मिशन नशामुक्त भारत @ 31 दिसंबर 2029 -नशा माफियाओं की उलटी गिनती शुरू! नेटवर्क होगा ध्वस्त ? एनडी पीएस एक्ट 1985 पीआईटीएनडीपीएस कानून 1988 और पीएमएलए कानून 2002 का होगा निर्णायक प्रहार! -हर पुलिस थाने की जवाबदेही तय हुई तो टूटेगी ड्रग माफियाओं की कमर? – समग्र व्यापक महा-विश्लेषण
गृहमंत्री की दोटूक ललकार : भारत का महालक्ष्य ! मिशन 31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त भारत ! -क्या बचेगी ड्रग माफियाओं की अवैध कमाई और सुरक्षित रहेगा भारत का भविष्य?
नशामुक्त भारत 2029:पुलिस थाने से अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क तक महाअभियान ! -नशे से राष्ट्रविरोधी फंडिंग तक निर्णायक वार! -पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या मिटेगा नशे का साम्राज्य ? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में नशे की समस्या अब केवल कानून-व्यवस्था या स्वास्थ्य का विषय नहीं रह गई है,बल्कि यह देश की युवा पीढ़ी के भविष्य,परिवारों की खुशहाली,आर्थिकउत्पादकता आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास से जुड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। मादक पदार्थों का अवैध कारोबार समाज की जड़ों को कमजोर करता है,अपराध जगत को आर्थिक ताकत देता है और कुछ मामलों में आतंकवाद तथा अन्य राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की फंडिंग का माध्यम भी बन सकता है।ऐसे में नशामुक्त भारत का लक्ष्य केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्किशासन-प्रशासन,पुलिस,न्यायपालिका,स्वास्थ्य तंत्र और समाज की सामूहिक परीक्षा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि दिनांक 21 अक्टूबर अक्टूबर 2026 क़ोराष्ट्रीय पुलिस स्मारक में पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृहमंत्री ने 31 दिसंबर 2029 तक भारत को नशामुक्त बनाने के लिए गृहमंत्री की दोटूक ललकार हुई देशभर के पुलिस बलों से मिलकर काम करने का आह्वान करते हुए बुधवार को कहा कि मादक पदार्थों का इस्तेमाल देश की भावी पीढ़ियों के लिए खतरा है और इससे राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल संगठनों को वित्तीय मदद भी मिलती है।अब इस संकल्प की परिस्थितियों में इस विषय पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत निर्धारित समयसीमा तक नशे के अवैध कारोबार पर ऐसा निर्णायक प्रहार कर पाएगा, जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सके? क्या पुलिस थानों से लेकर केंद्रीय एजेंसियों तक जवाबदेही सुनिश्चित करके नशे की सप्लाई चेन को तोड़ा जा सकता है? और क्या नशे की मांग,लत तथा पुनर्वास की समस्या का समाधान किए बिना वास्तविक नशामुक्ति संभव है? इन सवालों का उत्तर ही इस महाअभियान की वास्तविक सफलता तय करेगा।
साथियों बात अगर हम पुलिस स्मृति दिवस से राष्ट्रीय संकल्प तक: 31 दिसंबर 2029 की समय सीमा क्यों महत्वपूर्ण है? इसको समझने की करें तो 21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री ने देशभर के पुलिस बलों से नशे के विरुद्ध एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों का दुरुपयोग भावी पीढ़ियों को खोखला करता है, अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालता है और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल संगठनों को आर्थिक सहायता पहुंचा सकता है। सरकार ने देश को नशे की समस्या से मुक्त करने के लिए 31 दिसंबर 2029 की समय सीमा निर्धारित की है।गृह मंत्री ने शेष 2026 तथा 2027, 2028 और 2029 को इस लड़ाई के लिए समर्पित करने की बात कही। यह घोषणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संदेश पुलिस व्यवस्था के केंद्र तक जाता है। पुलिस स्मृति दिवस उन कर्मियों के बलिदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उसी मंच से नशे के विरुद्ध अभियान को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना पुलिस बलों के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी रखता है। अब आवश्यकता केवल छापेमारी, गिरफ्तारियों और जब्ती के आंकड़े बढ़ाने की नहीं, बल्कि नशे के कारोबार के पूरे नेटवर्क को तोड़ने,दोषियों को सजा दिलाने और नशे की गिरफ्त में आए लोगों को उपचार तथा पुनर्वास उपलब्ध कराने की है।सरकार पहले ही 2029 तक नशे के अवैध कारोबार को जड़ से उखाड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रणनीति और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय पर जोर दे चुकी है। इस लक्ष्य की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने मादक पदार्थ पकड़े गए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि अवैध आपूर्ति कितनी घटी, युवाओं को नशे से बचाने में कितनी सफलता मिली और प्रभावित परिवारों को सटीकता से कितनी सहायता पहुंची।
साथियों बात अगर हम पारंपरिक तस्करी से डिजिटल नेटवर्क तक: बदलते अपराध जगत की चुनौती को समझने की करें तो,पहले अवैध मादक पदार्थों का कारोबार मुख्यत
गुप्त संपर्कों व्यक्तिगत नेटवर्क सीमावर्ती तस्करी, अवैध भंडारण और स्थानीय वितरकों के माध्यम से चलता था।आज पारंपरिक तरीकों के साथ डिजिटल संचार, ऑनलाइन संपर्क,छद्म पहचान, इंटरनेट आधारित वित्तीय लेनदेन और अंतरराज्यीय नेटवर्क जैसी चुनौतियां भी जुड़ गई हैं। सोशल मीडिया तथा संदेश भेजने वाले मंचों का दुरुपयोग संपर्क स्थापित करने के लिए किया जा सकता है; डार्कनेट पर अवैध बाजार संचालित हो सकते हैं; और क्रिप्टोकरेंसी के लेनदेन की जांच अपराध से जुड़े वित्तीय संबंधों को उजागर करने में मदद कर सकती है। संयुक्त राष्ट्र की मादक पदार्थों पर रिपोर्टों में भी ऑनलाइन अवैध बाजारों और डिजिटल वित्तीय गतिविधियों के अध्ययन का महत्व सामने आया है।इसके साथ सिंथेटिक मादक पदार्थों और उन्हें बनाने में प्रयुक्त रसायनों की निगरानी भी बड़ी चुनौती है। अपराधी अपने तौर-तरीके बदलते हैं, इसलिए जांच एजेंसियों को तकनीकी दक्षता,डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय जांच और अंतरराज्यीय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करना होगा। केवल अंतिम विक्रेता को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं है; अवैध कारोबारके पीछे मौजूद आर्थिक लाभ, आपूर्ति नेटवर्क और संगठित अपराध की कड़ियों की जांच भीआवश्यक है।यही कारण है कि आधुनिक नशाविरोधी अभियान को परंपरागत पुलिसिंग तक सीमित नहीं रखा जा सकता। प्रशिक्षित साइबर जांच दल, वैज्ञानिक जांच, वैधानिक निगरानी और एजेंसियों के बीच सूचना-साझाकरण इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, डिजिटल तकनीक का उपयोग कानून के दायरे, निजता की सुरक्षा और न्यायसंगत जांच के अनुरूप होना चाहिए।
साथियों बात अगर हम भारत के कानूनी हथियार : कानून सख्त हैं, अब प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत को समझने की करें तो,भारत में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए पहले से कई महत्वपूर्ण कानून मौजूद हैं।सबसे प्रमुख है स्वापक औषधि और मनः प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 यानी एनडीपीएस अधिनियम। यह प्रतिबंधित पदार्थों के उत्पादन, कब्जे, बिक्री, खरीद, परिवहन और अन्य संबंधित गतिविधियों को नियंत्रित करता है तथाअपराध की प्रकृति और मात्रा के अनुसार कठोर दंड का प्रावधान करता है।वाणिज्यिक मात्रा से जुड़े अनेक गंभीर अपराधों में 10 से 20 वर्ष तक का कठोर कारावास और जुर्माना हो सकता है। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में पूर्व दोषसिद्धि के बाद दोबारा गंभीर अपराध करने पर मृत्युदंड का वैधानिक प्रावधान भी है, लेकिन यह प्रत्येक नशा तस्करी के मामले में लागू नहीं होता।दूसरा महत्वपूर्ण कानूनहैपीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988, जिसका उद्देश्य अवैध मादक पदार्थों के कारोबार को रोकने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत निवारक निरोध की व्यवस्था करना है। इसकी अवधि संबंधित वैधानिक प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों के अनुसार तय होती है। तीसरा, धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 यानी पीएमएलए,उनमामलों में महत्वपूर्ण हो सकता है जहां अपराध से अर्जित धनको वैध बनाने की गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं।इन कानूनों के अतिरिक्त पुलिस,नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, सीमा सुरक्षा एजेंसियों, औषधि नियंत्रण विभाग और वित्तीय जांच एजेंसियों के बीच तालमेल आवश्यक है। डिजिटल साक्ष्यों और अवैध कमाई के स्रोतों की जांच भी मजबूत करनी होगी। विशेष अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा,गुणवत्तापूर्ण अभियोजन और साक्ष्यों की विश्वसनीयता बढ़ाना भी जरूरी है। केवल कानून की कठोरता नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और दोषसिद्धि की प्रभावशीलता अपराधियों पर सटीकता से वास्तविक दबाव बनाती है।
साथियों बात अगर हम एनसीओआरडी, निदान और मानस:समन्वय से जन भागीदारी तक को समझने कीकरें तो सरकार ने नशा विरोधी प्रयासों को समन्वित बनाने के लिए विभिन्न संस्थागत और डिजिटल व्यवस्थाएं विकसित की हैं। नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी एनसीओआरडी का उद्देश्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना है। निदान पोर्टल का उपयोग मादक पदार्थों से जुड़े अपराधियों की जानकारी साझा करने और जांच एजेंसियों के बीच सूचना- सहयोग बढ़ाने के लिए किया जाता है।आम नागरिकों की भागीदारी के लिए मानस हेल्पलाइन 1933 भी उपलब्ध है। भारत सरकार के अनुसार, इसे 18 जुलाई 2024 को शुरू किया गया था। इसके माध्यम से नागरिक मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध खेती और संबंधित गतिविधियों की सूचना दे सकते हैं। यह मंच परामर्श तथा पुनर्वास संबंधी सहायता तक पहुंच बनाने में भी मदद करता है। इन व्यवस्थाओं की वास्तविक उपयोगिता तभी सिद्ध होगी, जब प्राप्त शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो, सूचनादाताओं की गोपनीयता सुरक्षित रहे और एजेंसियां एक-दूसरे के साथ आवश्यक जानकारी साझा करें। जिलों में नशे की समस्या का नियमित आकलन संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और कार्रवाई के परिणामों की समीक्षा भी जरूरीहै।
साथियों बात अगर हम क्या छह महीने में अवैध नशे का कारोबार समाप्त हो सकता है? इसको समझने की करें तो यह मानना उचित है कि मजबूत इच्छाशक्ति,ईमानदार पुलिसिंग,केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बेहतर समन्वय तथा भ्रष्टाचार पर प्रभावी कार्रवाई से अवैध आपूर्ति नेटवर्क को काफी हद तक कमजोर किया जा सकता है। किसी जिले में संगठित तस्करी के विरुद्ध छह महीने का केंद्रित अभियान महत्वपूर्ण परिणाम दे सकता है। लेकिन पूरे देश में छह महीने के भीतर अवैध कारोबार को शून्य पर पहुंचा देना एक ऐसा दावा होगा, जिसके लिए ठोस प्रमाण और वास्तविक परिस्थितियों का आकलन आवश्यक है।इसका कारण स्पष्ट है: नशे की समस्या में आपूर्ति के साथ मांग भी शामिल है। जब तक नशे की लत से जूझ रहे लोगों को उपचार, परामर्श, परिवार का सहयोग और पुनर्वास नहीं मिलेगा,तब तक अवैध बाजार दोबारा उभरने का जोखिम बना रहेगा। इसलिए रोकथाम, उपचार और कानून का क्रियान्वयन एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए।यदि प्रत्येक पुलिस थाने के क्षेत्र में अवैध बिक्री की शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई हो, मेडिकल स्टोरों की नियमानुसार जांच हो, युवाओं को जागरूक किया जाए और नशे की लत से प्रभावित लोगों को सहायता मिले,तो 2028 तक उल्लेखनीय प्रगति की संभावना मजबूत हो सकती है। परंतु समयसीमा से पहले पूर्ण सफलता का दावा करने के बजाय पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र मूल्यांकन से प्रगति मापना अधिक विश्वसनीय होगा। सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि गृह मंत्री ने 21 अक्टूबर 2026 को अपनेसंबोधन में कहा कि देश ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद की चुनौती से मुक्ति हासिल की।
साथियों बात अगर हम क्या यह पंजाब चुनाव 2027 से जुड़ी राजनीतिक रणनीति है? इसको समझने की करें तो यह प्रश्न भी सार्वजनिक विमर्श में उठ सकता है कि नशामुक्त भारत की समय सीमा का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा, विशेषकर पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले। पंजाब में नशे का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। लेकिन केवल समय सीमा और चुनाव की निकटता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि राष्ट्रीय अभियान का उद्देश्य केवल चुनावी लाभ है। इसकी वास्तविक मंशा और प्रभाव का मूल्यांकन ठोस परिणामों से होना चाहिए। क्या अवैध कारोबार के बड़े नेटवर्क टूटते हैं? क्या युवाओं तक नशे की पहुंच घटती है? क्या नशे के विरुद्ध आवाज उठाने वालों की सुरक्षा बढ़ती है? क्या दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई होती है? क्या नशे की लत से प्रभावित लोगों को उपचार उपलब्ध होता है? इन सवालों के जवाब किसी भी राजनीतिक दावे से अधिक महत्वपूर्ण होंगे।लोकतंत्र में सरकार की घोषणाओं पर सवाल उठाना जनता का अधिकार है, लेकिन अंतिम निर्णय तथ्यों, आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों के आधार पर होना चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 31 दिसंबर 2029 सिर्फ समयसीमा नहीं,भावी पीढ़ी से किया गया वादा, भारत के सामने नशामुक्ति का लक्ष्य कठिन अवश्य है, लेकिन इसे असंभव मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा।यदि केंद्र सरकार,राज्य सरकारें,पुलिस,जांच एजेंसियां न्यायपालिका स्वास्थ्य विभाग, शैक्षणिक संस्थान और नागरिक समाज एक साझा रणनीति के तहत काम करें,तो देश नशे के अवैध कारोबार और उसके सामाजिक दुष्परिणामों को गंभीर रूप से कम कर सकता है।इसके लिए पुलिस थानों में जवाबदेही,भ्रष्टाचार केआरोपों की निष्पक्ष जांच, डिजिटल अपराधों की पहचान,अवैध कमाई पर कार्रवाई,तेज न्यायिक प्रक्रिया और नशे की लत से प्रभावित लोगों के पुनर्वास को समान महत्व देना होगा।नशे के विरुद्ध आवाज उठाने वाले नागरिकों की सुरक्षा भी इस अभियान का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए।भारत की प्राचीन सांस्कृतिक कल्पना में कलियुग से सतयुग की ओर बढ़ने का अर्थअन्याय लोभ और बुराइयों पर सदाचार, सेवा और सत्य की विजय है।नशामुक्त भारत केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के प्रति पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी है।
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*

