भारत अपने समय का स्वयं बनेगा स्वामी, डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम
देवानंद सिंह
भारत आज जिस तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, उसमें एक ऐसी बुनियादी जरूरत भी है, जिसकी अहमियत आम आदमी अक्सर महसूस नहीं करता। वह है सटीक समय। मोबाइल पर रास्ता खोजने से लेकर बैंक खाते में पैसे भेजने, रेलगाड़ियों के परिचालन, हवाई यातायात, बिजली आपूर्ति और रक्षा प्रणालियों तक, हर जगह समय की सटीकता अनिवार्य है। डिजिटल दुनिया में एक सेकंड का अंतर भी कई बार बड़े तकनीकी संकट का कारण बन सकता है। ऐसे में भारत का अपनी समय व्यवस्था को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और रणनीतिक मजबूती का भी विषय है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का एनवीएस-03 उपग्रह मिशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। स्वदेशी परमाणु घड़ी से लैस यह उपग्रह भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली ‘नाविक’ को मजबूती देने के साथ देश की समय संबंधी तकनीकी क्षमता को आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा। यह समझना जरूरी है कि अंतरिक्ष में उपग्रहों की स्थिति जितनी महत्वपूर्ण है, उनके बीच समय का सटीक तालमेल भी उतना ही आवश्यक है। उपग्रह से निकलने वाला संकेत पृथ्वी तक पहुंचने में कितना समय लेता है, इसी आधार पर किसी व्यक्ति, वाहन या वस्तु की भौगोलिक स्थिति निर्धारित होती है। समय की गणना में मामूली चूक भी स्थान निर्धारण में बड़ी गलती पैदा कर सकती है। इसलिए परमाणु घड़ी आधुनिक अंतरिक्ष और संचार तकनीक की रीढ़ मानी जाती है।
भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अब तक दुनिया की प्रमुख तकनीकी शक्तियों के पास अपनी स्वतंत्र उपग्रह नेविगेशन प्रणालियां रही हैं। अमेरिका का जीपीएस, रूस का ग्लोनास, यूरोप का गैलीलियो और चीन का बेइदोऊ इसके उदाहरण हैं। भारत ने भी अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ‘नाविक’ प्रणाली विकसित की है। इसका उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्र में सटीक स्थान, दिशा और समय की जानकारी उपलब्ध कराना है। यह केवल तकनीकी प्रतिस्पर्धा का मामला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से भी जुड़ा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय तनाव, युद्ध अथवा किसी बड़े संकट की स्थिति में यदि कोई देश विदेशी तकनीकी सेवाओं पर अत्यधिक निर्भर हो, तो उसकी रणनीतिक क्षमता प्रभावित हो सकती है। अपनी नेविगेशन प्रणाली होने से भारत के पास एक स्वतंत्र और भरोसेमंद विकल्प उपलब्ध रहेगा।
एनवीएस-03 की एक और विशेषता इसमें एल-1 बैंड के संकेतों का समावेश है। इससे मोबाइल फोन और अन्य आधुनिक उपकरणों में नाविक प्रणाली की उपयोगिता बढ़ने की संभावना है। सड़क परिवहन, रेलवे, समुद्री यातायात, विमानन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में इसका लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव दलों को सटीक लोकेशन उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस लिहाज से यह मिशन आम नागरिकों के जीवन को भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
लेकिन इस पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है ‘वन नेशन, वन टाइम’ की अवधारणा। भारत में आधिकारिक समय भारतीय मानक समय यानी आईएसटी है, जिसे वैज्ञानिक आधार पर सीएसआईआर की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला बनाए रखती है। इसके बावजूद विभिन्न संस्थानों और डिजिटल प्रणालियों में समय के तालमेल की चुनौतियां बनी रहती हैं। बैंकिंग, दूरसंचार, बिजली ग्रिड, रेलवे, विमानन और बड़े डेटा केंद्रों में समय की सटीकता का विशेष महत्व है। यदि इन प्रणालियों की घड़ियों में अंतर हो तो लेनदेन के रिकॉर्ड, नेटवर्क संचालन और तकनीकी समन्वय में परेशानी पैदा हो सकती है। ऐसे में देशभर में एक प्रमाणित और समान समय व्यवस्था विकसित करना समय की मांग है।
‘वन नेशन, वन टाइम’ का वास्तविक उद्देश्य केवल देश की घड़ियों को एक समय पर चलाना नहीं, बल्कि एक ऐसा वैज्ञानिक और विश्वसनीय तंत्र तैयार करना है, जिस पर सरकारी संस्थान, वित्तीय प्रतिष्ठान, उद्योग और डिजिटल सेवाएं समान रूप से निर्भर कर सकें। इसके लिए परमाणु घड़ियों, उपग्रह आधारित समय संकेतों और ऑप्टिकल फाइबर जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। व्हाइट रैबिट तकनीक इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके माध्यम से अलग-अलग शहरों में स्थित संस्थानों की घड़ियों के बीच अत्यंत सटीक तालमेल स्थापित किया जा सकता है।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। स्वदेशी उपग्रह और परमाणु घड़ी विकसित करना एक उपलब्धि है, लेकिन इनका लंबे समय तक निर्बाध संचालन सुनिश्चित करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। पहले के कुछ नेविगेशन उपग्रहों में परमाणु घड़ियों की तकनीकी समस्याएं सामने आ चुकी हैं। एनवीएस-02 को भी निर्धारित कक्षा में स्थापित करने में कठिनाई हुई थी। ऐसे अनुभव बताते हैं कि अंतरिक्ष विज्ञान में सफलता केवल प्रक्षेपण तक सीमित नहीं होती। उपग्रह की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता, निरंतर निगरानी और समय पर तकनीकी सुधार भी उतने ही आवश्यक हैं।
सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘वन नेशन, वन टाइम’ केवल सरकारी घोषणा बनकर न रह जाए। इसकी पहुंच देश के दूरदराज के इलाकों, छोटे बैंकों, स्थानीय प्रशासनिक संस्थानों, परिवहन नेटवर्क और ग्रामीण डिजिटल सेवाओं तक भी होनी चाहिए। तकनीक का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। साथ ही, इस व्यवस्था की साइबर सुरक्षा और तकनीकी विश्वसनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
आज भारत डिजिटल भुगतान और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में दुनिया के सामने अपनी क्षमता साबित कर रहा है। अब समय आ गया है कि देश अपनी तकनीकी जरूरतों के लिए केवल दूसरे देशों की प्रणालियों का उपभोक्ता बनकर न रहे, बल्कि अपने मानक, अपनी तकनीक और अपनी व्यवस्था विकसित करे। एनवीएस-03 इसी आत्मनिर्भरता की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
निश्चित रूप से भारत का अपना समय निर्धारित करने और उसे पूरे देश तक पहुंचाने का सपना केवल घड़ी की सुइयों को एक साथ चलाने का प्रयास नहीं है। यह उस भारत के निर्माण की दिशा में कदम है, जो अपनी तकनीकी नियति स्वयं तय करना चाहता है। क्योंकि डिजिटल युग में जिसके पास सटीक समय, विश्वसनीय तकनीक और स्वतंत्र व्यवस्था है, वही भविष्य की चुनौतियों का सामना अधिक मजबूती से कर सकता है। भारत को अब केवल समय के साथ चलना नहीं है, बल्कि अपनी वैज्ञानिक क्षमता के बल पर समय की दिशा भी तय करनी है।

