संतोष गंगवार के रास्ते साधेगी महतो वोटर्स
रघुबर सहारे छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में सत्ता सुख भोग रही भाजपा
कुलविंदर
झारखंड में यह कहावत राजनीतिक मायने में 16 आने सच है कि महतो कुर्मी) माझी जिसके साथ, सत्ता की चाबी उसके हाथ।
महतो अर्थात कर्मी और मांझी अर्थात संथाल वोट।
अब महत्वपूर्ण कुर्मी वोट को लुभाने के लिए भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व ने बड़ा खेल खेल दिया है। उत्तर प्रदेश बरेली से आठ बार सांसद रहे संतोष गंगवार को राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंप दी है। उत्तर प्रदेश में कुर्मी नेताओं में संतोष गंगवार बड़ा नाम रहा है।
संतोष गंगवार के माध्यम से कुर्मी मतदाताओं को यह संदेश दिया जा रहा है कि उनके हित भाजपा में ही सधेंगे। केंद्र के पास महतो कुर्मी को आदिवासी दर्जा देने का संवैधानिक अधिकार है और शायद वह हथियार चल दिया तो फिर शत प्रतिशत वोट उसके पाले में जाएं इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
महतो वोट का साथ मिलने के कारण ही संथाल जनजाति वर्ग के हेमंत सोरेन सत्ता सुख भोग रहे हैं और झारखंड मुक्ति मोर्चा का मजबूत आधार और समीकरण स्थापना काल से ही है।
पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो और टेकलाल महतो जैसे दिग्गज कुर्मी नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के समक्ष बड़ी चुनौती नहीं बन पाए। कुर्मियों के नाम पर सुदेश महतो बड़ा कद है परंतु झारखंड मुक्ति मोर्चा से वह भी एक बार मात खा चुके हैं।
भाजपा और आजसू पार्टी झारखंड राज्य में एक दूसरे का पर्याय बन चुकी है लेकिन यह झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और वाम दल की संयुक्त ताकत के सामने नहीं ठहरते हैं भले ही लोकसभा चुनाव में अलग समीकरण काम करता है और भाजपा बढ़त ले जाती है।
झारखण्ड में युवा कुर्मी नेता जयराम महतो धूमकेतु की तरह उभरे हैं। गत लोक सभा चुनाव में अपनी ताकत दिखा चुके हैं भले ही सीट नहीं जीत पाए हो।
झारखंड का युवा वर्ग उनके नाम से झूम रहा है और दिल्ली भी उनकी ताकत को समझ चुका है।
यहां भाजपा समझ रही है कि बिना महतो वोट को पाले में लाए उसे सत्ता की चाबी मिलने वाली नहीं है। कुर्मी जनता पर सुदेश महतो, शैलेंद्र महतो, आभा महतो,जयराम महतो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का प्रभाव है। नीतीश कुमार आज भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं और ऐसे में कोयरी और कुर्मी मत का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जाएगा इसमें कोई संदेह नहीं है। कुर्मी की आबादी झारखंड में 20% है। गत लोकसभा चुनाव में भी दिख चुका है कि जयराम महतो और झारखंड मुक्ति मोर्चा की लाख कोशिश के बावजूद भारतीय जनता पार्टी आजसू पार्टी गठबन्धन हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, जमशेदपुर और रांची लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहा है। पूरे झारखंड से एकमात्र कुर्मी विद्युतवरण महतो जमशेदपुर से सांसद हैं।
जय राम महतो की जेबीकेएसएस (झारखंडी भाषा खतियान संघर्ष समिति) ने साफ कर दिया है कि वह 55 विधानसभा सीटों पर लड़ेंगे। यदि ऐसा हुआ तो निश्चय ही जयराम महतो झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा का खेल बिगाड़ देंगे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है की जयराम महतो दिल्ली में बड़े नेताओं से मिल चुके हैं लेकिन वह इसे सार्वजनिक करने से बच रहे हैं।
जयराम महतो की फैक्टर की काट के लिए बीजेपी ने राज्यपाल के रूप में संतोष गंगवार की नियुक्ति कर दी है। हो सकता है इसके बाद जयराम महतो के साथ भाजपा की निर्णायक बात हो ।अगर वार्ता असफल भी हो जाती है तो राजनीतिक रूप से होने वाला नुकसान कम होगा।
उड़ीसा के राज्यपाल के रूप में रघुवर दास की नियुक्ति कर बीजेपी छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में लाभ ले चुकी है। ठीक छत्तीसगढ़ चुनाव से पहले रघुवर दास अपने पैतृक गांव पहुंचे और उन्होंने भावनात्मक रूप से अपना संबोधन दिया। कैसे साधारण मजदूर को भाजपा ने विधायक मंत्री मुख्यमंत्री और राज्यपाल बनाया है। उनके इस भावनात्मक संबोधन ने साहू बनिया जातियों पर इस तरह से काम किया कि जिस छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दोबारा सरकार बनने का दावा हर सर्वे में किया जा रहा था, मां भाजपा को आसानी से बहुमत मिल गया और वहां सरकार बन गई।
उड़ीसा में राज्यपाल बनते ही रघुवर दास सक्रिय हुए और उनकी सक्रियता का लाभ भाजपा को मिल गया। यह अलग बात है कि भाजपा ने ओड़िया अस्मिता का कार्ड खेला और नवीन पटनायक के बीजू जनता दल को उसी की भाषा में जवाब दे दिया और सरकार बना ली।
आज के राजनीतिक दौर में भाजपा जानती है कि नियुक्ति के आधार पर कैसे मतदाताओं को लुभाया जा सकता है। रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया और गुजरात के आदिवासी इलाकों में बीजेपी ने जीत दर्ज कर ली। झारखंड के राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया गया और उत्तर पूर्व के साथ ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भाजपा क्लिक कर गई। अब देखना है कि कुर्मी जाति के पूर्व सांसद संतोष गंगवार को झारखंड का राज्यपाल बनाकर बीजेपी कितना लाभ ले पाती है।

