घाटशिला उपचुनाव: मुद्दे गायब, ‘बैल’ बना चुनाव का ब्रांड,
नेताओं की साख दांव पर, भीतरघात से बिगड़ सकता खेल
देवानंद सिंह
जमशेदपुर, 09 सितंबर :घाटशिला विधानसभा उपचुनाव अब पूरी तरह ‘बैल बनाम खूंटा’ की राजनीति में फंस चुका है। बेरोजगारी, पलायन, अस्पतालों की दुर्दशा और स्कूलों की हालत जैसे असली मुद्दे अब मंचों से गायब हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बयान “भाजपा का उम्मीदवार वही बैल है, जिसे हमने खिला-पिला कर मोटा किया था, अब जा रहा है भाजपा का खेत जोतने” ने सियासी मैदान में आग लगा दी है।
यह टिप्पणी सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन पर तंज मानी गई, जिन्होंने भावुक होकर कहा कि आंदोलन के दिनों में हमने जंगलों में रातें काटीं, गोलियां खाईं, पर इतना अपमान कभी नहीं सहा। उन्होंने पलटवार किया, “हमें बैल कहते हैं, पर खुद पार्टी में सबको खूंटे से बांधकर रखते हैं।” अब ‘बैल’ और ‘औकात’ शब्द घाटशिला की सियासत का नया नारा बन चुके हैं। जनता व्यंग्य कर रही है कि ये चुनाव है या सोनपुर मेला, जहां नेता वादों के चारे डाल रहे हैं और बैल सजे घूम रहे हैं।
मंचों पर बयानबाजी की गूंज के बीच असली सवाल — बेरोजगारी, सड़क, अस्पताल और शिक्षा है, जो कहीं पीछे छूट गए हैं। झारखंड की राजनीति में यह उपचुनाव ‘बैल युग’ की शुरुआत माना जा रहा है, जहां मुद्दों की फसल सूख गई है और रस्सियों से बंधे खूंटों पर राजनीतिक नारे झूल रहे हैं।
इस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, कार्यकारी अध्यक्ष आदित्य साहू, प्रभारी अभय सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिनेश आनंद गोस्वामी, सांसद विद्युत वरण महतो, हेमंत-कल्पना सोरेन और झामुमो के विधायक समीर मोहंती, संजीव सरदार, मंगल कालिंदी, कुणाल और पवन सिंह, सभी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
मगर, ज़मीन पर तस्वीर अलग है। झामुमो के कुछ विधायक ऊपर से एकजुट दिख रहे हैं, पर रातों में ‘बी-टीम’ के ज़रिए भीतरघात की खबरें तेज़ हैं। उधर, भाजपा में भी डर है कि अगर, बाबूलाल सोरेन जीत गए तो कोल्हान के कई बड़े नेताओं का कद छोटा हो जाएगा।
अब सवाल यह है कि घाटशिला की धरती पर कौन-सा ‘बैल’ आख़िरकार खूंटा तोड़ेगा, और कौन उसी खूंटे से बंधकर रह जाएगा। चुनावी रण में इस बार मुद्दे खेत में हैं, और बैल मंच पर।

