लेखक: देवानंद सिंह
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचानी जाने वाली पत्रकारिता की गरिमा आज एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। सोशल मीडिया की लोकप्रियता की अंधी दौड़ में सच, निष्पक्षता और मर्यादा जैसे मूल मूल्य हाशिये पर चले गए हैं। हर हाथ में स्मार्टफोन और हर पल कैमरे की उपलब्धता ने भले ही अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण किया हो, लेकिन इसने पेशेवर पत्रकारिता और सनसनी फैलाने वाले कंटेंट के बीच की लक्ष्मण रेखा को भी मिटा दिया है।
पत्रकारिता की गरिमा पर मंडराता संकट
आज किसी घटनास्थल पर पहुंचते ही कैमरा चालू कर देना, बिना तथ्यों की पुष्टि किए वीडियो प्रसारित करना और चंद लाइक्स, व्यूज तथा फॉलोअर्स के लिए पत्रकारीय मर्यादाओं को ताक पर रख देना एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुकी है। यह चलन न केवल खबर की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, बल्कि जनमानस में मीडिया के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है। देवानंद सिंह का मानना है कि सवाल सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि उसके नाम पर विश्वसनीयता से खिलवाड़ करने का है।
पत्रकारिता तथ्यों की जांच, दोनों पक्षों का दृष्टिकोण, प्रमाणों की पुष्टि और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देने से बनती है। केवल माइक, कैमरा या प्रेस कार्ड किसी को विश्वसनीय पत्रकार नहीं बना देता। पत्रकार की असली पहचान उसके आचरण, मेहनत, निष्पक्षता और सत्य के प्रति निष्ठा से होती है। जब यह पहचान धुंधली पड़ती है, तो पूरे पेशे की साख दांव पर लग जाती है।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम जिम्मेदारी
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है और हर नागरिक को सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। अधूरी जानकारी प्रसारित करना, अपुष्ट आरोपों को खबर बना देना, पीड़ितों की निजता का हनन करना और जांच से पहले किसी को अपराधी घोषित कर देना गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार तो है ही, यह किसी की जिंदगी और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकता है।
नागरिक पत्रकारिता की अपनी उपयोगिता है, परन्तु पेशेवर पत्रकारिता और सामान्य डिजिटल सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना अनिवार्य हो गया है। किसी भी नियमन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत होनी चाहिए ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न हो। इस विषय पर वैश्विक मानकों को समझने के लिए यूनेस्को की प्रेस स्वतंत्रता गाइडलाइंस देखी जा सकती हैं।
वास्तविक पत्रकारों की साख और सुरक्षा दांव पर
इस अराजकता का सबसे बड़ा खामियाजा उन पत्रकारों को भुगतना पड़ता है जो वर्षों से ईमानदारी के साथ समाज की समस्याओं को सामने लाते रहे हैं। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही, मजदूरों के शोषण और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता ही उनकी पूंजी है। जब फर्जी पहचान और भ्रामक वीडियो के कारण पूरे पेशे पर सवाल उठते हैं, तो इन वास्तविक पत्रकारों की मेहनत भी संदेह के घेरे में आ जाती है।
घटनास्थलों पर अनियंत्रित भीड़, संवेदनशील मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप और खबर के नाम पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति पत्रकारों की शारीरिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती है। पत्रकारिता को भीड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि भीड़ के बीच विवेक की आवाज बनना चाहिए।
पत्रकार संगठनों की भूमिका और आगे का रास्ता
यह समय पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों और मीडिया संस्थानों के गहन आत्ममंथन का है। केवल सदस्यता बढ़ाना, समारोह आयोजित करना और प्रेस विज्ञप्तियां जारी करना पर्याप्त नहीं है। संगठनों को पत्रकारिता के न्यूनतम नैतिक मानदंड तय करने, नियमित प्रशिक्षण आयोजित करने, गलत सूचना के विरुद्ध जागरूकता फैलाने और वास्तविक पत्रकारों के अधिकारों व सुरक्षा के लिए ठोस पहल करनी होगी।
बहरहाल, पत्रकारिता की गरिमा बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी संगठन की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो स्वयं को पत्रकार कहता है। खबर की पहली शर्त तेजी नहीं, सच्चाई है; सबसे बड़ी ताकत शोर नहीं, विश्वसनीयता है। अब पत्रकार संगठनों को तय करना होगा कि वे इस चुनौती पर चुप रहेंगे या पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आएंगे। क्योंकि यदि आज व्यूज और वायरल होने की संस्कृति के सामने सत्य, संवेदना और मर्यादा हार गए, तो नुकसान केवल पत्रकारिता का नहीं, पूरे समाज का होगा।

