जमशेदपुर के राजेंन्द्र विद्यालय में एक पिता ने फीस नहीं भर पाने की मजबूरी में अपने गरीब बेटे के भविष्य की चिंता में आत्महत्या कर ली। यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जो शिक्षा को अधिकार की जगह व्यापार बना रही है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आज भी फीस, किताब, यूनिफार्म और अन्य खचों के बोझ तले दबे हैं। शिक्षा नीति चाहे जो कहे, जमीनी हकीकत यही है कि आर्थिक तंगी बच्चों के सपनों को कुचल रही है। सरकार और विद्यालय प्रशासन को चाहिए कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं- फीस में पारदर्शिता, आर्थिक कप से कमजोर परिवारों के लिए सहायता कोष, और संवेटनशील प्रशासनिक व्यवस्था समय की मांग है। एक पिता की यह पीड़ा हमें झकझोरती है कि अब और चुप रहना, किसी और घर में उजाला बुझने का इंतजार करना है।