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    Home » होली के फीके पड़ते रंग: बदलते दौर में त्योहारों की बदलती संस्कृति
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    होली के फीके पड़ते रंग: बदलते दौर में त्योहारों की बदलती संस्कृति

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 6, 2026No Comments6 Mins Read
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    ज्योतिबा फुले
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    होली के फीके पड़ते रंग और बदलती परंपराएं

    • प्रमोद दीक्षित मलय-

    त्योहार-उत्सव हमारे दैनंदिन जीवन से गहराई से जुड़े होते हैं।‌ त्योहार केवल उत्साह, उमंग एवं उल्लास के माध्यम भर नहीं हैं अपितु हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन एवं कार्य-व्यवहार कैसा हो, यह संदेश भी देते हैं। समाज एवं देश के विकास के लिए पारस्परिक मैत्री, भ्रातृत्व एवं सुख-दुख में साझेपन का भाव महत्वपूर्ण आधार होते हैं, त्योहार इस भावना को सुदृढ़ करते हैं। त्योहार ही हैं जो हमारी सामाजिक चेतना, सहकारिता एवं बंधुत्व भाव को ऊर्जस्वित करते हैं। त्योहार मानव जीवन के साथ ही प्रकृति एवं अन्य जीव-जंतुओं के सह-अस्तित्व से ही दुनिया के समृद्ध, सुखी एवं सामंजस्य पूर्ण होने की पैरवी करते हैं। प्रकृति के साथ आत्मीय सम्बन्ध की व्याख्या करते हैं। व्यक्ति, परिवार एवं देश की सुख, शांति एवं समृद्धि परस्पर सख्य, सहकार एवं समन्वय से सम्भव है न कि विखंडन, विषमता, बिछुड़न से। अलगावों से केवल आग सुलगती है जो सामाजिक एकता, अखंडता के भावों का जारण करती है। विविध त्योहार ही व्यक्ति एवं समाज को क्षेत्र, भाषा, लिंग, रंग, जातिगत विभेद एवं अलगावों से मुक्त कर मानवीय गरिमामय साहचर्य, सह-अस्तित्व एवं सहयोग के पथ पर स्नेह, संवेदना एवं प्रीति के रंग बिखेरते हैं। रंगों का त्योहार होली इन अर्थों में निश्चित रूप से लोक जीवन में प्रेम, सौहार्द एवं मधुरता के बहुरंगी पुष्प विकसित करते हुए समता-ममतायुक्त एक समरस समाज का निर्माण करता है। होली के रंग जीवन को इकरंगी एवं एकांगी हो जाने से बचाते हैं। पर आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागती पीढ़ी क्या इन रंगों के महत्व से परिचित हैं, क्या उनके हृदय अपनी सुमधुर परम्पराओं, सुखद रीतियों और मृदुल भावनाओं से ओत-प्रोत हैं जो हमेशा सामाजिक एकत्व की धारा के पोषक रही हैं? क्या ऐसा नहीं लगता कि त्योहार अपनी गरिमा खो रहे हैं, केवल औपचारिकता तक सिमट कर रह गये त्योहारों की रचनात्मकता की धार कुंद हो गई है। क्या फीके पड़ते होली के विविध रंग लोक जीवन में परस्पर प्रेम, माधुर्य, मैत्री से गुंथी रिश्तों की चादर के ताने-बाने को सम्बल, सरसता, सजलता, सांत्वना एवं शुचिता दें सकेंगे, विचारणीय है।
    होली का त्योहार वास्तव में प्रकृति आधृत सामाजिक समरसता का त्योहार है। यह मानव मन के आंगन में खिंची भेद की दीवारों के ढहाने का त्योहार है। यह ऋतु परिवर्तन और फसलों के स्वागत-सत्कार का त्योहार है। नित्यप्रति के तमाम दबावों से मुक्त हो आनंद के रंग में रंग जाने का त्योहार है। सत्ता के विरुद्ध लोक के सत्य की जीत की खुशी का त्योहार है। भगवान, भक्त और भक्ति के एकाकार हो जाने के रहस्य के समझने-बूझने का त्योहार है। व्यष्टि से समष्टि के कल्याण पथ पर लोकजीवन के अग्रसर होने की प्रेरणा एवं प्रवाह का त्योहार है। सांस्कृतिक धरोहर गीत, संगीत, नृत्य के जीने और नवल पीढ़ी को सौंपने का त्योहार है। पर सवाल यही है कि क्या आज हम आज ऐसा कर पा रहे हैं ? क्या ऐसा नहीं लगता कि डीजे के शोर में ढोल, झील, नक्कारा, झांझ, मंजीरा के स्वर ओजहीन हो गये हैं। फाग और राई की तान मंद पड़ गई है। ठंडाई की शीतलता कोल्ड ड्रिंक्स तले दब गयी है। टेसू, हल्दी, गुलाब के प्राकृतिक स्वस्थ रंग केमिकल रंगों की भेंट चढ़ गये। प्रेम भरा हुरियारों का उत्साह अब हुल्लड़ और फूहड़ व्यवहार में बदल गया है। आज बच्चे और बुजुर्ग घरों से बाहर नहीं निकलते कि पता नहीं कौन कब आकर पेंट, ग्रीस, कोयला पोत दें। रंगों की ओट में मन का वैमनस्य निकाल कौन कब रंजिश भुना लें। समझदार लोग घरों में स्वयं को कैद कर लिए हैं और हुल्लड़, तमाशा, शोरगुल सड़कों पर पसर गया है। पड़ोस में बजते डीजे की तेज कर्कश आवाज घरों में वृद्ध, बच्चों और रोगियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है, पर कौन मना करे। यह होली जैसे पावन गरिमामय त्योहार की भावना का पतन है। मुझे लगता है त्योहारों की गरिमा, शालीनता, संवेदना और आदर्श बचाये और बनाये रखने के लिए समाज के जागरूक और जिम्मेदार लोगों को आगे आकर पहल करनी होगी ताकि त्योहारों की जीवंतता, मर्यादा और सहजता बनी रहे।
    मेरे मानस पटल पर अनायास बचपन और युवाकाल में अपने गांव की होली के दृश्य उभर आये हैं। फागुन शुरू होते ही होली की तैयारी आरंभ हो जाती।‌ गांव में केवल एक जगह पर सामूहिक होलिका दहन होता। उस स्थान को साफ-स्वच्छ कर गाय के गोबर से लीपकर बसंत पंचमी को होली का शुभ लिया जाता और पलास की टहनी गाड़ दी जाती। रंग एकादशी तक वहां पर काफी लकड़ी एकत्रित हो जाती। होली के दिन सुबह से ही गाय के गोबर से बने बल्ले (दो इंच के चट्टे गोला शंक्वाकार उपले) मूंज की सुतली में गूंथकर इकट्ठे किये जाते और ढेर लगा दिया जाता। शाम या रात्रि में मुहूर्त समय अग्नि प्रज्वलित की जाती। उस अवसर पर एकत्रित समुदाय अपने बल्लों की माला का एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते, और एक-दो माला दहकती होलिका में भेंट कर पांच परिक्रमा लगाते। चना, गेहूं, जौ की अधपकी बालियां एक लम्बी लकड़ी में बांधकर भूनी जातीं। सभी व्यक्ति किसी बाल्टी या बर्तन में होली की आग घरों को लेकर अपने मुहल्ले और घरों में होलिका दहन करते, फाग गाते। बेसन का उबटन लगाकर अग्नि में डालते जो एक प्रकार से मन के मैल एवं विकारों के त्याग का प्रतीक है। दूसरे दिन रंग खेले जाते। घरों में पूड़ी, पापड़, गुझिया, सेव, खुरमा आदि बनाये जाते। शाम को सभी एक-दूसरे के घरों में जाकर अबीर-गुलाल लगाकर होली मिलते। फाग की मंडलियां मुहल्लों में देर रात तक फाग गायन करती। सर्वत्र हंसी-खुशी, शालीन मजाक-ठिठोली, देवर-भौजाई की मर्यादित नोंक-झोंक का आनंद हिलोरें लेता। ऐसे दृश्य हरेक गांव में दिखते, किंतु बाजारवाद और आधुनिकता के इस युग में होली के ये मनमोहक दृश्य लुप्तप्राय हैं, होली के प्रेम रंग फीके पड़ रहे हैं।‌ पड़ोसी भी वाट्सएप पर होली की बधाई भेज औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। त्योहार मन मिलाते हैं, मीत बनाते हैं; यह भाव अब तिरोहित हुआ जा रहा। आइए, मिलकर पहल करें ताकि त्योहारों की मर्यादा और मूल स्वरूप बचा रहे और हममें बचा रहे अपनी माटी से जुड़ा कोमल मधुर प्रेमभरा व्यवहार। हम सभी कलुषता, कुभाव, हिंसा, अशांति, क्रोध, कुंठा, शत्रुता आदि नकारात्मक प्रवृतियों से बचें और जीवन में त्योहार की सकारात्मक प्रवृत्तियों यथा- शालीनता, सौजन्यता, सामूहिकता, सहकारिता एवं संवेदनशीलता तथा सुख-शांति, समृद्धि का सामंजस्य हो, यह भावना है।
    ••
    लेखक शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं। बांदा, उ.प्र.
    मोबा. 9452085234

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