्ष तकनीक भी केवल वैज्ञानिक प्रगति का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह सैन्य शक्ति का नया आयाम है। उपग्रह इमेजरी, रियल-टाइम डेटा ट्रांसमिशन और स्पेस-आधारित हथियार प्रणाली भविष्य के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भारत ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन चीन की तुलना में अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
सीडीएस का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी बड़े बदलाव हो रहे हैं। हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की कि ऐसा लगता है हमने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है। यह टिप्पणी केवल अमेरिकी निराशा का संकेत नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों को भी उजागर करती है।
भारत, रूस और चीन की त्रिकोणीय समीकरण एक बार फिर चर्चा में है। शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन की बैठक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उपस्थिति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सक्रिय योगदान, यह बताता है कि भारत अपनी रणनीति को केवल अमेरिका या पश्चिमी देशों के साथ सीमित नहीं रखना चाहता।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भी इस संदर्भ में ट्रंप की आलोचना की है। उनका कहना था कि ट्रंप के मोदी के साथ निजी संबंध मजबूत थे, लेकिन अब वे खत्म हो चुके हैं। यह परिदृश्य अमेरिका-भारत संबंधों की मौजूदा जटिलता को भी दर्शाता है। भारत के सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि वह चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों का मुकाबला कैसे करेगा। प्रश्न यह भी है कि वह किस प्रकार वैश्विक परिदृश्य में अपनी स्थिति मजबूत करेगा। अमेरिका, रूस और चीन जैसे महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाना, क्वाड जैसी पहल में भागीदारी करना और ब्रिक्स व एससीओ जैसे मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना, यह सब भारत की रणनीतिक बहुआयामी कूटनीति का हिस्सा है।
भारत को इस बहुआयामी रणनीति के साथ ही अपनी रक्षा क्षमता का भी विस्तार करना होगा। ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया कि भारत अब सीमित सोच से बाहर निकल चुका है, लेकिन इसे स्थायी और प्रभावी नीति बनाने के लिए रक्षा उत्पादन, तकनीकी नवाचार और त्रि-सेनाओं के बीच सामंजस्य पर और ज़ोर देना होगा।
जनरल अनिल चौहान का बयान केवल एक सैन्य अधिकारी का आकलन नहीं है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के भविष्य का खाका है। चीन और पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियां क्षणिक नहीं हैं। वे लगातार बदलते रूप में सामने आएंगी।
साइबर और स्पेस वॉरफेयर जैसे नए मोर्चे इन चुनौतियों को और गंभीर बनाएंगे। भारत को यह समझना होगा कि 21वीं सदी का युद्ध केवल सीमा पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं है, बल्कि यह सूचना, तकनीक, अर्थव्यवस्था और कूटनीति सभी मोर्चों पर एक साथ लड़ा जाने वाला संघर्ष है। ऑपरेशन सिंदूर इस नई सोच की शुरुआत है, लेकिन इसे केवल एक ऑपरेशन तक सीमित नहीं रखना होगा। यह भारत की रेडलाइन और डिटरेंस कैपेसिटी का प्रतीक बन चुका है। अगर, भारत इस दिशा में लगातार आगे बढ़ा तो वह न केवल चीन-पाकिस्तान के संयुक्त मोर्चे का जवाब देने में सक्षम होगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा।

