देवानंद सिंह
लोकतंत्र में मतदाता सूची किसी भी चुनावी प्रक्रिया की रीढ़ होती है। यदि, इसमें पारदर्शिता और सटीकता न रहे, तो चुनाव की वैधता ही संदिग्ध हो सकती है। बिहार की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और ‘वोट चोरी’ के आरोपों के खिलाफ सोमवार को विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा दिल्ली में निकाला गया मार्च इसी चिंता का परिणाम था। इस मार्च में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव गुट) समेत कई विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया। हालांकि, पुलिस ने संसद मार्ग पर इन्हें रोककर हिरासत में ले लिया और करीब दो घंटे बाद रिहा किया।
यह घटना केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता पर उठते गंभीर सवालों और संवैधानिक संस्थाओं में घटते जनविश्वास का प्रतिबिंब भी है।
दरअसल, सोमवार को विपक्षी सांसद संसद भवन से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर मार्च कर रहे थे। उनका उद्देश्य था कि बिहार की मतदाता सूची में कथित 6.5 करोड़ नाम हटाए जाने और अनियमितताओं के खिलाफ आयोग को ज्ञापन सौंपा जाए। निर्वाचन आयोग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि केवल 30 सांसदों को ही कार्यालय में प्रवेश की अनुमति मिलेगी, लेकिन प्रदर्शनकारियों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, और पुलिस के अनुसार मार्च के लिए पूर्व अनुमति भी नहीं ली गई थी।
मार्च के दौरान पीटीआई बिल्डिंग के बाहर पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया। कई सांसद सड़क पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे, जबकि कुछ महिला सांसदों ने बैरिकेड पर चढ़कर विरोध जताया। हिरासत में लिए गए नेताओं में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, संजय राउत, महुआ मोइत्रा, सागरिका घोष और कई अन्य शामिल थे। बिहार में मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद की जड़ें गहरी हैं। विपक्ष का आरोप है कि हाल के अद्यतन में लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए, जिससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्ष के अनुसार, करीब 6.5 करोड़ मतदाताओं में से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए, जिनमें
प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक रूप से प्रेरित छेड़छाड़ और डिजिटल अपडेट प्रक्रिया में तकनीकी खामियां
प्रमुख संभावित कारण माने जा सकते हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता पहचान और सूची सुधार के प्रति जागरूकता कम होने के कारण कई लोग बदलावों से अनजान रह जाते हैं, जिससे उन्हें मतदान के दिन पता चलता है कि उनका नाम सूची में नहीं है।
भारत में चुनाव आयोग को हमेशा एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था के रूप में देखा गया है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी छवि विपक्षी दलों की आलोचना के घेरे में है। विपक्ष का आरोप है कि आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है और विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाकर सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचा रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि सभी संशोधन और अद्यतन विधि सम्मत प्रक्रियाओं के तहत होते हैं, और किसी भी शिकायत की जांच का प्रावधान है।
यह टकराव केवल बिहार तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी अतीत में मतदाता सूची में गड़बड़ी और ‘फर्जी वोटिंग’ के आरोप लगते रहे हैं। पुलिस का तर्क था कि सुरक्षा कारणों से केवल 30 सांसदों को आयोग तक जाने की अनुमति थी, और बिना अनुमति के अधिक संख्या में लोगों के मार्च से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा था। हालांकि, विपक्ष का मानना है कि यह एक शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन था, जिसे रोकना नागरिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।
ऐसे में, यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग के लिए पूर्व अनुमति लेनी चाहिए? और यदि हां, तो क्या यह लोकतंत्र में वैचारिक असहमति के अधिकार को सीमित करने की दिशा नहीं है? यह विरोध प्रदर्शन 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद का पहला बड़ा विपक्षी एकजुटता प्रदर्शन माना जा रहा है।
कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव), और अन्य क्षेत्रीय दलों का एक साथ आना यह दर्शाता है कि चुनावी सुधार और पारदर्शिता का मुद्दा उन्हें एकजुट कर सकता है, इसीलिए आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को ही केंद्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकता है।
उधर, सत्ता पक्ष ने इसे केवल राजनीतिक ड्रामा और जनता को गुमराह करने की कोशिश बताया है, जो बताता है कि सरकार इस विरोध को गंभीर खतरे के रूप में नहीं देख रही, लेकिन जनमानस पर इसका असर पड़ सकता है।
यदि, मतदाता सूची में व्यापक अनियमितताओं के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान सीधे जनता को होगा, और पात्र मतदाताओं का मतदान अधिकार छिन सकता है। वही, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अविश्वास बढ़ सकता है, साथ ही, चुनावी नतीजों की वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
ऐसे मामलों में चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि जनता का भरोसा बहाल हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार देता है। इसके अंतर्गत मतदाता सूची का अद्यतन और प्रबंधन आयोग की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि मतदाता सूची में पारदर्शिता चुनावी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। यदि, किसी मतदाता का नाम सूची से हटाया जाता है, तो वह निर्वाचन रजिस्ट्रार से अपील कर सकता है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रक्रिया अक्सर जटिल और धीमी होती है।
मीडिया इस पूरे विवाद को दो तरह से प्रस्तुत कर रहा है, जिसमें सांसदों की हिरासत को असहमति की आवाज दबाने के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें बिना अनुमति के मार्च को नियम उल्लंघन बताया जा रहा है। मीडिया के इस विभाजन का सीधा असर जनता की धारणा पर पड़ रहा है, जो बिल्कुल भी उचित नहीं लगता है।
यदि, इस विवाद का समाधान जल्द नहीं निकला, तो इसके राजनीतिक और सामाजिक असर गहरे हो सकते हैं। निर्वाचन आयोग को एक स्वतंत्र जांच समिति बनाकर पूरे मामले की जांच करनी चाहिए और परिणाम सार्वजनिक करने चाहिए। मतदाता सूची अद्यतन में तकनीकी गड़बड़ियों को रोकने के लिए डिजिटल सत्यापन को मजबूत बनाना जरूरी है। मतदाताओं को अपने नाम की स्थिति समय रहते जांचने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, और सत्ता और विपक्ष के बीच चुनावी प्रक्रिया पर सहमति बनाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।
कुल मिलाकर, बिहार की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों पर दिल्ली में हुआ विपक्ष का मार्च केवल एक राज्य या एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। मतदाता सूची में सटीकता, पारदर्शिता और निष्पक्षता किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की सबसे अहम शर्त है। यदि, इसमें ही खोट आ जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा को गहरी चोट लगती है। चुनाव आयोग, सरकार, विपक्ष और जनता, सभी को यह समझना होगा कि चुनाव केवल वोट डालने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनविश्वास की परीक्षा भी है, और इस विश्वास को बचाए रखना किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

