जमशेदपुर में प्रथम पाणिनि उत्सव समारोह अब पदार्थ और विचार आपस में हो रहे हैं सहमत : सरयू राय
हमारी वर्णमाला की शुरुआत पाणिनि से : रमा पोपली
पाणिनि के कारण ही हम सूत्रकाल को जान सके : डॉ. अग्निहोत्री
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर। जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय ने कहा है कि अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पूरब (भारत) और पश्चिम (अमेरिका समेत अन्य देश) के बीच वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से साम्य स्थापित होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। पहले दोनों के बीच जो असमानता थी, वह पदार्थ और विचार के टकराव के कारण थी। उस दौर में दोनों एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास करते थे, लेकिन अब प्रभुत्व की भावना के स्थान पर मतैक्य की भावना उभर रही है।
सरयू राय पाणिनि उत्सव समिति के तत्वावधान में न्यू बाराद्वारी स्थित पीपुल्स एकेडमी के कालिदास सभागृह में आयोजित प्रथम पाणिनि उत्सव समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि महर्षि पाणिनि के काल से लेकर आज तक अनेक युग बीत चुके हैं और इस दौरान आचार-विचार में बड़े परिवर्तन आए हैं। पाणिनि उत्सव के माध्यम से हम उनके ज्ञान को न केवल वर्तमान में आत्मसात कर रहे हैं, बल्कि भविष्य में उसे सकल ब्रह्मांड तक स्थापित करने की दिशा में भी अग्रसर हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि समाज का एक खास वर्ग हमारी विविधताओं को घातक हथियार बनाकर संघर्ष की राह पर धकेलने का प्रयास कर रहा है, लेकिन हमें उसमें उलझना नहीं है। आज ऐसे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि ऊर्जा (एनर्जी) और चेतना (माइंड) एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं और पदार्थ व विचार के बीच सामंजस्य बन रहा है।
पाणिनि फाउंडेशन की निदेशक रमा पोपली ने कहा कि हमारी वर्णमाला की शुरुआत महर्षि पाणिनि से ही होती है। उनके आशीर्वाद से भाषा को वैज्ञानिक आधार मिला। आज आवश्यकता है कि बच्चों में वैज्ञानिक सोच, सृजनशीलता और सकारात्मक टेम्परामेंट विकसित किया जाए।
डॉ. मित्रेश्वर अग्निहोत्री ने कहा कि महर्षि पाणिनि के कारण ही हम सूत्रकाल को जान पाए। यदि पाणिनि न होते तो उस रूप में संस्कृत का विकास संभव नहीं होता। उन्होंने कहा कि पाणिनि केवल व्याकरणाचार्य ही नहीं, बल्कि महाकवि, महाइतिहासकार और प्रकांड विद्वान थे। संस्कृत की अमरता, सुंदरता, अनुशासन और संरचना का श्रेय पाणिनि को ही जाता है।
बाल मुकुंद चौधरी ने कहा कि पाणिनि ने शंकर को प्रसन्न किया, जिनके नृत्य से डमरू की ध्वनि के माध्यम से 14 माहेश्वर सूत्र प्रकट हुए। इन्हीं सूत्रों के आधार पर पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना की।
डॉ. शशि भूषण मिश्र ने कहा कि वैदिक काल से पूर्व भी भारत में एक समृद्ध भारतीय आर्य भाषा प्रचलित थी, जिसके प्रमाण हाल के उत्खननों में मिले हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत की कोई एक लिपि नहीं है, लेकिन यह भाषा अनेक लिपियों में लिखी-पढ़ी जाती रही है और आज भी जीवंत है।
कार्यक्रम को डॉ. रागिनी भूषण एवं डॉ. कौस्तुभ सान्याल ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर पाणिनि फाउंडेशन की निदेशक रमा पोपली की पुस्तक ‘पाणिनि शिक्षाशास्त्र (Panini Pedagogy)’ का विमोचन किया गया। मंच संचालन पाणिनि उत्सव समिति के सचिव चंद्रदीप पांडेय ने किया।


