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    Home » मणिपुर हिंसा: तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं थम रही हिंसा, अब तक सौ से ज्यादा लोग मारे गये
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    मणिपुर हिंसा: तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं थम रही हिंसा, अब तक सौ से ज्यादा लोग मारे गये

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 19, 2023No Comments4 Mins Read
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    मणिपुर हिंसा: तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं थम रही हिंसा, अब तक सौ से ज्यादा लोग मारे गये
    इंफाल। केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद मणिपुर में हिंसा पर लगाम नहीं है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के दौरे और चेतावनियों के बाद राज्य में कुछ दिनों के लिए हिंसा थम गई थी लेकिन अब यहां फिर से माहौल में तनाव पसरा हुआ है. पिछले कुछ दिनों में कई बड़ी वारदातें सामने आई हैं. विद्रोहियों के निशाने पर सरकार है. सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों यहां हालात सामान्य नहीं हो रहे हैं. कहीं इसके पीछे चीन तो नहीं?

     

     

     

    हिंसा की वारदात को अंजाम देने वाले उपद्रवी समूह केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री आर के रंजन सिंह और मणिपुर की एकमात्र महिला मंत्री नेमचा किपगेन के आवास पर तोड़ फोड़ और आगजनी कर चुके हैं. इसके बाद हालात और भी तनावपूर्ण हो चुके हैं. संयोगवश आरके रंजन सिंह के घर जिस वक्त हमला हुआ, उस वक्त वो घर पर नहीं थे. करीब एक हजार से अधिक लोगों की भीड़ ने वहां आग लगा दी.हालात को देखते हुए पूरे राज्य में इंटरनेट सेवा पर रोक है. गुरुवार से पहले राज्य में मंगलवार को एक झड़प में एक महिला समेत नौ लोगों की मौत हो गई थी. उपद्रवियों ने ये हमला इंफाल पूर्व में खुंद्राकपम विधानसभा क्षेत्र के खमेनलोक इलाके में किया था. पुलिस के मुताबिक भारी हथियारों से लैस विद्रोहियों ने खमेनलोक गांव पर हमला किया था. जिसमें 25 लोग घायल हो गये थे. मंगलवार और गुरुवार के हमलों के बाद पुलिस ने उपद्रवियों के बारे में जो इनपुट दिया है उसने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है. मणिपुर के विद्रोही समूहों के पास भारी मात्रा हथियार देखे जा रहे हैं. सवाल ये उठ रहे हैं कि इनके पास इतने हथियार आखिर कहां से आ रहे हैं? कौन है जो इनको बैकअप दे रहा है? क्योंकि बिना बैकअप के हिंसक आंदोलन इतने दिनों तक नहीं खिंच सकता.

     

     

     

    मणिपुर में बेलगाम हिंसा-आजगनी की वजह को समझने के लिए राज्य के बॉर्डर के हालात को समझना जरूरी है. कई लोगों ने हमले और हिंसा को लेकर म्यांमार स्थित विद्रोही शिविरों को जिम्मेदार ठहराया है. मणिपुर की सीमा म्यांंमार से मिलती है. बताया ये जा रहा है कि म्यांमार के रास्ते मणिपुर में हिसा फैलाई जा रही है. मणिपुरी विद्रोही इस पार हिंसा फैलाते हैं और म्यांमार सीमा के पार स्थित शिविरों में छुप जाते हैं.

    रक्षा सूत्रों के मुताबिक म्यांमार बॉ़र्डर की संवेदनशीलता को देखते हुए बॉर्डर पर सुरक्षा चौकस कर दी गई है. पूरे क्षेत्र की हवाई निगरानी की जा रही है. रक्षा विभाग इस बात पर भी नजर बनाये हुए है कि म्यांमार के रास्ते कहीं चीन तो नहीं अपनी चालबाजी को अंजाम दे रहा है? सुरक्षा एजेंसियां चौकस हैं. मानव रहित हवाई वाहन (UAV) और हेलीकॉप्टरों को न केवल भीतरी इलाकों में बल्कि भारत-म्यांमार सीमा पर भी निगरानी के लिए कार्रवाई में लगाया गया है. यह इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि मणिपुरी विद्रोही समूह म्यांमार सीमा के पार शिविरों में चले जा रहे हैं. चीन इस रास्ते हिंसा को हवा देता रहा है.

     

     

    फिलहाल म्यांमार से चीन के अच्छे संबंध हैं. दोनों देश 2129 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं. इनके बीच गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. म्यांमार चीन की विस्तारवादी मंशा को समझता है लेकिन संबंधों को सामान्य बनाये रखने के लिए भी वह बाध्य है. म्यांमार की बाध्यता को चीन भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता है.अब म्यांमार ने बंगाल की खाड़ी में कोको आइलैंड में निगरानी केंद्र बनाने के लिए चीन को परमीशन दे दी है. इसका सीधा मतलब भारत से है. चीन यहां के जरिए भारत के बालासोर टेस्ट रेंज पर निगाह रख सकता है. जानकारी के मुताबिक म्यांमार में चीन का भारी दबदबा है. पूरे हालात पर भारत की नजर है. मणिपुर के हालात को देखते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी 29 मई को राज्य का दौरा किया था. और घोषणा की थी कि राज्य में कुकी और मैती समुदायों के बीच के सभी मुद्दों के हल करने के लिए एक शांति समिति का गठन किया जाएगा. उन्होंने हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात भी कही थी. लेकिन हालात बताते हैं इसका कोई असर नहीं हो सका.

    कुकी और नागा राज्य की आबादी में 40 फीसदी हैं. उनका कहना है कि मैती समुदाय पहले से ही समृद्ध है, इसलिए उन्हें एसटी कटेगरी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. वहीं पूरे हालात को लेकर घाटियों में रहने वाले मैती समुदाय भी नाराज हैं क्योंकि उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में बसने या जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है. जबकि आदिवासी घाटियों में जमीन खरीद सकते हैं.

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