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    स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल को लेकर आशंकाएं चिंताजनक

    News DeskBy News DeskJuly 15, 2025No Comments6 Mins Read
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    स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल को लेकर आशंकाएं चिंताजनक
    देवानंद सिंह
    महाराष्ट्र विधानसभा मे पारित स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल ने राज्य की राजनीति और नागरिक समाज के बीच गंभीर बहस को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा प्रस्तुत इस बिल को राज्य की कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी बताया गया है, लेकिन इसके प्रावधानों और संभावित दुरुपयोग को लेकर जो आशंकाएं सामने आई हैं, वे किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हैं।

     

    यह बिल खासतौर पर तथाकथित अर्बन नक्सलियों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन सवाल यह है कि अर्बन नक्सल आखिर है कौन? इस शब्द की कोई कानूनी या संस्थागत परिभाषा नहीं है, और यही इस पूरी बहस की जड़ है। यदि, सरकार यह नहीं बता सकती कि वह किन लोगों को इस शब्द के दायरे में लाना चाहती है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि इसका इस्तेमाल असहमति की आवाज़ को कुचलने और राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए किया जा सकता है।

     

    अर्बन नक्सल शब्द पिछले एक दशक में विशेषकर मीडिया और कुछ राजनीतिक हलकों में उभरा है। इसका प्रयोग अक्सर उन बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, छात्रों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए किया जाता रहा है, जो सत्ता के फैसलों पर सवाल उठाते हैं या वंचित तबकों के अधिकारों की बात करते हैं। भीमा-कोरेगांव मामले के बाद इस शब्द को प्रचारित कर ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा किया गया, जिनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था, और वर्षों तक वे जेल में बंद रहे।

     

    यह स्थिति लोकतंत्र की उस आत्मा के खिलाफ जाती है, जो असहमति को राष्ट्र विरोध नहीं बल्कि राष्ट्र विमर्श का हिस्सा मानती है। जब तक अर्बन नक्सल की स्पष्ट, संकीर्ण और कानूनी व्याख्या नहीं की जाती, तब तक इस शब्द का प्रयोग असहमति की आवाज़ को अपराधी बनाने के लिए एक राजनीतिक औज़ार के रूप में देखा जाएगा।

    विपक्ष ने बिल में लेफ्ट विंग उग्रवादी विचारधारा की अस्पष्ट परिभाषा और इसके तहत कार्रवाई के दायरे को लेकर जो आशंकाएं उठाई हैं, वे केवल राजनीतिक विरोध नहीं हैं, बल्कि एक लोकतांत्रिक चेतना की अभिव्यक्ति हैं। यदि कोई कानून यह तय नहीं कर सके कि वह किन गतिविधियों को अपराध मानता है, तो वह कानून न होकर एक खुले छूट का पत्र बन जाता है, जो क्रियान्वयन करने वाले अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया जाता है।

     

    फडणवीस सरकार यह भरोसा दे रही है कि इस कानून का उपयोग राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विरोध प्रदर्शनों या वामपंथी पार्टियों के खिलाफ नहीं किया जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि यदि किसी कानून में दुरुपयोग की गुंजाइश है, तो क्या केवल सरकार का आश्वासन पर्याप्त है? सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन कानून स्थायी। आज की सरकार भले विवेक से काम ले, लेकिन कल कोई और सत्ता में आकर इसी कानून का दमनकारी उपयोग कर सकता है।

     

    बता दें कि महाराष्ट्र में पहले से ही मकोका जैसे कानून मौजूद हैं, जो आतंकवाद, संगठित अपराध और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। इन कानूनों की आलोचना पहले भी होती रही है, क्योंकि इनमें ज़मानत की गुंजाइश कम है, और अभियुक्तों को वर्षों तक बिना मुकदमा जेल में रखना संभव है। ऐसे में, सवाल उठता है कि जब ऐसे कड़े कानून पहले से मौजूद हैं, तो स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल जैसी एक और सख्त व्यवस्था लाने की क्या जरूरत थी? क्या यह सरकार की वैचारिक असुरक्षा है? या फिर एक रणनीतिक कदम, जिससे वह असहमति को राष्ट्रविरोध का जामा पहना सके?

     

    भारत सरकार स्वयं यह दावा कर चुकी है कि नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। एक समय देश के 180 ज़िले नक्सल प्रभावित माने जाते थे, जो अब घटकर 18 रह गए हैं। इनमें भी गंभीर रूप से प्रभावित जिलों की संख्या सिर्फ़ छह बताई जा रही है। फडणवीस के ही बयान के अनुसार, महाराष्ट्र में सिर्फ़ दो तालुकाओं में नक्सली गतिविधियां शेष हैं। जब नक्सलवाद का खतरा अब खत्म होने के कगार पर है, तब ऐसे कठोर कानून का औचित्य और ज्यादा संदिग्ध हो जाता है। यह दर्शाता है कि वास्तविक खतरे की तुलना में सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताएं कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभा रही हैं।

     

    भारत का संविधान नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, संगठन और विरोध का अधिकार देता है। यह लोकतंत्र का मूल आधार है। ऐसे कानून, जिनकी भाषा अस्पष्ट हो, परिभाषाएं धुंधली हों और क्रियान्वयन विवेकाधीन हो, सीधे-सीधे इन मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की संभावना पैदा करते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने ऐसे कानूनों का इस्तेमाल किया है, आम नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकारों को सबसे पहले उसका शिकार बनना पड़ा है। इमरजेंसी के दौर से लेकर भीमा-कोरेगांव की गिरफ्तारियों तक, ऐसे उदाहरण अनेक हैं। इस संदर्भ में यह अनिवार्य हो जाता है कि किसी भी नए कानून को पारदर्शिता, स्पष्टता और न्यायिक निगरानी के साथ ही लागू किया जाए। यदि, राज्य सरकार को लगता है कि शहरी क्षेत्रों में नक्सल सहानुभूति रखने वाले समूह पनप रहे हैं, तो इसकी जांच स्वतंत्र, न्यायिक निगरानी वाली एजेंसियों से कराई जाए। किसी भी बिल को पारित करने से पहले उसका व्यापक जनसुनवाई के माध्यम से सामाजिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।इसके अलावा, नागरिक समाज, मानवाधिकार संगठनों और न्यायपालिका की भागीदारी से एक निगरानी तंत्र  बनाया जाए, ताकि कानून के दुरुपयोग की गुंजाइश न बचे।

    दरअसल, स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल जैसे कानून केवल राज्य की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि सरकार की वैचारिक असहिष्णुता की झलक भी दे सकते हैं, यदि उन्हें पारदर्शिता और स्पष्ट उद्देश्य के साथ लागू न किया जाए। अगर, कोई कानून यह स्पष्ट नहीं करता कि वह किन गतिविधियों को रोकना चाहता है, तो वह अपनी अस्पष्टता के कारण सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। राज्य की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा। यदि, लोकतंत्र में असहमति को अपराध बना दिया गया, तो वह लोकतंत्र नहीं रहेगा, बल्कि एक भयावह निगरानी राज्य में तब्दील हो जाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि महाराष्ट्र सरकार इस कानून की भाषा, प्रावधानों और उद्देश्य को स्पष्ट करे, और इसे लागू करने से पहले व्यापक परामर्श, न्यायिक समीक्षा और निगरानी व्यवस्था की स्थापना करे। अन्यथा, यह कानून अर्बन नक्सल जैसे एक साजिशन गढ़े गए शब्द के माध्यम से लोकतंत्र की आत्मा को ही घायल कर देगा।

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