देवानंद सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को एम.एस. स्वामीनाथन शताब्दी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अमेरिकी टैरिफ विवाद पर अपनी पहली औपचारिक प्रतिक्रिया दी। बिना अमेरिका या पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिए, उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था केवल व्यापारिक सौदेबाज़ी का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का आधार है।
दरअसल, अमेरिका के 50% आयात शुल्क को भारत पहले ही अनुचित, अन्यायपूर्ण और तर्कहीन बता चुका है। यह कदम वॉशिंगटन की ओर से अचानक नहीं आया। इसके पीछे कई परतें हैं, जिसमें वैश्विक महंगाई, घरेलू राजनीतिक दबाव, असफल व्यापार वार्ताएं और यूक्रेन युद्ध को थामने में असफलता मुख्य रूप से शामिल हैं। ट्रंप ने हाल में कई बार रूस का नाम लेकर अपनी असहमति जताई है, लेकिन यह समझना कठिन नहीं कि उनकी वास्तविक निराशा का एक बड़ा कारण भारत के साथ अटकी हुई व्यापार डील है।
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि भारत अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए अपना बाजार पूरी तरह खोल दे। अमेरिका के दृष्टिकोण से यह एक लाभदायक सौदा है, उनके किसानों को एक विशाल उपभोक्ता आधार मिलेगा, जबकि भारत को कथित तौर पर ‘गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी मूल्य’ वाले उत्पाद, लेकिन भारतीय दृष्टि से मामला इतना सीधा नहीं है। भारत की 55% से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनकी औसत जोत आकार घटकर 1.08 हेक्टेयर रह गई है। ऐसे किसान पहले से ही लागत, मौसम और बाज़ार के उतार-चढ़ाव के दबाव में हैं। यदि, भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में उतरते हैं, तो घरेलू किसान मूल्य प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे।
याद रहे कि अमेरिका में कृषि उत्पादन पर सरकारी सब्सिडी का स्तर बेहद ऊंचा है। किसान को न केवल उत्पादन लागत में मदद मिलती है, बल्कि निर्यात को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिया जाता है। यह स्थिति भारतीय किसानों के लिए एक असमान प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाएगी, जिसमें उनका हारना तय है। यही कारण है कि मोदी सरकार इस मोर्चे पर कठोर रुख अपना रही है। भारतीय कृषि केवल एक आर्थिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता की धुरी है। यहां के ग्रामीण इलाकों में कृषि आय ही उपभोग और रोजगार का प्रमुख स्रोत है। किसी भी ऐसे समझौते का असर केवल किसानों पर नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र और राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा। भारत में चुनावी राजनीति में किसानों का वोट बैंक निर्णायक होता है। पिछले दशक में महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में किसान आंदोलनों ने सरकारों की नीतियों को बदलने पर मजबूर किया है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिकी दबाव के आगे झुकना किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक आत्मघाती कदम होगा। ट्रंप का वर्तमान रुख केवल कृषि व्यापार तक सीमित नहीं है। वे रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि रूस अपने तेल निर्यात से यूक्रेन युद्ध के लिए वित्तीय संसाधन जुटा रहा है। लेकिन इस तर्क में कई विरोधाभास हैं।
पहला, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भारत नहीं, बल्कि चीन है। दूसरा, यूरोपीय संघ के कई देश और यहां तक कि खुद अमेरिका भी विभिन्न वस्तुओं में रूस से व्यापार जारी रखे हुए हैं। तीसरा, भारत का रूस से कच्चा तेल आयात केवल अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में मूल्य स्थिरता बनाए रखने का भी एक कारक है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% तेल आयात करता है। यदि रूस से रियायती दरों पर तेल न मिले, तो न केवल घरेलू महंगाई बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में भी कीमतें उछल सकती हैं। यही कारण है कि बाइडन प्रशासन ने भी अतीत में भारत की इस नीति की सराहना की थी। ट्रंप पहले चीन पर दबाव बनाने की कोशिश कर चुके हैं। लेकिन जब चीन ने ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ की आपूर्ति में कटौती कर दी, तो अमेरिकी उद्योगों को झटका लगा। अब ट्रंप प्रशासन को लगता है कि भारत और रूस पर दबाव बनाकर वह अपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय छवि सुधार सकते हैं।
भारत को लेकर उनकी अपेक्षा यह है कि नई दिल्ली अमेरिकी रणनीतिक हितों के अनुरूप व्यापार और ऊर्जा नीति में बदलाव करे, लेकिन भारत स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी आर्थिक संप्रभुता और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। इसी महीने अमेरिकी व्यापार वार्ता टीम भारत आ रही है। उम्मीद की जा सकती है कि दोनों पक्ष किसी व्यावहारिक समाधान पर पहुंचेंगे, शायद सीमित बाजार पहुंच, चरणबद्ध टैरिफ कटौती या गैर-टैरिफ बाधाओं पर समझौते के रूप में, लेकिन भारत के लिए केवल अमेरिका पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। यूरोपीय संघ के साथ लंबित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को प्राथमिकता देनी होगी। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, यूके, जापान, और एशियन देशों के साथ बहुपक्षीय समझौतों को आगे बढ़ाना होगा, इससे न केवल निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, बल्कि किसी एक देश पर निर्भरता भी घटेगी। कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका व्यापार तनाव कोई नई कहानी नहीं है, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने इसे अधिक संवेदनशील बना दिया है। ट्रंप का आक्रामक टैरिफ और कृषि बाजार पर दबाव भारत के लिए केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न भी है।
मोदी सरकार ने फिलहाल सही संदेश दिया है कि किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन आने वाले महीनों में असली परीक्षा होगी कि यह रुख वार्ता की मेज पर भी कायम रह पाता है या नहीं। भारत को अपनी व्यापार रणनीति में विविधीकरण, आत्मनिर्भरता और साझेदार देशों के साथ संतुलित समझौते की नीति अपनानी होगी। यही वह रास्ता है, जिससे वह न केवल अमेरिका के साथ विवाद सुलझा सकता है, बल्कि वैश्विक व्यापार मंच पर अपनी स्थिति भी मजबूत कर सकता है।

