देवानंद सिंह
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था को डेड इकोनॉमी कहे जाने के बाद भारत के राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में तीव्र हलचल है। ट्रंप ने सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि रूस को भी इसी श्रेणी में रखते हुए कहा कि दोनों देश अपनी बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्थाओं को साथ लेकर गर्त में ले जा रहे हैं, हालांकि ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और उसकी जीडीपी ग्रोथ दर वैश्विक औसत से कहीं ऊपर है।
ट्रंप के इस बयान को राहुल गांधी ने हाथों-हाथ लिया और मोदी सरकार पर तीखा प्रहार किया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, कांग्रेस के ही दो वरिष्ठ नेताओं शशि थरूर और राजीव शुक्ला ने इस बयान का प्रतिवाद करते हुए भारत की आर्थिक स्थिति को मज़बूत बताया। इसके बाद केंद्र सरकार की तरफ़ से केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में भारत की आर्थिक उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए ट्रंप के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान का परिप्रेक्ष्य स्पष्ट रूप से अमेरिका की घरेलू राजनीति और वैश्विक व्यापार समीकरणों से जुड़ा है। दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप लगातार आक्रामक राष्ट्रवादी एजेंडा चला रहे हैं ,जिसमें विदेशी व्यापार पर नियंत्रण और अमेरिकी वर्चस्व की पुनर्स्थापना एक प्रमुख मुद्दा है। ट्रंप का यह बयान उनके अमेरिका फर्स्ट दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसमें वो अक्सर सहयोगी देशों को भी कठघरे में खड़ा कर देते हैं। यदि, व्यापार घाटा या रणनीतिक असहमति दिखाई देती है।
भारत और रूस के बीच व्यापारिक सहयोग विशेषकर तेल और रक्षा क्षेत्रों में अमेरिका को खटक रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाया है। इससे अमेरिका की भौहें तन गई हैं, और संभवतः ट्रंप का यह बयान उसी नाराज़गी की अभिव्यक्ति है। राहुल गांधी ने इस बयान को सरकार की नाकामी के तौर पर प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को छोड़कर हर कोई जानता है कि भारत एक डेड इकोनॉमी है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने अर्थव्यवस्था को खत्म कर दिया है और इसका लाभ सिर्फ अदानी जैसे पूंजीपतियों को हुआ है। नोटबंदी और जीएसटी को राहुल गांधी ने भारत की आर्थिक बर्बादी के दो प्रमुख कारण बताया, हालांकि यह तथ्यात्मक रूप से अधूरा और अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रारंभिक झटके अवश्य लगे, लेकिन इन नीतियों के दीर्घकालिक प्रभावों पर अर्थशास्त्रियों के मत विभाजित हैं। एमएसएमई क्षेत्र और असंगठित कामगारों को इन निर्णयों से नुकसान पहुंचा, लेकिन वही अर्थव्यवस्था अब पुनरुद्धार की राह पर दिख रही है।
राहुल गांधी के आक्रामक बयान से अलग कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता, शशि थरूर और राजीव शुक्ला, कहीं अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते नज़र आए। शशि थरूर ने कहा कि भारत की ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है और वह चीन की तरह पूरी तरह निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्था नहीं है। उन्होंने अमेरिका की टैरिफ नीति को चुनौतीपूर्ण बताया लेकिन भारत की बातचीत क्षमता और कूटनीतिक कौशल पर भरोसा जताया।
राजीव शुक्ला ने ट्रंप के बयान को सीधे तौर पर गलत बताया और कहा कि भारत दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उन्होंने भारत की आर्थिक सुधार प्रक्रिया का श्रेय कांग्रेस, एनडीए और वर्तमान सरकार को मिलाकर दिया। यह दृष्टिकोण न सिर्फ व्यावहारिक है बल्कि यह बताता है कि अर्थव्यवस्था किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं होती। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में ट्रंप के बयान का जवाब देते हुए कहा कि भारत अब ‘फ्रैजाइल फाइव’ (कमज़ोर पांच अर्थव्यवस्थाओं) की सूची से निकलकर ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग इकोनॉमी’ बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत आने वाले कुछ वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।
आईएमएफ की रिपोर्ट भी भारत की आर्थिक प्रगति की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में भारत की GDP वृद्धि दर 6.4% रहने की संभावना है, जबकि अमेरिका के लिए यह दर क्रमशः 1.9% और 2% रहने का अनुमान है। इस अंतर से स्पष्ट है कि भारत की अर्थव्यवस्था न तो डेड है और न ही ट्रंप की तरह किसी गर्त में जा रही है, हालांकि यह भी सत्य है कि भारत को अभी कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना है। बेरोज़गारी, आय असमानता, ग्रामीण संकट, और शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश की कमी, ऐसे मुद्दे हैं, जो भारत की सामाजिक और आर्थिक मजबूती में बाधक हैं।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘असेंबल इन इंडिया’ जैसी योजनाओं का ज़मीनी प्रभाव सीमित रहा है, खासकर तब जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका अपेक्षाकृत कम रही है। इसके अतिरिक्त, एमएसएमई सेक्टर को सस्ता क्रेडिट और सुगम नीतिगत सहायता नहीं मिल रही है, जिससे यह क्षेत्र लगातार दबाव में है। फिर भी, कोविड के बाद अर्थव्यवस्था की गति जिस तेज़ी से बहाल हुई है, वह बताती है कि भारत की आर्थिक बुनियाद कमजोर नहीं बल्कि लचीली और पुनर्निर्माण-क्षम है।
कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप का ‘डेड इकोनॉमी’ वाला बयान एकतरफ़ा, अतिशय और राजनीतिक मंशा से प्रेरित प्रतीत होता है। भारत की अर्थव्यवस्था निष्क्रिय नहीं है, लेकिन चुनौतियों से घिरी हुई अवश्य है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों को आत्मावलोकन करते हुए साझा उत्तरदायित्व की भावना से अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए काम करना चाहिए। राहुल गांधी जैसे नेता जब विदेशियों के आलोचनात्मक बयानों को आत्म-सत्य की तरह प्रस्तुत करते हैं, तो यह राष्ट्रीय हित के लिए चिंता का विषय बन जाता है। राजनीतिक असहमति ज़रूरी है, लेकिन वह ऐसी सीमा न लांघे जिससे भारत की वैश्विक छवि को नुक़सान पहुंचे।
वहीं, सरकार को भी आत्मसंतुष्टि से बचते हुए, जमीनी हकीकत को स्वीकारना होगा। एमएसएमई सेक्टर की मजबूती, किसानों की आय में वृद्धि, और रोजगार निर्माण के बिना जीडीपी ग्रोथ की चमक अधूरी है। केवल आंकड़ों के आधार पर ट्रंप को झूठा साबित करने से अधिक जरूरी है भारत के आर्थिक भविष्य को ठोस और न्यायसंगत बनाना। भारत न तो ‘डेड’ है और न ही ‘निर्द्वंद्व विजेता’, यह एक संभावनाओं से भरा देश है, जो अपने आत्मसंघर्ष और आत्मनिर्भरता के बल पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में, जिम्मेदार राजनीति का तकाज़ा है कि राष्ट्रीय नीतियों की आलोचना तथ्यों और समाधान के साथ की जाए, न कि विदेशियों की बातों पर आंख मूंदकर हामी भरते हुए।


