झारखंड की यात्रा के 25 वर्ष
प्रशासनिक स्थिरता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन से पूरा होगा आंदोलनकारियों का सपना
राष्ट्र संवाद डेस्क
झारखंड की राजनीतिक यात्रा मात्र एक राज्य की प्रशासनिक कहानी नहीं, बल्कि आकांक्षाओं, संघर्षों, अस्थिरता, उम्मीद और अंधेरों से गुजरती वह गाथा है जिसने पूरे पूर्वी भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा को गहराई से प्रभावित किया। 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया यह राज्य आज पच्चीस वर्ष का युवा हो चुका है। इन 25 वर्षों में झारखंड ने 13 सरकारें देखीं, कभी गठबंधनों के भरोसे लड़खड़ाता, कभी बहुमत के दम पर तेजी से भागता, तो कभी अंतर्कलह और राजनीतिक सौदेबाजी के दलदल में फंसता। इस पूरे सफर में कई ऐसे प्रसंग रहे जो खुले मंचों पर नहीं बोले गए, लेकिन जिन्होंने राज्य की दिशा गढ़ी या बिगाड़ी।
इस पच्चीस साल की यात्रा की परतें तब खुलती हैं, जब इस दौर के प्रमुख नेताओं की अनकही बातें सामने आती हैं। पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से लेकर रघुवर दास, इंदर सिंह नामधारी, और महिलाओं की नई राजनीतिक धुरी के रूप में उभरीं कल्पना सोरेन तक। इनके अनुभव झारखंड की राजनीति के उतार-चढ़ाव का जीवंत दस्तावेज हैं।
झारखंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी आज भी उस उथल-पुथल को याद करते हैं, जिसने नवोदित राज्य की स्थिरता को हिला दिया था। 2001–02 में डोमिसाइल नीति के मुद्दे पर हुआ तीखा आंदोलन झारखंड की राजनीति का पहला बड़ा संकट बना। मरांडी कहते हैं कि मैं इसे भूल नहीं मानता, लेकिन आंदोलन को नियंत्रित नहीं कर पाना निश्चित ही हमारी विफलता थी।
वह स्पष्ट करते हैं कि स्थानीय नीति कोई नई अवधारणा नहीं थी, इसका प्रारूप तो बिहार के दिनों में ही जगन्नाथ मिश्र सरकार ने तय कर दिया था। उनकी सरकार ने सिर्फ उसे अंगीकार किया। फिर भी, उस समय बनी परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर चली गईं, और इसका परिणाम था सत्ता में उनकी कमजोरी तथा राजनीतिक हमलों की बाढ़। मरांडी की इस स्वीकारोक्ति में शासन की जटिलता और झारखंड की सामाजिक विविधता को समझने का वह संघर्ष झलकता है, जिससे नई बनी सरकारें अक्सर दो-चार हुईं।
2014 में जब झारखंड पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार के दौर में दाखिल हुआ, तब उम्मीदें भी बड़ी थीं और चुनौतियां भी। रघुवर दास इस युग के ऐसे नेता रहे, जिन्होंने विकास को गति देने की कोशिशों में कई साहसिक कदम उठाए, इनमें सबसे विवादास्पद मुद्दा था, सीएनटी–एसपीटी कानून में संशोधन।
दास का दावा है कि यह संशोधन विकास प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए था, न कि आदिवासी जमीनों पर किसी तरह का अतिक्रमण करने का प्रयास। उनकी बातों में एक तरह की पीड़ा भी झलकती हैं। वह कहते हैं कि मैं जनता दरबार में गरीब आदिवासियों की समस्याएं सुनता था, सड़क गुजर गई, मुआवजा नहीं मिला, सरकारी योजना की वजह से जमीन चली गई, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
ह तर्क देते हैं कि ग्रामसभा की अनुमति केवल उन्हीं मामलों में हटाई गई थी, जहां जमीन सिंचाई, ग्रिड, या आवश्यक सरकारी योजनाओं के लिए चाहिए थी। टीएसी (ट्राइबल एडवाइजरी कमिटी) से भी यह प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन विपक्षी राजनीति और सामाजिक संगठनों ने इसे आदिवासी विरोधी कदम करार दिया, और इस नैरेटिव ने राजनीतिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया।
झारखंड की राजनीति में जनभावना का यह उतार-चढ़ाव लगातार यह सिद्ध करता रहा है कि यहां विकास और परंपरा के बीच संतुलन साधना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष और गठबंधन राजनीति के जानकार इंदर सिंह नामधारी झारखंड की शुरुआती अस्थिरता के केंद्रीय पात्रों में रहे हैं। बाबूलाल मरांडी की सरकार गिरने के संदिग्ध आरोपों पर वह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि मैंने कभी कोई प्लॉट नहीं बनाया था। न किसी विधायक से बात की थी। विधायकों ने अचानक आकर कहा कि वे मेरे नेतृत्व में सरकार बनाना चाहते हैं।
नामधारी बताते हैं कि उन्हें 42–43 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, लेकिन राज्यपाल ने भाजपा के दबाव में उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। यह बयान झारखंड की राजनीति में पर्दे के पीछे होने वाले शक्ति-समूहों के प्रभाव को सामने लाता है, जो अक्सर सत्ता परिवर्तन के असल निर्णायक रहे। नामधारी यह भी मानते हैं कि मरांडी अच्छी सोच लेकर चले थे, लेकिन भटक गए। उनके शब्द झारखंड की प्रारंभिक राजनीति की उलझनों को जैसे आईना दिखा देते हैं, जहां विचार और व्यवहार, दोनों ही आपस में टकराते रहे।
झारखंड की आधुनिक राजनीति में कल्पना सोरेन का उदय बदलाव का संकेत माना जा रहा है। वह स्पष्ट कहती हैं कि महिलाएं सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली शक्ति हैं।
उनका दृष्टिकोण सामाजिक अर्थव्यवस्था से गहरे जुड़ता है—महिला स्वावलंबन, पोषण, आदिवासी भाषाओं का संरक्षण, और सामुदायिक भागीदारी का विस्तार। वह सुझाव देती हैं कि आदिवासी भाषाओं को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, महिलाओं को बजट और नीति निर्माण की बारीकियों से जोड़ा जाए, ग्रामीण महिलाओं को डिजिटल गवर्नेंस से परिचित कराया जाए।
यह विचार झारखंड की राजनीति को उस दिशा में ले जाता है, जहां सामाजिक विकास सत्ता की राजनीति पर हावी होता दिखने लगता है।
बिहार विधानसभा में जब पुनर्गठन विधेयक 25 अप्रैल 2000 को पारित हुआ, तब यह सिर्फ एक विधायी प्रक्रिया नहीं थी, यह पूर्वांचल की नई राजनीतिक भूगोल का पुनर्गठन था। सदन के गलियारों में लालू प्रसाद, बागुन कुंडू, सावना लकड़ा और शिबू सोरेन अपनी-अपनी जीत की मुद्रा में दिखे। उसी दिन झारखंड आंदोलनकारियों ने दशकों की लड़ाई के मुकाम का स्वाद चखा। विधानसभा की बहसों में कई रंग थे, लालू प्रसाद ने भविष्य में होने वाले भेदभाव का सवाल उठाया, माधव लाल सिंह ने राबड़ी देवी को बधाई दी, टेकलाल महतो ने अवड़ा लगाने यानी माहौल बिगाड़ने की कोशिशों पर चुटकी ली, और बागुन कुंडू ने आदिवासी पहचान की स्पष्टता पर जोर दिया। यह बहसें पूरे भारत की संघीय राजनीति के लिए एक पाठशाला थीं, जहां पहचान, विकास, संसाधन और क्षेत्रीय आकांक्षाएं आपस में भिड़ती भी थीं, और सहमत भी होती थीं।
झारखंड की राजनीति का वर्णन शिबू सोरेन के उल्लेख के बिना अधूरा है। दिशोम गुरु के तीन दशकों के संघर्ष ने झारखंड आंदोलन को ऊर्जा दी। दिसंबर 2024 में उनके निधन के बाद उनका जीवन पुनः एक किंवदंती की तरह उभरकर सामने आया।
जब वे पलमा में पुलिस वारंट के बीच भूमिगत थे, तब वह रात, जब कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनकर वह खिड़की से कूदकर भाग निकले, आंदोलन की कठिनाइयों का प्रतीक है। पहाड़ों में छिपकर, रात-दिन चलकर, लगातार ठिकाना बदलना, उनकी रणनीति का हिस्सा था।
अफवाहें थीं कि आंदोलनकारी लोग धड़ल्ले से होटलों में खाते-पीते हैं, लेकिन तथ्य यह था कि शिबू सोरेन अपने करीबी दोस्त के ढाबे में बिना पैसे चुकाए खाना भी नहीं खाते थे। उनके सहयोगियों ने कई बार देखा कि जेब में पैसे न होने पर वह उधार लेकर बिल चुकाते थे। डोमिसाइल आंदोलन हिंसक रूप ले सकता था, लेकिन पत्रकार अनुज सिन्हा की अपील पर सोरेन शांतिपूर्ण समाधान के लिए तैयार हुए। उनकी यह विशेषता थी। ‘हठधर्मिता’ उनके स्वभाव में नहीं थी। वह समाज के ‘गार्जियन’ की तरह सोचते थे।
70 वर्ष पहले पढ़ाने वाले मास्टर परमेश्वर मांझी का नाम याद होना, उनके व्यक्तित्व की गहराई दिखाता है। उम्र के अंतिम वर्षों में भी यह स्मरण शक्ति बनी रही। चाईबासा की सभा में जाते हुए उन्होंने विधायक दुलाल भुइयां से कहा कि तुम लोग चाहे बिना टिकट जाओ, लेकिन मैं टिकट लेकर ही जाऊंगा। यह छोटी-सी घटना उनके अनुशासन और नियमप्रियता की मिसाल है।
कुल मिलाकर, आंदोलन की आग ने राज्य की मांग को जन्म दिया, लेकिन शासन की जटिलताओं ने इन 25 वर्षों में कई प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिए। नेतृत्व बदलता रहा, गठबंधन टूटते-बनते रहे, दल-बदल राजनीति ने बार-बार स्थिरता को चुनौती दी। संसाधनों से समृद्ध, लेकिन मानव विकास सूचकांकों में पीछे रहने वाला झारखंड अभी अपनी संभावनाओं का पूरा दोहन नहीं कर पाया है।
22 जिलों का यह पहाड़ी-वनांचल इलाका पहचान की लड़ाई से निकलकर अब विकास की दौड़ में स्थायी ढांचा खोज रहा है। आज भी सवाल वही हैं—भूमि, आदिवासी अधिकार, रोजगार, खान संसाधन, औद्योगिक नीति और सामाजिक न्याय। और शायद यही झारखंड की राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा संकेत है—यह राज्य सत्ता परिवर्तन के खेल से आगे बढ़कर एक ऐसी स्थिर, समावेशी राजनीति की मांग करता है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्पष्ट दिशा निर्धारित करे। पिछले 25 वर्षों की राजनीति यह बताती है कि झारखंड की कहानी सिर्फ नेताओं, सरकारों और गठबंधनों की नहीं है। यह कहानी
संघर्ष और सपनों की है। संसाधनों की दौलत और प्रबंधन की कमी की, सामाजिक विविधता और उसके राजनीतिक उपयोग की, और उस अविरल आकांक्षा की, जिसने इस राज्य को जन्म दिया।
बाबूलाल मरांडी की स्वीकारोक्ति, रघुवर दास का तर्क, नामधारी की पीड़ा, कल्पना सोरेन का विजन, और शिबू सोरेन की संघर्षगाथा, ये सभी टुकड़े झारखंड के राजनीतिक मोज़ेक को पूरा करते हैं। झारखंड आज 25 वर्ष का है। एक युवा राज्य, जो अब भी अपने भविष्य की दिशा तय करने की प्रक्रिया में है। आगे का रास्ता प्रशासनिक स्थिरता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन का है। अगर, ये तीनों सूत्र मिल जाएं, तो अगले 25 वर्ष झारखंड को उस मुकाम तक पहुंचा सकते हैं, जिसका सपना आंदोलनकारियों ने देखा था।

