देवानंद सिंह
यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नहयान का चंद घंटों का अचानक दिल्ली दौरा सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार से कहीं अधिक अर्थ रखता है। इस यात्रा ने न केवल भारत–यूएई संबंधों को नई ऊंचाई दी, बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया। यही कारण है कि इस दौरे को पाकिस्तान–सऊदी अरब के रक्षा समझौते के “आईने” में देखा जा रहा है।
सबसे पहले इस यात्रा की प्रकृति पर गौर करना ज़रूरी है। न तो पहले से कोई औपचारिक घोषणा, न विस्तृत कार्यक्रम, और न ही लंबे प्रवास की योजना—फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुद पालम एयरपोर्ट पर यूएई राष्ट्रपति का स्वागत करना यह संकेत देता है कि मामला साधारण नहीं था। भारतीय कूटनीति में प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्तिगत स्वागत चुनिंदा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नेताओं के लिए ही होता है। यह अपने आप में भारत–यूएई रिश्तों की गहराई को दर्शाता है।
दिसंबर 2021 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के केवल पाँच घंटे के भारत दौरे की याद स्वाभाविक रूप से आती है। तब कारण कोविड बताया गया था, लेकिन संदेश स्पष्ट था—रणनीतिक साझेदारियों के लिए समय की कमी आड़े नहीं आती। यूएई राष्ट्रपति का यह दौरा भी उसी श्रेणी में रखा जा सकता है, जहां कम समय में बड़े संदेश दिए गए।
पूर्व राजनयिक के.सी. सिंह का यह कहना कि इस यात्रा की पूर्व सूचना न होना पश्चिम एशिया में असामान्य हलचलों की ओर इशारा करता है, बेहद महत्वपूर्ण है। बीते कुछ वर्षों में खाड़ी क्षेत्र केवल ऊर्जा या प्रवासी श्रमिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन गया है। अमेरिका की आंशिक वापसी, चीन की बढ़ती दिलचस्पी, ईरान–इज़रायल तनाव और यूक्रेन युद्ध के प्रभाव इन सबने क्षेत्रीय समीकरणों को जटिल बना दिया है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत–यूएई के बीच स्ट्रैटिजिक डिफेंस पार्टनरशिप के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर बेहद अहम माने जा रहे हैं। अब तक भारत और यूएई के रिश्ते मुख्यतः व्यापार, निवेश, ऊर्जा और प्रवासी भारतीयों तक केंद्रित रहे हैं। रक्षा साझेदारी का औपचारिक रूप लेना यह दर्शाता है कि यूएई अब भारत को केवल आर्थिक भागीदार नहीं, बल्कि सुरक्षा संतुलन में भी एक अहम स्तंभ के रूप में देख रहा है।
यहां पाकिस्तान–सऊदी अरब रक्षा समझौते का संदर्भ स्वतः उभरता है। सितंबर 2025 में हुए इस समझौते में यह प्रावधान है कि सऊदी या पाकिस्तान में से किसी एक पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था नेटो के अनुच्छेद-5 जैसी सामूहिक सुरक्षा अवधारणा की याद दिलाती है। पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता है और सऊदी अरब लंबे समय से उसकी सैन्य सहायता पर निर्भर रहा है। इस समझौते ने खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन को नया आयाम दिया।
ऐसे में यूएई की चिंता समझी जा सकती है। सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र में उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी भी है और साझेदार भी। यदि सऊदी–पाक रक्षा धुरी मजबूत होती है, तो यूएई के लिए रणनीतिक संतुलन बनाना आवश्यक हो जाता है। इसी संदर्भ में मिडिल ईस्ट आई के विश्लेषक रेइप सोयलु की टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि यूएई, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के साथ सऊदी के रक्षा समझौते का संतुलन बनाने के लिए परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ साझेदारी कर रहा है।
भारत इस समीकरण में एक “स्थिर शक्ति” के रूप में उभरता है। भारत न तो खाड़ी की आंतरिक राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करता है और न ही किसी एक गुट का खुला पक्षधर है। उसकी नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है। यही कारण है कि भारत एक साथ यूएई, सऊदी अरब, ईरान और इज़रायल—सभी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने में सफल रहा है। यह क्षमता आज वैश्विक कूटनीति में दुर्लभ मानी जाती है।
भारत–यूएई रक्षा सहयोग केवल हथियारों या सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। हिंद महासागर में बढ़ती अस्थिरता, लाल सागर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा—इन सभी मुद्दों पर भारत और यूएई के हित मिलते-जुलते हैं। भारत के लिए यह साझेदारी पश्चिम एशिया में उसकी रणनीतिक पहुंच को मजबूत करती है, जबकि यूएई के लिए यह एक भरोसेमंद और संतुलित सुरक्षा विकल्प प्रदान करती है।
पाकिस्तान के दृष्टिकोण से देखें तो यह घटनाक्रम उसके लिए चिंता का विषय हो सकता है। अब तक वह खाड़ी देशों के साथ अपने पारंपरिक रक्षा और धार्मिक संबंधों के बल पर प्रभाव बनाए रखता था। लेकिन भारत की बढ़ती स्वीकार्यता यह दर्शाती है कि खाड़ी देश अब केवल धार्मिक या वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के आधार पर फैसले ले रहे हैं।
अंततः, यूएई राष्ट्रपति का यह संक्षिप्त लेकिन गहन अर्थों वाला दिल्ली दौरा इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। पाकिस्तान सऊदी रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि में भारत–यूएई साझेदारी एक “काउंटर-बैलेंस” के रूप में उभरती है। यह न केवल पश्चिम एशिया की राजनीति को नया आकार दे सकती है, बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका को भी और मजबूत करेगी।
यही कारण है कि कुछ घंटों का यह दौरा, अपने प्रभाव में, वर्षों तक याद रखा जाएगा।

