लेखक: ललित गर्ग
सर्दियों ने अभी पूरी तरह दस्तक भी नहीं दी है कि देश के अनेक शहरों की हवा में प्रदूषण की चुनौती विकराल रूप धारण करती जा रही है। दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता का तेजी से बिगड़ना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह संकट अब केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने एक गंभीर आपातकाल बन चुका है।
क्यों गहराती जा रही है प्रदूषण की चुनौती
वायु प्रदूषण किसी एक कारण या किसी एक राज्य की देन नहीं है। इसके प्रमुख स्रोतों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, सड़कों पर जमा मिट्टी, कचरा और जैविक पदार्थ जलाना, ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन तथा कृषि अवशेषों का दहन शामिल हैं। सर्दियों में तापमान गिरने, हवा की गति कम होने और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के निकट जमा हो जाते हैं, जिससे प्रभाव अधिक गंभीर हो जाता है। मौसम समस्या को बढ़ाता अवश्य है, लेकिन मूल कारण मुख्यतः मानवीय गतिविधियां और उनका अपर्याप्त नियमन हैं।
दिल्ली-एनसीआर: साझा वायु क्षेत्र की त्रासदी
दिल्ली-एनसीआर की स्थिति इस संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। दिल्ली के साथ गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के अनेक शहर एक-दूसरे से जुड़े वायु क्षेत्र का हिस्सा हैं। हवा किसी प्रशासनिक सीमा को नहीं मानती, वह प्रदूषण को भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वायु प्रदूषण प्रतिवर्ष लाखों असमय मौतों का कारण बनता है। इसलिए समाधान भी क्षेत्रीय सहयोग, साझा जवाबदेही और समन्वित कार्ययोजना पर आधारित होना चाहिए। केवल दिल्ली की सीमाओं के भीतर उपाय करने से स्थायी समाधान संभव नहीं है।
स्वास्थ्य पर भयावह प्रभाव: पीएम 2.5 का कहर
वायु प्रदूषण का सबसे भयावह पक्ष उसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। विशेष रूप से पीएम 2.5 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्तप्रवाह तक प्रवेश कर सकते हैं। इनके लंबे समय तक संपर्क में रहने से हृदय एवं फेफड़ों संबंधी बीमारियों, स्ट्रोक और समयपूर्व मृत्यु का जोखिम बढ़ता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर होता है। यह संकट केवल सांस के मरीजों तक सीमित नहीं है; स्वस्थ दिखाई देने वाले लोगों की कार्यक्षमता, एकाग्रता और जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
ग्रैप और आपातकालीन उपाय: क्रियान्वयन ही कुंजी
प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) लागू करना आवश्यक है। इसके अंतर्गत प्रदूषण की गंभीरता के अनुसार निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध, वाहनों और उद्योगों पर नियंत्रण तथा अन्य आपातकालीन कदम उठाए जाते हैं। लेकिन इन उपायों की सफलता केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी से सुनिश्चित होती है। यदि प्रतिबंधों का उल्लंघन होता रहे, निर्माण स्थलों पर धूल उड़ती रहे और कचरा खुले में जलता रहे, तो सरकारी घोषणाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकतीं। सरकार को प्रदूषण के चरम पर पहुंचने की प्रतीक्षा करने के बजाय सितंबर-अक्टूबर से ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
दीर्घकालिक रणनीति: स्वच्छ ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन
सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देना, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करना और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। कृषि क्षेत्र में पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों पर जुर्माना लगाने भर से नहीं होगा। उन्हें फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए सस्ती मशीनें, तकनीकी सहायता, आर्थिक प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर उपयोग की सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। किसानों को समस्या का भागीदार नहीं, समाधान का सहयोगी बनाना होगा। वैश्विक स्वास्थ्य मानक अपनाने से स्थिति में सुधार संभव है।
नागरिक भागीदारी और जनजागरूकता की जरूरत
प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। नागरिकों को निजी वाहनों का अनावश्यक उपयोग कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, कचरा और पत्तियां न जलाने तथा ऊर्जा की बचत करने जैसे कदम उठाने होंगे। पर्यावरण संबंधी नियमों के उल्लंघन की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना और स्थानीय स्तर पर स्वच्छता एवं हरित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों में भाग लेना भी आवश्यक है। मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को जनजागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि स्वच्छ हवा का महत्व केवल प्रदूषण के चरम पर ही याद न आए।
बीजिंग का सबक और आगे की राह
चीन के बीजिंग जैसे शहरों में प्रदूषण घटाने के अनुभव यह बताते हैं कि निरंतर नीतिगत प्रयास, स्वच्छ परिवहन, औद्योगिक नियंत्रण और प्रभावी निगरानी से उल्लेखनीय सुधार संभव है। भारत को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे उपायों को दृढ़ता से लागू करना होगा। हर साल सर्दियों में प्रदूषण से जूझना और फिर मौसम बदलने पर समस्या को भूल जाना किसी भी संवेदनशील समाज की नियति नहीं हो सकती। स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

