लेखक: देवानंद सिंह
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बदलता एशियाई सुरक्षा संतुलन नए सामरिक समीकरणों को जन्म दे रहा है। चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता के जवाब में पड़ोसी देश अपनी रक्षा क्षमताओं को तेजी से मजबूत कर रहे हैं। भारत निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की बढ़ती वैश्विक मांग इस परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
इस नए सुरक्षा परिदृश्य में क्वाड, आसियान और द्विपक्षीय रक्षा समझौतों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। चीन की नाइन-डैश लाइन नीति का विरोध करते हुए क्षेत्रीय देश सामूहिक सुरक्षा ढांचे को मजबूत कर रहे हैं।
बदलता एशियाई सुरक्षा संतुलन और चीन की चुनौती
एशिया-प्रशांत क्षेत्र एक नए सामरिक दौर में प्रवेश कर चुका है। लंबे समय तक दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने पड़ोसी देशों में असुरक्षा की भावना पैदा की। बीजिंग ने अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने की लगातार कोशिश की, लेकिन अब उसके पड़ोसी देश भी अपनी सुरक्षा रणनीति को नए सिरे से गढ़ रहे हैं। भारत निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की बढ़ती मांग और ताइवान द्वारा अपनी तटीय रक्षा को मजबूत करने की पहल इसी बदलते सुरक्षा समीकरण का संकेत है।
फिलीपींस के बाद वियतनाम का भारत के साथ ब्रह्मोस खरीद को लेकर समझौता और इंडोनेशिया का इस दिशा में आगे बढ़ना केवल रक्षा सौदे नहीं हैं, बल्कि यह संदेश है कि छोटे और मध्यम आकार के देश अब अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर और सक्षम बनना चाहते हैं। दूसरी ओर, ताइवान का अमेरिका से हार्पून एंटी-शिप मिसाइलों की खरीद तथा नया कोस्टल कॉम्बैट कमांड बनाना चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के प्रति उसकी गंभीर तैयारी को दर्शाता है।
यह स्थिति चीन के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है कि शक्ति प्रदर्शन और दबाव की नीति का जवाब अब सामूहिक सुरक्षा सहयोग के रूप में सामने आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने कृत्रिम द्वीपों का निर्माण, सैन्य अड्डों का विस्तार और विवादित समुद्री क्षेत्रों में आक्रामक गतिविधियां बढ़ाईं। परिणामस्वरूप उसके पड़ोसी देशों ने अमेरिका, भारत, जापान और अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ रक्षा सहयोग को नई गति दी है। यही कारण है कि आज एशिया में शक्ति संतुलन पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल और बहुध्रुवीय होता जा रहा है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहने की संभावना है।
भारत के लिए यह परिवर्तन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की रक्षा तकनीक, रणनीतिक विश्वसनीयता और वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव का भी प्रमाण है। वर्षों तक रक्षा उपकरणों का आयात करने वाला भारत अब रक्षा निर्यातक देशों की श्रेणी में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। इससे न केवल देश की रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि मित्र देशों के साथ सामरिक संबंध भी मजबूत होंगे।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हथियारों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति का विकल्प नहीं हो सकती। यदि सैन्य तैयारियों के साथ संवाद, विश्वास निर्माण और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान पर समान रूप से ध्यान नहीं दिया गया, तो तनाव और टकराव की आशंकाएं भी बढ़ेंगी। दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी छोटी चूक के बड़े परिणाम हो सकते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि चीन भी यह समझे कि इक्कीसवीं सदी में प्रभाव स्थापित करने का सबसे प्रभावी माध्यम सैन्य दबाव नहीं, बल्कि सहयोग, विश्वास और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है। वहीं भारत सहित क्षेत्र के अन्य देशों को भी अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ शांति और स्थिरता के पक्षधर की भूमिका निभानी होगी।
एशिया का भविष्य हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि संतुलित शक्ति, जिम्मेदार कूटनीति और पारस्परिक सम्मान से तय होगा। बदलते हालात में भारत की भूमिका केवल एक मिसाइल निर्यातक देश की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलन स्थापित करने वाले जिम्मेदार साझेदार की भी है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हथियारों की होड़ से बचने के लिए विश्वास निर्माण के उपाय (CBMs) और हॉटलाइन संचार तंत्र को सक्रिय करना होगा। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के प्रावधानों का सम्मान विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आधार बन सकता है।
निष्कर्षतः, बदलता एशियाई सुरक्षा संतुलन क्षेत्रीय शांति के लिए चुनौतियों और अवसरों दोनों को प्रस्तुत करता है। भारत की बढ़ती रक्षा निर्यात क्षमता और कूटनीतिक पहल इस नए समीकरण में संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य कर सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी पक्ष संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करते हुए स्थायी समाधान की ओर बढ़ें।

