लेखनी :- कवि निशांत बेगूसराय, बिहार
कविता
सोये हुये सपनों में आँखो ने अपनी मंजिल को देखा,
दिमाग मे यह संदेश जाते ही बेतहासा से खलबली मच गया l
अपने को समझते और समझाते नींद पूरी नहीं होकर खुल गया,
जब आँखो के सामने सुना पाया दिल की धड़कन बढ़ गया l
उठ खरा हो कर अपनी सकल दर्पन में जब देखा,
खुद को मंजिल साकार करने का अलख जगाया l
सोये हुए सपनों में सपना को अपना करना है ,
दिन और रात खूबियों को ढूंढ कर मेहनत करना है l
इस मानव रूपी तन से वृद्धि और विकास को प्रतीत करना है ,
ऐसा एकाग्रचित होकर कर्मो के प्रति प्रयास करना है l
सपनों को साकार करने जैसा मंजिल नहीं बनाना है l
बाधाओ, आंधियो और अँधेरों से मुकाबला करके आना है ,
कह दो मंजिल से मुलाकात अभी सांस रहने तक जारी है l

